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जैन धर्म में गुरु का स्वरूप

– डॉ. शुद्धात्मप्रकाश जैन

जैन शिक्षादर्शन में गुरु का बहुत ऊंचा स्थान है। लोक में यद्यपि शिक्षक को गुरु कहते हैं, लेकिन जैनदर्शन में गुरु नग्न दिगम्बर साधु होते हैं। वे मुक्तिमार्ग के पथिक और चलते-फिरते सिद्धों के समान होते हैं। गुरु शब्द का अर्थ महान् होता है। गु- अंधकार और रु- दूर करना। अर्थात् जो अंधकार को दूर करे, वह गुरु है। कहा है-

‘‘अज्ञानतिमिराधानां ज्ञानांजनशलाकया।

चक्षुरुरुन्मीलितं येन, तस्मै श्रीगुरवे नमः।।’’

जैन परम्परा में सम्यग्दर्शन-ज्ञान-चारित्र के द्वारा जो परम पद को प्राप्त कर चुके हैं, उनको गुरु कहा जाता है। भगवती आराधना में तो आचार्य, उपाध्याय एवं साधु परमेष्ठी को गुरु कहा गया है। पंचेन्द्रियों के विषयों की आशा से रहित, सर्वप्रकार के आरंभ और परिग्रह से रहित, ज्ञान, ध्यान और तप में सदा लीन रहनेवाले तपस्वी साधु ही गुरु हैं-

विषयाशावशातीतो निरारंभोऽपरिग्रहः।

ज्ञानध्यानतपोरक्तस्तपस्वी स प्रशस्यते।।

यद्यपि लोक में अध्यापक, माता-पिता आदि को भी गुरु कहा जाता है, जैनधर्म में मुक्ति के मार्ग का प्रकरण है, अतः यहां जिन गुरुओं को लिया गया है वे पंचपरमेष्ठी ही हैं। पंचपरमेष्ठीस्वरूप गुरु के स्वरूप को समझने में अत्यन्त सावधानी की आवश्यकता है, क्योंकि गुरु तो मुक्ति के साक्षात् मार्ग-दर्शक होते हैं। यदि उनके स्वरूप को भली-भांति न समझा गया तो मिथ्या गुरु (कुगुरु) के संयोग से पथ-भ्रष्ट हो जाने की संभावना अधिक रहती है।

भगवान महावीर के दर्शन में पंचपरमेष्ठी ही सच्चे गुरु है। धार्मिक क्षेत्र में आचार्य, उपाध्याय और साधु गुरु कहलाते हैं, क्योंकि वे प्राणी मात्र को उपदेश देकर अथवा बिना उपदेश दिये ही केवल अपनी जीवनचर्या द्वारा कल्याण का मार्ग बताते हैं, जिसे पाकर वह सदा के लिए कृतकृत्य हो जाता है। इसके अतिरिक्त विरक्तचित्त सम्यक्दृष्टि श्रावक भी उपर्युक्त कारणवश ही गुरु संज्ञा को प्राप्ति होते हैं। दीक्षागुरु, शिक्षागुरु, परम गुरु आदि के भेद से गुरु कई प्रकार के होते हैं।

जैन शिक्षा के आचार्यों पर भगवान महावीर और उनके पूर्ववर्ती तीर्थंकरों की छाप थी। वे अपना जीवन और शक्ति मानव को सत्पथ दिखाई के प्रयत्न में ही लगा देते थे। गुरु के लिए जैनदर्शन में परमेष्ठी शब्द आया है। परमेष्ठी पांच होते हैं- 1. अरंहंत, 2. सिद्ध, 3. आचार्य, 4. उपाध्याय और 5. साधु।

(क) अरहंतं-

अरहंत को त्रिलोक का गुरु कहा जाता है। जिस व्यक्ति के व्यक्तित्व का विकास इस स्तर तक हो जाता है कि उसके ज्ञान, दर्शन सुख और शक्तियों को सीमाओं में नहीं बाॅंधा जा सकता। जो राग-द्वेष-मोह से मुक्त हैं, चार घातिया कर्मों को नाश कर चुके हैं और उनके अभावस्वरूप अनन्त चतुष्टय (अनन्त दर्शन, अनन्तज्ञान, अनन्तसुख और अनन्तबल) प्रकट हुए हैं, वे अरहंत कहलाते हैं। ये ही प्रथम गुरु हैं।

