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शरद पूर्णिमा पर विशेष : महर्षि वाल्मीकि एक परिचय

नाम                  :    महर्षि वाल्मीकि
वास्तविक नाम  :    रत्नाकर

पिता                 :    प्रचेता (कहीं कहीं वरुण या आदित्य भी कहा गया है)
मां                    :    चर्षिणी
भाई                  :    भृगु
जन्म                 :    आश्विन पूर्णिमा
रचना               :     रामायण

महर्षि कश्यप और अदिति के नवें पुत्र वरुण (आदित्य) से इनका जन्म हुआ। वरुण का एक नाम  प्रचेता भी है। वाल्मीकि रामायण में स्वयं वाल्मीकि कहते हैं कि वे प्रचेता के पुत्र हैं। इनकी माता चर्षिणी और भाई भृगु थे। उपनिषद् के अनुसार वाल्मीकि भी अपने भाई भृगु की भांति परम ज्ञानी थे। हमने किस परिवार या समाज में जन्म लिया, इससे जीवन के कर्मफल का निर्धारण नहीं होता। भारतीय वेदों की यह घोषणा संपूर्ण पृथ्वी के लिए सार्वकालिक है कि ‘जन्मत: शूद्र जायते।’ जन्म से हम सभी शूद्र हैं।

श्रीराम वनवास काल के दौरान वाल्मीकि ऋषि के आश्रम भी गए थे। रामचरितमानस में संत तुलसीदास जी लिखते हैं :
‘देखत बन सर सैल सुहाए। बालमीक आश्रम प्रभु आए।।’
‘तुम त्रिकालदर्शी मुनिनाथा, विश्व बिद्र जिमि तुमरे हाथा।’
यानी आप तीनों लोकों को जानने वाले स्वयं प्रभु हैं। ये संसार आपके हाथ में एक बेर के समान प्रतीत होता है।

महर्षि वाल्मीकि ने श्रीराम के जीवन के माध्यम से हमें जीवन के सत्य और कर्त्तव्य से परिचित कराने वाले पवित्र संस्कृत महाकाव्य ‘रामायण’ की रचना की. रामायण में अनेक घटनाओं के घटने के समय सूर्य, चंद्र तथा अन्य नक्षत्रों की स्थितियों का वर्णन किया गया है। इससे पता चलता है कि वे ज्योतिषशास्त्र और खगोलशास्त्र के भी प्रकांड पंडित थे। वाल्मीकि जी आदिकवि हैं। संस्कृत का पहला श्लोक उन्होंने ही रचा था। प्रथम संस्कृत महाकाव्य रामायण की रचना के कारण भी उन्हें आदिकवि कहा जाता है।

आदिकवि वाल्मीकि की कृति रामायण में  ऐतिहासिक काव्य और  अलंकृत काव्य दोनों पाये जाते हैं। इस कृति  में केवल युद्धों और विजयों का ही वर्णन नहीं है बल्कि  प्रकृति का भी वर्णन है। रामायण की संस्कृत भाषा में 25 से अधिक अनुकृतियां हैं। फादर कामिल बुल्के के अनुसार स्थानीय भाषाओं में यह संस्करण 300 हैं। वाल्मीकि रामायण रामकथा का सबसे पुराना संस्करण है।

एक दिन महर्षि वाल्मिकी प्रातः काल तमसा नदी में स्नान करने गए। स्नान के पश्चात  नदी किनारे टहलते हुए उन्हे क्रौंच पक्षियों  का  एक जोड़ा दिखाई दिया। परस्पर समागम के आनंद में लीन।  अचानक उनमें से एक पक्षी को  एक निष्ठुर तीर आकर लगा और  उस पक्षी ने वाल्मिकी के समक्ष अपने प्राण त्याग दिये। यह दारुण दृश्य देखकर महर्षि  का मन विकल हो गया और उनके कंठ से एक श्लोक निकला

मा निषाद प्रतिष्ठां त्वमगमः शाश्वतीः समाः ।
यत्क्रौंचमिथुनादेकमवधी काममोहितम् ।।

रामायण की रचना के साथ ही काव्य में रस की अवधारणा भी प्रतिष्ठित हुई। रामायण के आरंभ में कहा गया है कि क्रोंच के लिए विलाप करती क्रोंची को देखकर वाल्मीकि के भीतर जो शोक उत्पन्न हुआ। वही श्लोक के रूप में ढल गया। शोक करुण रस का स्थायी भाव है। रामायण में इसलिए करुण रस को प्रधान माना गया है। पर करुण के साथ साथ अन्य रस भी रामायण में अभिव्यक्त हुए, जो रसों के अलग अलग नाम से सूचित किए गए हैं। इस प्रकार काव्य में गुड़ रीति, वक्रोक्ति, अलंकार आदि का विचार वाल्मीकि रामायण से ही प्रारम्भ हुआ।

