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गांधी जी : जिन्हें इतिहास ने महान बनाया

– सारांश कनौजिया

दे दी हमे आजादी बिना बरछी, बिना ढाल, सागरमति के संत तूने कर दिया कमाल। गांधी जी के लिए, उनकी प्रशंसा में उपरोक्त शब्द कहे गए हैं। भारत के इतिहास में, बचपन से विद्यार्थियों को यही पढ़ाया जाता रहा है कि हमें आजादी गांधी जी के प्रयासों से मिली। इसीलिए उन्हें राष्ट्रपिता की उपाधि भी दी गई है। किन्तु क्या आजादी में सिर्फ गांधी जी और कांग्रेस का ही योगदान था, इस पर महात्मा गांधी की जयंती पर चर्चा जरुरी है। तभी हम अपने वास्तविक नायकों को पहचान सकेगे। यद्यपि हम गांधी जी के लिए किसी भी प्रकार के अपशब्दों के प्रयोग का समर्थन नहीं करते और न ही उनकी हत्या को सही मानते हैं।

महात्मा गांधी का जन्म 2 अक्टूबर 1869 को हुआ था। तब तक भारत में 1857 की क्रांति हो चुकी थी। यह एक सशस्त्र आन्दोलन था। अंग्रेजों का विरोध पहले भी हुआ करता था लेकिन 1857 को पहली बार इतने बड़े स्तर पर अंग्रेजी सेना के अंदर से विद्रोह हुआ था। शायद इसीलिए इसे भारत का पहला स्वतंत्रता संग्राम कहा जाता है। तब तक कांग्रेस की स्थापना भी नहीं हुई थी। इसके बाद 2 बड़ी घटनाये हुईं। 1885 में कांग्रेस की स्थापना हुई और 1888 में गांधी जी बैरिस्टर की पढ़ाई करने के लिए लंदन पहुंचे, यहीं से गांधी जी के विचारों का प्रकटीकरण शुरू हो गया।

इतिहासकार कृष्णानंद सागर के अनुसार गांधी जी गए तो पढ़ाई करने थे लेकिन वहां की जीवनशैली और अंग्रेजों से इतने अधिक प्रभावित हो गए कि उन्होंने अपनी आर्थिक स्थिति की चिंता न करते हुए अंग्रेजों की तरह ही वेशभूषा और रहन-सहन शुरू कर दिया। कुछ समय के बाद उनके पास पैसे खत्म होने लगे, उन्होंने अंग्रेजों की नकल करना तो छोड़ दिया लेकिन वे तब तक दिल से अंग्रेज बन चुके थे और इसकी छाप उनके आगे के पूरे जीवन में दिखाई दी।

गांधी जी अपनी पढ़ाई पूरी कर भारत वापस लौट आये। यहां उन्हें वकालत में कोई सफलता नहीं मिली। अचानक उन्हें एक व्यापारी के द्वारा दक्षिण अफ्रीका जाकर उनकी फर्म के लिए काम करने का प्रस्ताव मिला। 1893 में वे दक्षिण अफ्रीका पहुंच गए। अभी तक उनका संपर्क कांग्रेस से नहीं हुआ था। उधर कांग्रेस में दो फाड़ होते नजर आ रहे थे। एक पक्ष जो अंग्रेजों के आधीन रहते हुए सत्ता की मलाई प्राप्त करते रहना चाहता था और स्वयं को किसी विपक्षी दल के रूप में दिखाने के प्रयास को ही ठीक मानता था, वहीं दूसरी ओर कांग्रेस के अंदर से ही कुछ मुट्ठी भर लोग अंग्रेजों से पूर्ण स्वतंत्रता की मांग भी करने लगे थे।