अरहंत का स्वरूप बतलाते हुए आचार्य कुन्दकुन्द ने नियमसार में लिखा है-

‘‘घणघाइकम्मरहिया केवलणाणाइ परमगुणसहिया।

चौतीस अदिसअजुत्ता अरहंता एरिसा होंति।।’’

अरहंत के उपदेशों के माध्यम से व्यक्तित्व के चरम विकास की ओर अग्रसर होने की शिक्षा प्राप्त होती है। श्रावक (गृहस्थ व्यक्ति) सामाजिक जीवन से धीरे-धीरे अपने को संरक्षित करते हुए साधक जीवन की ओर बढ़ता है।

मोक्षमार्ग के उपदेष्टा होने से अरहंत का पांच परमेष्ठियों में सर्वप्रथम स्थान है, इसलिए अरहंत को परम गुरु माना गया है।

(ख) सिद्ध-

सिद्ध परमेष्ठी उपदेश नहीं देते, क्योंकि वे शरीर-रहित होते हैं, परन्तु उनको नमस्कार ‘ओम् नमः सिद्धेभ्यः’ कहकर अध्ययन का प्रारम्भ किया जाता है, अतः वे उपचार से गुरु माने गये हैं। सिद्ध को भी परम गुरु माना गया है। बालक को अक्षरारम्भ कराते समय जो सर्वप्रथम मंत्र दिया जाता है उसमें सिद्धों को नमस्कार किया गया है। आदिपुराण और गद्य-चिन्तामणि आदि में ‘सिद्धं नमः’ इस मंत्र का उच्चारण करके अध्ययन का श्रीगणेश बताया गया है। आज भी विद्यारम्भ के समय ‘ओ ना मा सीधम्’ का उच्चारण कराया जाता है, जो कि इसी मंत्र का विकृत रूप है। सिद्ध के स्वरूप को बताते हुए आचार्य कुन्दकुन्द ने लिखा है-

‘‘णिकम्मा अट्ठगुणा किंचूणा चरमदेहेहदो सिद्धा।

लोयग्गणिदा णिच्चा उप्पादवयेहिं संजंजुत्ता।’’

अर्थात् सिद्ध भगवान, उत्पाद व्यय से युक्त, निष्कर्म, अष्टगुण-संयुक्त, चरम देह से कुछ न्यून और सदा लोकाग्र में स्थित रहते हैं।

(ग) आचार्य-

साधुओं को दीक्षादायक, उनके निवारक तथा अन्य अनेक गुण विशिष्ट, संघनायक साधु को आचार्य कहते हैं। वीतराग होने से पंचपरमेष्ठी में उनका स्थान है। नियमसार में लिखा है-

‘‘पंचाचार-समग्गा पंचिंदियदंतिदप्प णिद्धलणा।

घोरा गुणगंभीरा आयरिया एरिसा होंति।।’’

अर्थात् जो ज्ञान, दर्शन, चारित्र, तप, वीर्य- इन पांच आचारों से परिपूर्ण पांच इन्द्रिय रूपी हाथी के मद को दलने वाले धीर और गुण-गंभीर हैं, वे आचार्य हैं। व्रत, तप, शील और संयम आदिको धारण करने वाला आचार्य ही नमस्कार करने योग्य है और वही साक्षात् गुरु है। उससे अन्य कोई न तो आचार्य हो  सकता है। और न ही गुरु। यथा-

‘‘उक्त व्रत तपः शील संयंयमादिधरो गणी।

नमस्य सः गुरुः साक्षात्तदन्यो न गुरुर्गणी।।’’

(घ) उपाध्याय-

आज भी अनेक उपाध्याय अपने संघस्थ साधुओं को धर्मग्रन्थों की शिक्षा देते हैं। उपाध्याय का स्वरूप आ. कुन्दकुन्द ने नियमसार में ऐसे बताया है-

‘‘रयणत्तय संजुत्ता जिण कहिय पयत्थदेसेसा सूरा।

णिक्कंस भावसहिया उवज्झाया एरिसा होंति।।’’

अर्थात् जो सम्यक् दर्शन, ज्ञान और चारित्र इन तीन रत्नों से युक्त जिनेन्द्र द्वारा कहे गये पदार्थों का उपदेश करने से कुशल और आकांक्षारहित हैं, वे उपाध्याय हैं। मूलाराधना में लिखा है कि जिन देव द्वारा कथित द्वादशांग, चैदह पूर्व को जो विद्वान् स्वाध्याय कहते हैं, उस स्वाध्याय का उपदेश करने के कारण उपाध्याय कहलाते हैं।

