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वाद , विवाद और संवाद के नामवर

–  डॉ०घनश्याम बादल

बनारस के जीयनपुर में 28 जुलाई 1926 को पैदा हुए नामवर सिंह अपने समय के ही नहीं अपितु हिंदी आलोचना के एक सर्वकालिक ऐसे आलोचक के रूप में उभरकर आए थे जो स्पष्ट रूप से अपने द्वारा स्थापित किए गए प्रतिमानों की भी आलोचना करने से नहीं चूकते थे  ।वह स्पष्ट कहते थे मेरा लिखना केवल संग्रह के लिए लिखना नहीं है और मैं केवल तब लिखता हूं जब वह वर्तमान के संदर्भ में कुछ हस्तक्षेप करने लायक स्थिति में हो ।

बनारस में रहते हुए मार्क्सवाद से प्रभावित नामवर सिंह ने समय के साथ कई करवट बदली , एक समय था जब उनके  एक कमरे  वाले आवास में महान मार्क्सवादी चिंतकों की तस्वीरें सजी रहती थी और अपने  एक कमरे के जीवन में नामवर सिंह गहन अध्ययन में लीन रहते थे । युवा अवस्था का यह अध्ययन नामवर सिंह को नामचीन बनाने में सबसे ज्यादा काम आया । वें युवााओं कहते भी थे लिखनें की जल्दी मत करो  पहले खुद खूब पढ़ो और फिर ऐसा लिखो कि लोग पढ़ें न  कि उसे प्रायोजित करना पड़ें ।

कभी चुनाव लड़कर राजनीति में सक्रिय हस्तक्षेप करने की चाह रखने वाले नामवर सिंह हिंदी में आलोचना की एक ऐसे प्रखर हस्ताक्षर बनकर उभरे की हिंदी आलोचना उनके इर्द गिर्द घूमती रही नामवर सिंह स्वयं कहते थे कि मैं ऐसी आलोचना लिखना पसंद करता हूं जो वाद विवाद और संवाद की संवाहक बने । अपनी इसी सोच के चलते नामवर सिंह दिल्ली आए और फिर दिल्ली के ही हो कर रह गए । बेशक , दिल्ली की आबोहवा का उन पर गहरा असर हुआ विद्वता वे साथ लाए थे और व्यवहारिकता और चतुराई तथा पावर गेम के पुरोधा बने कि उनकी कहानी नामवर  दिल्ली में  गढी गई और हां, साहित्यकार होने के बाद भी प्रोपगैंडिस्ट और राजनैतिक होने के आरोप भी उनके विरोधी उन पर लगाते रहे ।मगर इन सब से विरत नामवर सिंह अपने नाम के अनुरूप नाम कमाते रहे ।

नामवर सिंह को प्रतिमान” के लिए शलाका सम्मान हिंदी अकादमी, दिल्ली की ओर से ‘साहित्य भूषण सम्मान, ‘ उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान की ओर से शब्दसाधक शिखर सम्मान – 2010 (‘पाखी’ तथा इंडिपेंडेंट मीडिया इनिशिएटिव सोसायटी की ओर से)महावीरप्रसाद द्विवेदी सम्मान – 21 दिसम्बर 2010 मिले जिनके वें हकदार थे ।नामवर सिंह ने प्रोफेसरी , लेखन, संपादन ,आलोचना के साथ – साथ कहानी कविता और दूसरी कई अन्य विधाओं में न केवल हाथ आजमाया बल्कि जिस भी क्षेत्र में मे गए वहां पर अपना वर्चस्व और आधिपत्य भी स्थापित किया ।

नामवर सिंह ऐसे शख्स थे जो बहती हुई धारा में शामिल नहीं होते थे वें  कभी भी लेखकों या संपादकों की भीड़ का हिस्सा नहीं बने बल्कि हमेशा अपने व्यक्तित्व को वैशिष्ट्यता का पर्याय बना कर रखा । नामवर सिंह पहले से स्थापित प्रतिमानों को फोलोअप नहीं करते थे बल्कि जरूरत होने पर बड़े से बड़े और नामचीन विद्वानों के द्वारा स्थापित किए गए प्रतिमान की आलोचना करने और उन्हें अपने ही ढंग से व्याख्यायित करने में गुरेज नहीं करते थे।  पंडित हजारी प्रसाद द्विवेदी के शिष्य नामवर सिंह अपने से पहले बहु प्रतिष्ठित हो चुके नागेंद्र की आलोचना की ऐसी आलोचना करने में कामयाब रहे कि नागेंद्र की आलोचना नामवर के आते ही कालपार मानी जाने लगी ।  रामविलास शर्मा के साथ उनके व्यक्तिगत मतभेद सार्वजनिक होते रहते थे और वर्चस्व की लड़ाई में दोनों विद्वान अक्सर उलझते रहते थे लेकिन जब आलोचना की बात आती तो दोनों के दोनों अज्ञेय के विरोधी खेमे में कमर कस कर तैयार तत्पर और उद्यत नजर आते थे ।