ऐसा माना जाता है कि गांधी जी दक्षिण अफ्रीका गए तो उन्होंने वहां रह रहे अश्वेतों, विशेष रूप से भारतियों के जीवन को सुधार दिया। क्या वास्तव में ऐसा ही हुआ था या वास्तविकता कुछ और थी। इतिहासकारों ने यहीं से गांधी जी को एक नायक के रूप में प्रस्तुत करना शुरू कर दिया, जो आगे चलकर गांधी जी के कांग्रेस में प्रवेश का आधार बना। गांधी जी ने कभी भी दक्षिण अफ्रीका को अंग्रेजों से मुक्त कराने के लिए कोई आन्दोलन नहीं किया। वे हमेशा अंग्रेजों के बनाए नियमों के आधार पर अश्वेतों के लिए अधिकार की बात करते थे। वास्तव में लंदन में रहने के दौरान गांधी जी के मन में अंग्रेजों की छवि बनी थी कि वे बहुत न्यायप्रिय और अच्छे व्यक्ति होते हैं, इसलिए यहां भी उनका यही मानना था कि कुछ अंग्रेजों की गलतियों के लिए सभी को जिम्मेदार नहीं कहा जा सकता।

भारत में कांग्रेस के अंदर अंग्रेज विरोधी दल सशक्त हो रहा था। विशेष रूप से बंग-भंग आंदोलन के बाद अंग्रेजों को लगने लगा था कि उन्होंने जिस उद्देश्य से कांग्रेस की स्थापना करवाई है, वह असफल हो जायेगा। यही वजह थी कि उन्हें ऐसे व्यक्ति की जरुरत थी, जो दिल से अंग्रेज हो और शरीर से भारतीय। जिसकी छवि भारतियों के मन में अच्छी हो, जो भारतियों के मन में अंग्रेजी सत्ता की स्वीकार्यता को स्थापित कर सके। अंग्रेजों को गांधी जी में सभी गुण दिखे, जिसे वो भारत में खोज रहे थे। यही वजह है कि गांधी जी को अंग्रेज समर्थक कांग्रेसियों से भारत बुलाया गया। गांधी जी 1915 में भारत वापस आ गए। यहां भी उन्होंने प्रारंभ में अंग्रेजों का साथ देने का ही प्रयास किया लेकिन बाद में जनभावनाओं के कारण कई सालों बाद मजबूरन अंग्रेजों भारत छोड़ो का नारा स्वीकार करना पड़ा।

कुछ इतिहासकारों ने बड़ी चालाकी से क्रांतिकारियों के स्वतंत्रता संग्राम में योगदान को नजरअंदाज कर दिया ताकि कोई भी व्यक्ति गांधी जी के बराबर का त्यागी पुरुष न लगे। शहीद भगत सिंह बचपन में गांधी जी के समर्थक थे, लेकिन जलियावाला बाग काण्ड पर गांधी जी की निष्क्रियता से काफी दुखी हुए और क्रांति का रास्ता अपनाया। यदि इस हमले पर मात्र दुःख व्यक्त करने की जगह गांधी जी आंदोलन करते तो यह अंग्रेजों का विरोध होता, जो कांग्रेस नहीं चाहती थी। नेताजी सुभाष चन्द्र बोस को साजिशन कांग्रेस अध्यक्ष पद से हटा दिया गया, वजह बने गांधी जी। उस समय बाल गंगाधर तिलक व लाला लाजपत राय जैसे महापुरुषों की भूमिका और उनके समर्थकों के प्रभाव को कम करने के लिए गांधी जी को इनके विकल्प के रूप में प्रोजेक्ट किया गया।

क्या कारण था कि क्रांतिकारियों को चुन-चुन कर शहीद करने वाली अंग्रेज सरकार गांधी जी को गिरफ्तार तो करती थी, लेकिन इस बात का भी विशेष ध्यान रखती थी कि उन्हें एक लाठी भी न लगे। गांधी जी पर अंग्रेजों की ऐसी ही विभिन्न मेहरबानियों से स्पष्ट है कि उनके और अंग्रेजों के बीच एक समझौता था कि हम सबके सामने लड़ेंगे लेकिन एक-दूसरे को नुकसान से हमेशा बचायेंगे। अंग्रेजों के भारत से जाने के पीछे दो बड़े कारण थे, पहला क्रांतिकारियों और कांग्रेस के गरम दल के लोगों का बढ़ता प्रभाव और दूसरा द्वितीय विश्व युद्ध में ब्रिटिश शासन का कमजोर होना। यदि क्रांतिकारी न होते तो शायद देश कभी स्वतंत्र नहीं हो पाता। ऐसे में क्या गांधी जी का जन्मदिन मनाना देशभक्त स्वतंत्रता सेनानियों का अपमान नहीं होगा।

लेखक मातृभूमि समाचार के संपादक हैं.

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