‘‘वारसेगेगं जिणाक्खादं सज्झाय कथितं बुधे।

उवदेसेइ सज्झायं तेणुवज्झाय उच्चादि।।’’

जैन परम्परा में उपाध्याय का महत्त्वपूर्ण स्थान है। उपाध्याय का कार्य है सूत्र की वाचना देना, अतः वे गुरु माने गये हैं। क्रमशः उपाध्याय का ‘ओझा’ बना और ओझा का ‘झा’ बन गया, जो आज प्रचलित है।

(ड़) साधु-

पांच परमेष्ठियों में साधु परमेष्ठी का पांचवां स्थान है। आचार्य कुन्दकुन्द ने नियमसार में साधु का स्वरूप बताया है-

‘‘वावार विप्पमुक्का उव्विहारा हणासयारत्ता।

निग्गंथा णिम्मोहा साहु एदेरिसा होंति।।’’

अर्थात् जो सभी प्रकार के व्यापार से रहित हो। सम्यग्दर्शन, सम्यक् ज्ञान, सम्यक् चारित्र और तप रूप चार प्रकार की आराधना में लीन रहते हैं, बाहरी, भीतरी परिग्रह रहित तथा निर्मोही हैं। वे ही साधु हैं।

निरन्तर आत्मस्वरूप की साधना करने वाले साधुओं के स्वरूप का वर्णन करते हुए आचार्यकल्प पं. टोडरमलजी लिखते हैं- ‘‘जो विरागी होकर, समस्त परिग्रह का त्याग करके शुद्धोपयोग रूप मुनिधर्म अंगीकार करके अंतरंग में तो उस शुद्धोपयोग द्वारा अपने को आपरूप अनुभव करते हैं, परद्रव्य में अहं बुद्धि धारण नहीं करते तथा अपने ज्ञानादिक स्वभावको ही अपना मानते हैं, परभावों में ममत्व नहीं रखते, तथा जो परद्रव्य व उनके स्वभाव ज्ञान में प्रतिभासित होते हैं, उन्हे जानते तो हैं, परन्तु इष्ट-अनिष्ट मानकर उनमें राग-द्वेष नहीं करते, शरीर की अनेक अवस्थायें होती हैं, बाह्य नाना निमित्त बनते हैं, परन्तु वहां कुछ भी सुख-दुःख नहीं मानते तथा अपने योग्य बाह्य क्रिया जैसे बनती है वैसे बनती हैं, खींचकर उनको नहीं करते, तथा अपने को अधिक नहीं भ्रमाते हैं, उदासीन होकर निश्चलवृत्ति को धारण करते हैं, तथा कदाचित् मंदराग के उदय से शुभोपयोग भी होता है उससे जो शुद्धोपयोग के बाह्य साधन हैं उनमें अनुराग करते हैं, परन्तु उस रागभाव को हेय जानकर दूर करना चाहते हैं, तथा तीव्र कषाय के उदय का अभाव होने से हिंसादि रूप अशुभोपयोग परिणति का तो अस्तित्व ही नहीं रहा है, तथा ऐसी अंतरंग अवस्था होने पर बाह्य दिगम्बन सौम्यमुद्राधारी हुए हैं, वनखण्डादि में वास करते हैं, अट्ठाईस मूलगुणों का अखण्डित पालन करते हैं, बाईस परिसहों कोसहन करते हैं, बारह प्रकार के तपों को आदरते हैं, कदाचित् ध्यानमुद्रा धारण करके प्रतिमावत् निश्चल होते हैं, कदाचित् अध्यययनादिक बाह्य धर्मक्रियाओं में प्रवर्तते हैं, कदाचित् मुनिधर्म के सहकारी शरीर की स्थिति के हेतु आहार-विहारादि क्रियाओं में सावधान होते हैं- ऐसे जैन मुनि हैं उन सबकी ऐसी अवस्था होती हैं।’’