वाल्मीकि रामायण को आर्ष महाकाव्य कहा जाता है। आर्षा का अर्थ हैं ऋषि द्वारा रचा गया। रामायण साहित्य विश्व के शीर्षस्थ साहित्य में अपना विशिष्ट स्थान रखता है। संस्कृत भाषा का यह साहित्य अकारण ही उपलब्ध नहीं हुआ अपितु भारत के महमनीषियों की ज्ञान जिज्ञासा का परिणाम स्वरूप है। रामायण इस देश एवं विदेश के बड़े साहित्य भंडार की प्रेरणा स्त्रोत है। रामायण की प्रधानता यही है की इसमे घर घर की बातों का समावेश है। रामायण ने अनगिनत लेखकों की प्रतिभा शक्ति को प्रेरित पल्लवित और पुष्पित किया है। रामायण के संबंध में इतिहासकार प्रोफ वींटर्मिट्ज़ लिखते हैं।“ रामायण ने भारतीय चिंतन और मानस पर युगों युगों तक गहरा और स्थायी प्रभाव उत्पन्न किया है। भारत के सभी जातियों और धर्मों के लोग रामायण को एक पवित्र ग्रंथ मानते हैं भारत के सभी कवियों में रामायण के अक्षय कोश को सदेव अपना उपजीय माना है”।

वामपंथी विचारधारा से प्रेरित लोगों  द्वारा ये कुतर्क किया जाता है कि रामायण कि लोकप्रियता 19वीं शताब्दी के दौरान बढ़ी। मगर इसके विपरीत तमाम क्षेत्रीय भाषाओं में रामकथा तो बहुत पहले से प्रचलित थी। रामायण के विभिन्न संस्करण उत्तर प्रदेश, पूर्वी भारत, दक्षिण भारत, पश्चिम भारत से लेकर पंजाब और कश्मीर तक मिलते हैं।

असम में राम का प्राचीनतम उल्लेख ईसा पूर्व 600-650 में महान शासक भास्कर बर्मन के दूबी तामपत्रों में मिलता है। कौशाम्बी में मिले ईसा पूर्व दूसरी शताब्दी के टेराकोटा में रावण द्वारा सीताहरण का चित्रण है। तीन शुरुआती बौद्ध ग्रंथों-‘दशरथ कथानम’, ‘अनामकम जातकम’ और ‘दशरथ जातक’में रामचरित दिखाई देता है। पहली-दूसरी शताब्दी ईस्वी में लिखी गई ‘दशरथ कथानम’का मूल पाठ अब उपलब्ध नहीं, लेकिन 472 ईस्वीं का चीनी अनुदित संस्करण अब भी मौजूद है।

दशरथ जातकजेतवन में गौतम बुद्ध का वर्णन करता है, जहां वे पिता की मृत्यु से शोकसंतप्त एक व्यक्ति को सलाह दे रहे हैं, ‘‘बंधु, जो पूरी दुनिया की आठ स्थितियों को भलीभांति जान चुका हो उसे पिता की मृत्यु पर कोई शोक नहीं होना चाहिए।’’ बुद्ध ने राम की कहानी सुनाई और कहा कि पूर्व जन्म में वही राम थे। यह दिलचस्प है, क्योंकि यह उस विचारधारा को नकारता है जिसके तहत यह आरोप लगाया गया, ‘‘बुद्ध को विष्णु का अवतार मानना हिंदू परंपरा में बाद की अवधि में स्थापित और राजनीतिक रूप से प्रेरित दलील थी।’’

जैन साहित्य के अनुसार, ‘‘रावण को लक्ष्मण ने मारा था, क्योंकि राम एक परम आत्मा थे, जिन्होंने अपनी इन्द्रियों पर विजय प्राप्त कर ली थी और मनुष्य के रूप में यह उनका आखिरी जन्म था और वह किसी का वध नहीं करना चाहते थे।’’ मथुरा में कुषाण काल के पत्थर के एक खंभे पर दशरथ को पुत्र प्राप्ति के लिए पुत्रकामेष्टि यज्ञ कराने वाले ऋषि श्रृंगी की कहानी का चित्रण मिलता है। इस खंभे को मथुरा में पुरातत्व सर्वेक्षण संग्रहालय में रखा गया है। मथुरा में मिले गुप्तकाल के एक पैनल में रावण को कैलाश की चोटी झकझोरते दिखाया गया है जिसका वर्णन उत्तरकांड में मिलता है। गुप्तकाल के विभिन्न पत्थरों और टेराकोटा पैनलों में रामायण के कई दृश्य चित्रित किए गए हैं- जैसे सीता-हरण के बाद आगे की योजनाओं पर विचार-विमर्श करते राम और लक्ष्मण, एक विशालकाय व्यक्ति को भिक्षा देती एक स्त्री जो स्पष्ट तौर पर बदले वेश में रावण ही है