नामवर सिंह आपातकाल से पहले आलोचना के लाइट हाउस बन कर उभरे और अपनी तीखी तल्ख टिप्पणियों से उन्होंने किसी को नहीं बख्शा । मगर आपातकाल के दौरान उनका कायाकल्प देखा गया उनके विरोधी उन्हें सत्ता विमर्श का एक अंग मानने लगे । हालांकि नामवर सिंह की लेखनी का मुकाबला करने की कुव्वत और उनके बराबर के कद का आलोचक उनके विरोधी खेमे में कभी नहीं हो पाया  ।

2018 में उनके 4 पुस्तक संग्रह   कविता की जमीन और जमीन की कविता’,‘प्रेमचन्द और भारतीय समाज’, ‘हिन्दी का गद्यपर्व’ और ‘जमाने से दो-दो हाथ’। एक साथ आई जिन का संपादन अवध किशोर ने किया और उनके प्रखर विरोधी जगदीश चतुर्वेदी ने इन पुस्तकों पर काफी व्यंग्यात्मक टिप्पणियां की लेकिन जब यह बात नामवर जी तक पहुंची तो बहुत कम बोलने वाले नामवर जी ने मुस्कुराते हुए इन टिप्पणियों को खारिज करते हुए उन पर टिप्पणी तक करने से मना कर दिया और कहा मैं अपना काम कर रहा हूं और वे लोग अपना काम कर रहे हैं   । वर्ष 2018 में ही  उनकी पाँच  और पुस्तकें  आलोचना और संवाद ,पूर्वरंग, द्वाभा, छायावाद: प्रसाद, निराला, महादेवी और पंत तथा रामविलास शर्मा प्रकाशित हुईं, जो उनके अब तक के अप्रकाशित एवं असंकलित लेखन पर आधारित थीं।

नामवर सिंह जहां निर्विवाद रूप से एक प्रखर मेधा के धनी लेखक और विद्वता में बेजोड़ थे । वहीं वाद विवादों में रहना उनका शगल बन गया था उनके विरोधी अक्सर कहते थे नामवर जी बिना विवादों के रह ही नहीं सकते और अगर मैं कोई विवाद पैदा न करें तो बहुत जल्द ही नेपथ्य में चले जाएंगे । मगर 90 साल के होने के बावजूद नामवर सिंह मानसिक रूप से कमजोर पड़े थे और नहीं उन्होंने बेलाग बेलोस टिप्पणियां करना छोड़ा था । जब उन्होंने नई कहानी की कहानी लिखनी शुरू की तो उन्होंने तब तक हिंदी साहित्य की पहली नई कहानी माने जाने वाली राकेश मोहन की कहानी  ‘मलबे के मालिक’ को यह कहकर खारिज कर दिया था की यह ‘एक अधूरा अनुभव’ था   उन्होंने उसके प्रमुख कथाकारों मोहन राकेश, राजेंद्र यादव और कमलेश्वर की त्रयी की कहानियों के बरक्स निर्मल वर्मा की कहानी ‘परिंदे’ को पहली ‘नयी’ कहानी के रूप में मान्यता दीतो काफी बबाल मचा था मगर बबाल खड़ा कर भूमिगत हो जाना नामवर की शिफत थी ।

आज नामवर नहीं हैं , उनकी पार्थिव देह चली गई पर नामवर नहीं जाएंगे , आलोचना का उनका खड़ा किया लाइट हाउस रोशनी देता रहेगा , उनके वाद विवाद और संवाद तथा प्रतिमान उनकी याद दिलाते रहेंगे । उनका जाना एक बड़ा खाली पन छोड़ गया है । भले ही लेखनी की जगह कंप्यूटर और तकनीकी ले रही है पर नामवर बने रहेंगे । एक मई को अपना जन्मदिन मनाने वाले साहित्य के नामवर मजदूर नामवर सिंह को सचची श्रद्धांजलि नामवर की लेखन परंपरा को आगे बढ़ाना ही होगी देखें कौन और कब तक तथा कितना बढ़ा पाता है ।

 

लेखक वरिष्ठ साहित्यकार एवं स्तंभकार हैं

नोट : लेख में लेखक द्वारा व्यक्त विचारों से मातृभूमि समाचार का सहमत अथवा असहमत होना आवश्यक नहीं है।

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