आचार्य और उपाध्याय की तरह साधु भी मुनि के आचार का पालन करता है। अन्तर मात्र इतना है कि न आचार्य की तरह उसका दायित्व संघ की व्यवस्था देखना होता है। मुनि के आचरण का पालन करने वाला व्यक्ति शिष्य भी हो सकता है ओर शिक्षक भी। उपाध्याय से वह स्वयं शिक्षा ग्रहण करता है तथा उपदेशों से माध्यम से अन्य मुनिगण या श्रावक वर्ग को शिक्षा देता है। साधु के 28 मूलगुण बताये गये हैं। भगवान महावीर के पट्ट गणधर इन्द्रभूति गौत्तम के उपरान्त नाम लिये जाने वाले कुंदकुंदाचार्य ने अष्टपाहुड में गुरु के स्वरूप पर विस्तार से प्रकाश डाला है। जहाॅं एक ओर उन्होंने वस्त्रादि बाह्य परिग्रहादि के धारक तथाकथित गुरुओं को मोक्षमार्ग से च्युत माना है, वहीं बाह्य में नग्नदिगम्बर होने पर भी अन्तर में मोह-राग-द्वेष से युक्त हों, उनमें भी गुरुत्व का निषेध करते हुए सावधान किया है। वे लिखते हैं-

जे पंचंचचेलसत्ता गंथग्गाहीय जायणासीला।

आधाकम्मम्मि रया ते चत्ता मोक्खमग्गम्मि।।

जो पांच प्रकार के वस्त्रों में आसक्त हैं, उनमें से किसी प्रकार का वस्त्र ग्रहण करते हैं, याचना करते हैं, अधःकर्म आदि पापकर्मों में रत हैं, सदोष आहार लेते हैं- वे मोक्षमार्ग से च्युत हैं।

यद्यपि जैनगुरु नग्न ही होते हैं। तथापि नग्न हो जाने मात्र से कोई गुरु नहीं हो जाता। उन्हीं के शब्दों में-

दव्वेण सयल णग्गा णारयतिरिया य सयलसंघाया।

परिणामेण्ेण असुद्धा ण भवसवणत्तणं पत्ता।।

णग्गो पावइ दुक्खं णग्गो संसारसायरे भमई।

णग्गो ण लहइ बोहिं जिणभावणवज्जिओ सुइरं।।

भावेण होइ णग्गो मिच्छत्ताई य दोषं चइऊणं ।।

पच्छा दव्वेण मुणी पयडदि लिंगं जिणाणाए।।

द्रव्य से बाह्य में तो सभी प्राणी नग्न होते हैं। नारकी जीव और तिर्यंच जीव तो निरन्तर वस्त्रादि से रहित नग्न ही रहते हैं। मनुष्यादि भी कारण पाकर नग्न होते देखे जाते हैं, तो भी वे सब परिणामों से अशुद्ध हैं, अतः भवभ्रमणपने को प्राप्त नहीं होते हैं। जिनभावना से रहित अर्थात् सम्यग्दर्शन से रहित नग्न-श्रमण सदा दुःख पाता है, संसार-सागर में भ्रमण करता है और वह बोधि (ज्ञान) को चिरकाल तक नहीं पाता है। पहिले मिथ्यात्व आदि दोषों को छोड़कर भाव से अंतरंग नग्न हो अर्थात् एकरूप शुद्ध आत्मा का श्रद्धान, ज्ञान और आचरण कर पश्चात् बाह्य में नग्नता धारण करें यह मार्ग है, यही जिनाज्ञा है। महावीर के दर्शन में ऐसे नग्न दिगम्बर गुरु मानों चलते-फिरते सिद्धों के समान है।

(च) विरक्त चित्त श्रावक-

उक्त पंच परमेष्ठी के अतिरिक्त भी गृहस्थ श्रावक यदि जिनागम का वेत्त होतो उसे भी गुरु के समान स्थान दिया जाता है। पंचमेष्ठी वाले गुरु तो सदा सुलभ नहीं होते हैं, अतः गृहस्थ श्रावक को भी गुरु के समान आदरणीय स्थान प्राप्त है। आत्मानुशासन में आचार्य गुणभद्र ने इसप्रकार के गृहस्थ वक्ता का स्वरूप इस प्रकार बताया है-

‘‘प्राज्ञः प्राप्तसमस्तशास्त्रहृदयः प्रव्यक्तलोकस्थितिः।

प्र्रास्ताशः प्र्रतिभापरः प्रशमवान् प्र्रागेवेव दृष्टोत्तरः।।

प्रायः प्र्रश्नसहः प्रभुः परमनोहारी परानिन्दया।

ब्रूयाद्धर्मकथा गणी गुणनिधिः प्रस्पष्टमिष्टाक्षरः।।’’