गोंडा के कच्ची कुटि और बहराइच से मिले पांचवीं शताब्दी के टेराकोटा पैनलों में एक बंदर को दोनों हाथों से गदा घुमाते हुए तलवार थामे एक योद्धा पर हमला करते दिखाया गया है। इनमें हनुमान की अन्य पराक्रम कथाओं और लक्ष्मण से प्रेम का अनुनय करती शूर्पणखा को भी दिखाया गया है। झांसी जिले के देवगढ़ के प्रसिद्ध गुप्तकालीन दशावतार मंदिर (छठी शताब्दी) के अवेशेषों में राम और कृष्ण की कथाओ को संजोए पत्थरों के पैनल मिले हैं। देवगढ़ (उत्तर प्रदेश ), के गुप्तकालीन मंदिर से मिला एक शिलापट ,(बाएँ से दायें) राम, सीता, लक्ष्मण के नीचे शूर्पणखा को दर्शाया गया है

देश के प्रमुख वाल्मीकि मंदिर 

वाल्मीकि तीर्थ अमृतसर

अमृतसर से 11 किमी दूर अमृतसर-चोगावा रोड पर प्राचीन व ऐतिहासिक धार्मिक स्थल ‘श्री वाल्मिकी तीर्थ मंदिर’ स्थित है । इस पावन स्थली का इतिहास रामायण काल से जुड़ा है । ऐसी मान्यता हैं कि माता सीता ने इसी स्थान पर रहकर लव कुश को जन्म दिया । ऋषि वाल्मिकी ने इसी स्थान पर भगवान  राम के दोनों  पुत्र लव और कुश को शस्त्र और शास्त्र कि शिक्षा भी दी । इसी मंदिर के प्रांगण में  स्थित है  सरोवर । ऐसी मान्यता है कि   सरोवर को हनुमान ने खोद   कर बनाया था। आज वाल्मीकि मंदिर  इस प्राचीन सरोवर में देश के विभिन्न स्थानों से साधु संत स्नान करने आते हैं ।

महर्षि वाल्मिकी आश्रम ,बागपत

मेरठ से करीब 27 किलोमीटर दूर बागपत का एक गांव है बलैनी। यह गांव बागपत शहर से भी करीब 23 किलोमीटर दूर है। मेरठ से बागपत की तरफ जाते समय करीब 27 किलोमीटर दूर अंदर की तरफ एक रास्ता जाता है। इस रास्ते पर थोड़ा आगे जाने पर एक आश्रम दिखार्इ देता है। यही है  ऋषि वाल्मीकि  आश्रम  ।हिंडन नदी के पास स्थापित  इस मंदिर  की अपनी   मान्यताएँ  हैं, जैसे  वाल्मिकी ने रामायण को यहीं पर लिपिबद्ध किया। आश्रम के ही परिसर में माता सीता का एक  मंदिर भी  है। हर साल यहाँ पर  दशहरे  का मेला बड़े ही  हर्षोल्लास  से मनाया जाता है । उत्तर प्रदेश राज्य पुरातत्व विभाग के अनुसार इस मंदिर का जीर्णोद्धार पेशवा बाजीराओ द्वितीय द्वारा 19वीं सदी के पूर्वार्ध में कराया गया था और आज हजारों की तादाद में हिन्दू श्रद्धालु यहाँ हर वर्ष आते हैं।

महर्षि वाल्मीकि मंदिर, थिरुवन्मियूर, चेन्नई

ऐसी मान्यता हैं रामायण को लिपिबद्ध करने के बाद  महर्षि वाल्मीकि दक्षिण कि ओर गए और कुछ समय उन्होने इस स्थान पर बिताया। 1300 वर्ष पूर्व इस मंदिर को  चोल साम्राज्य के शासन के दौरान बनाया गया। प्रसिद्ध  मरुण्डईश्वर शिव मंदिर के समीप इस वाल्मिकी मंदिर में हर वर्ष के मार्च में ब्रह्मोत्सवम नाम का पर्व मनाया जाता है । जिसमे हजारों की तादाद में हिन्दू श्रद्धालु इक्कठे होते हैं ।

नीला गुंबद मंदिर  लाहोर

पाकिस्तानी पंजाब सूबे के लाहौर शहर ने विभाजन से पहले दोनों देशों  का साझा  हिन्दू इतिहास देखा  हैं। लाहोर शहर के नीला गुंबद इलाके में स्थित वाल्मीकि मंदिर इसका गवाह है जहां की दीवारों पर उर्दू भाषा  में रामायण के श्लोक लिखे हैं । बटवारे से पहले लाहोरे में 300000 हिन्दू रहा करते थे मगर आज ये आकडा बहुत सीमित हो चुका है ।लाघबघ 1607।

देश के अन्य प्रमुख वाल्मीकि आश्रम

भगवान वाल्मीकि आश्रम, चित्रकूट

भगवान वाल्मीकि आश्रम, हरिद्वार

वाल्मीकि मंदिर, चंडीगढ़

वाल्मीकि भवन, पटियाला

साभार : प्रेरणा मीडिया संस्थान

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