अर्थात् जो बुद्धिममान् हो, जिसने समस्त शास्त्रों का रहस्य प्राप्त किया हो, लोक की मर्यादा जिसके प्रकट हुई हो, आशा नष्ट हो चुकी हो, कांतिमान हो, उपशमी हो, प्रश्न करने से पहले जो उत्तर को समझता हो, प्रश्नों की बहुलता को सहने में सक्षम हो, प्रभु हो, परकी अथवा पर द्वारा अपनी निन्दारहितपने से पर के मन को हरने वाला हो, गुणनिधान हो, स्पष्ट और मिष्ट जिसके वचन हो। विरक्तचित्त श्रावक किसी लोभ-लालच से अन्यथा कथन नहीं करता, वह करूणावान् हो।

मनोविज्ञान के अनुसार करूणाा ऐसा संवेग है, जिसको हृदय में स्थापित कर शिक्षण किया जाये तो शिक्षण-कार्य अत्यन्त प्रभावशाली एवं सफल होगा। भगवान महावीर ने शिक्षण प्रक्रिया के अन्तर्गत ज्ञानदाता (शिक्षक) का स्वरूप, व्यक्तित्व एवं विशेषता का उल्लेख करते हुए कहा है कि शिक्षक धन और यश हेतु अध्यापन नहीं करे। उसके (शिक्षक के) हृदय में तो दया और करूणा की तरंगें उठती रहनी चाहिए। तभी उसका शिक्षण कार्य बहुत प्रभावशाली एवं सुलभ हो सकेगा। विद्यार्थी को भी आत्मकल्याण की रुचि उत्पन्न होगी। ज्ञानी गृहस्थ वक्ता (शिक्षक) का स्वरूप आचार्य समन्तभन्द्र ने ‘रत्नकरण्डश्रावकाचार’ में, पं. टोडरमलजी ने ‘मोक्षमार्गप्रकाशक’ में, आचार्य गुणभद्र ने ‘आत्मानुशासन’ में विस्तारपूर्वक वर्णित किया है।

भगवान महावीर ने शिक्षक को दो श्रेणियों में विभाजित किया है। प्रथम आचार्य और द्वितीय उपाध्याय। उत्तराध्ययनसूत्र में आचार्य के लक्षण निम्न प्रकार बताये हैं- 1. निष्कलंक चरित्र, 2. पंच महाव्रतों का पालन करना, 3. समाज एवं धर्मसम्मत आचरण, 4. जितेन्द्रिय, 5. कषायों का त्याग करना, 6. इच्छा और कामनाओं का त्याग, 7. ब्रह्मचर्य का पालन, 8. मन, वाणी ओर काय का संयम, 9. जीवनचर्या के नियमों का पालन करना, 10. प्रभावशाली व्यक्तित्व, 11. धर्म के दश लक्षणों का पालन, 12. विद्यार्थियों में अपने समान आत्मा होने की अनुभूति।

इसी प्रकार उपाध्याय के लक्षण भी बताये हैं- 1. ज्ञान की विशिष्ट शाखा का पूर्ण ज्ञान, 2. व्यापक दृष्टिकोण, 3. छात्रों के लिए आदर्शों एवं अनुकरणीय एवं उच्चतर आचरण, 4. छात्रों की जिज्ञासा पूर्ति में दक्ष, 5. शिक्षणविधियों मे निष्णात या कुशल, 6. प्रदान किये जाने वाले ज्ञान को छात्र को आत्मसात् कराने की क्षमता, 7. सांसारिक व्यवहार में कुशलता, 8. समाज में सम्मानित व्यक्तित्व, 9. समभाव, 10. कार्य के प्रति सावधानी या अप्रमाद।

भगवान महावीर के शिक्षादर्शन में शिक्षक के विषय में कहा गया है कि उसमें अपार करूणा अपने शिष्यों के प्रति होनी चाहिए। क्योंकि करूणा ही एक ऐसा साधन है जिसके सद्भाव में अन्य गुणों की (यथा- शिक्षणविधि, विषय का पूर्ण ज्ञान, अभिव्यक्ति-क्षमता आदि) अनुपस्थिति होने पर भी स्वयमेव ही शिक्षक की प्रज्ञा उक्त गुणों को उत्पन्न कर देगी। जैसे कोई अध्यापक अपने शिष्य को ज्ञानार्थ किसी विषय का शिक्षण करता है और यदि छात्र को नहीं समझ में आवे तब स्वयमेव छात्र को समझाने के लिए विविध प्रयास करेगा, अटकलें लगायेगा अथवा अन्य कोई युक्ति विचारेगा, तब स्वयमेव उसे सफलता प्राप्त होती ही है। तभी तो कहा है-

‘‘कहें सीख गुरु करूणा धार’’

यद्यपि व्यवहारनय की अपेक्षा पंचपरमेष्ठी हमारे गुरु (शिक्षक) हैं। तथापि निश्चयनय की अपेक्षा अपना आत्मा ही अपना सच्चा गुरु है। जिसप्रकार गीता में कहा गया है- ‘‘आत्मनो हि आत्मनो बन्धुरात्मैव ही आत्मनः शत्रुः’’ उसी प्रकार जैन दर्शन में कहा गया है कि आत्मा ही आत्मा का सच्चा गुरु है। जब धरसेनाचार्य के शिष्य भूतबली और पुष्पदंत तपस्यार्थ प्रस्थान करते हैं तब गुरु धरसेनाचार्य कहते हैं- ‘‘जाओ! तुम्हारा आत्मा ही तुम्हारा गुरु है।’’ यहां समझने की बात है कि एक ओर तो कहा कि गुरु के हृदय में अपार करूणा होनी चाहिए और दूसरी ओर कहा कि गुरु स्वयं का आत्मा ही है। यहां व्यवहारनय एवं निश्चयनय की अपेक्षा से बात की गई है।

भगवान महावीर ने कहा है ज्ञान बाहर से प्रदान नहीं किया जा सकता है अर्थात् वह तो अपने आत्मा में ही निहित है। बस! उसे तो प्रकट करना है। जिसप्रकार माचिस की तीली में अग्नि कहीं बाहर से नहीं लानी है। बस! उसे तो मात्र प्रकट करना है। अग्नि तो उसके अन्दर ही विद्यमान है। उसी प्रकार आत्मा में ज्ञान बाहर से उंडेला नहीं जा सकता तब दूसरी बात यह है कि कोई किसी को समझा भी नहीं सकता, कयोंकि समझ अन्दर से जागती है। यहां लौकिक समझ से तात्पर्य नहीं है। समझ की योग्यता जीव में स्वयमेव उत्पन्न होती है। यदि एक जीव अन्य को समझा सकता तो एक कक्षा में एक शिक्षक एक साथ ही 50 विद्यार्थियों को समझाता है, परन्तु सभी विद्यार्थी अपनी-अपनी समझ के अनुसर न्यूनाधिक ज्ञान का ग्रहण करते हैं।

यहां प्रश्न उत्पन्न होता है कि यदि ऐसा है कि एक जीव अन्य को नही समझा तब क्यों समझाता जाता है। भगवान महावीर के दस भूव पूर्व में सिंह की पर्याय में दो चारण ऋद्धि-धारी मुनिराज संजय और विजय आकाश से भी उतर कर क्यों उस नादान नासमझ हिंसक सिंह को समझाने आये थे? इस प्रश्न का उत्तर इस प्रकार है कि यद्यपि एक जीव अन्य को नहीं समझा सकता तथापि ज्ञानी जीवों को करूणा के वश समझाने का भाव अवश्य उत्पन्न होता है और वे अपनी भूमिकानुसार समझाते भी हैं। जिसप्रकार आदिनाथ तीर्थंकर ने अपने समवशरण में आये हुए अपने पौत्र मारीचि को समझाने का प्रयास कियाा, परन्तु समझ की योग्यता उसकी प्रकट नहीं होने से वह समझ उसके लिए (मारीचि के लिए) भ्रष्टता का कारण बनी और मारीचि उन्मार्ग पर चल पड़ा। यहां मारीचि को अपने गुरु के वचन बहुत कड़वे प्रतीत हुए और इसीलिए उसने स्वच्छन्दता का मार्ग अपना लिया। इसी विषय में समझने की बात है कि गुरु के वचन भले ही कितने भी कड़वे लगे परन्तु वही वचन शिक्षोपरान्त बहुत ही मिष्ट फलों को प्रदान करते हैं। जिस प्रकार आंवला खाते समय कसैला लगता है, परन्तु आंवला खाकर पानी पिया जाये तो वह पानी मीठा लगता है। उसीप्रकार गुरु के वचन कालान्तर में मीठे प्रतीत होते हैं।

गुरु ऊपरी दृष्टि से बहुत कठोर भले ही हो, परन्तु वह नारियल के समान आन्तरिक पक्ष से (हृदय से) बहुत ही कोमल होता है। ‘‘कहें सीख गुरु करूणाधार’’ वाक्य से यह बात अधिक स्पष्ट हो जाती है।

लेखक सोमैया विद्याविहार विश्वविद्यालय, मुम्बई के क. जे. सोमैया जैन अध्ययन केन्द्र के निदेशक हैं.

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