शुक्रवार , सितम्बर 24 2021 | 02:15:17 PM
Breaking News
Home / विविध / संघ शक्ति कलौ युगे

संघ शक्ति कलौ युगे

– डॉ. दिलीप सरदेसाई

 

जब पेड़ से टूटकर सेब को नीचे धरती पर गिरते देखा, तो न्यूटन ने गुरुत्वाकर्षण के सिद्धान्त का प्रतिपादन किया। सेब को गिरते हुए तो सभी ने देखा था किन्तु घटनाओं को देखने पर जो विशिष्ट चेतना सम्पन्न पुरुष उसके कारणों के खोज में लग जाते हैं, उन्हें वैज्ञानिक कहते हैं। इसी प्रकार इतिहास से सीख लेकर देश और समाज की जीवन यात्रा में भविष्य की संभावित चुनौतियों के लिए स्थाई समाधान खोजते हैं, उन्हें युग-दृष्टा कहते हैं। ऐसे ही एक युग-दृष्टा डॉ. केशव बलीराम हेडगेवार द्वारा भविष्य की चुनौतियों के स्थाई समाधान हेतु 1925 में प्रारंभ किये गये विश्व के सबसे बड़े संगठन का नाम है ‘राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ’। इस संगठन की आधारशिला पाँच स्तंभों पर आधारित है।

  1. अधिष्ठान

छत्रपति शिवाजी के गुरु स्वामी रामदास ने मराठी में स्पष्ट शब्दों में कहा है:-

 

सामर्थ्य आहे कळवळीचे, जो जो करील तयाचे।

परन्तु तेथे भगवन्ताचे, अधिष्ठान पाहिजे।।

संगठन कितना भी सामर्थ्यवान हो, किन्तु सफलता के लिए बड़ा अधिष्ठान चाहिए, तभी भगवान का आशीर्वाद प्राप्त होता है। अधिष्ठान का शाब्दिक अर्थ है वैचारिक आधारशिला, किन्तु संगठन के सन्दर्भ में इसका अर्थ उद्देश्य से है। विचारकों का मत है कि संगठन का उद्देश्य न तो बहुत सरल (छोटा) होना चाहिए और न ही असंभव प्रतीत होना चाहिए। उद्देश्य छोटा होगा तो उसे प्राप्त करते ही संगठन निरूउद्देश्य होकर समाप्त हो जाता है और असंभव सा लगने पर कार्यकर्ता हिम्मत हार कर बैठ जाते हैं। इसीलिए संघ ने अपना उद्देश्य रखा ‘व्यक्ति निर्माण के द्वारा राष्ट्र को परम् वैभव तक ले जाना’। परम् वैभव का अर्थ है- समाज को शारीरिक, मानसिक और आर्थिक सभी तरह से सुखी बनाना। यह उद्देश्य किसी व्यक्ति विशेष या स्वार्थ के लिए नहीं है वरन् पूरे राष्ट्र के लिए है, अतः स्वयंसेवक इसे परमेश्वर का कार्य मानते हैं, और इसलिए नित्य प्रार्थना में कहते हैं- ‘‘त्वदीयाय कार्याय बद्धा कटीयम्’’।

 

  1. कार्यपद्धति

 व्यक्ति निर्माण के लिए संघ ने अनोखी कार्य पद्धति का सृजन किया है-दैनिक शाखा। प्रभावी भाषणों से व्यक्ति में देश भक्ति और चरित्र निर्माण का जागरण तात्कालिक रूप से तो किया जा सकता है, किन्तु श्मशान वैराग्य की तरह वह अस्थाई रहता है। इसे स्थाई रखने के लिए नित्यप्रति संस्कारित करना आवश्यक है। व्यक्ति निर्माण का अर्थ मन, बुद्धि और शरीर तीनों को विकसित करके राष्ट्र हित में काम करने के लिए पे्ररित करना। इसीलिए संघ शाखा पर शारीरिक और बौद्धिक दोनों प्रकार के कार्यक्रम विकसित किये गये हैं। केवल कबड्डी और खो-खो खेलते हुए संघ ने अनगिनत कार्यकर्ताओं का निर्माण किया जिन्होंने देश हित में बहुत बड़े काम किये। वैसे तो इन नामों की एक लम्बी सूची है, किन्तु यहाँ दो नामों का उल्लेख ही पर्याप्त है। श्री एकनाथ रानडे, जिन्होंने संघ के निन्दकों की भी मदद लेकर ‘विवेकानन्द स्मारक’ का निर्माण कन्याकुमारी के पास विवेकानन्द शिला पर कराया तथा दूसरा नाम श्री अशोक सिंघल है, जिनके अथक परिश्रम के फलस्वरूप आज ‘राम मन्दिर’ के निर्माण का रास्ता प्रशस्त हुआ है।

ब्रिटिश राज्य की विभीषिका के रूप में दो बुराइयाँ समाज में आई थी-एक अंग्रेजी और अंग्रेजियत तथा दूसरी जातियों में विद्वेश। इसके जन्मदाता थे ‘थॉमस बेविन्गटन मेकाले’। एक महत्वपूर्ण घटना मेकाले के सम्बन्ध में है। मेकाले जब तमिलनाडु में स्थित ऊटी (उटकमंड) अपने बंगले में रहते थे, जिसे आज भी पर्यटकों को दिखाया जाता है, उस समय उनके यहाँ एक लिपिक था जो जाति से कायस्थ था। प्रतिदिन कार्यालय में जब वह आता तो दरवाजे पर बैठे चपरासी के पैर छूकर प्रवेश करता था। इसे देखकर मेकाले  ने उस लिपिक से पूछा कि तुम तो तृतीय श्रेणी के कर्मचारी हो और वो चतुर्थश्रेणी का कर्मचारी है, फिर भी तुम उसके पैर क्यों छूते हो? उस लिपिक ने उत्तर दिया कि मैं तृतीय और चतुर्थ नहीं जानता, वह चपरासी ब्राह्मण है और हमारी मान्यताओं में ब्राह्मण के चरण स्पर्ष किये जाते हैं।

इससे सीख लेकर मेकाले की पहल पर इंग्लिश एजूकेशन एक्ट 1835 का मसौदा तैयार हुआ, जिसके द्वारा ब्रिटिश सरकार ने केवल उन्ही शैक्षणिक संस्थानों को मान्यता देना प्रारंभ किया तथा धन आवंटित किया जो ब्रिटिश सभ्यता को भारतीय संस्कृति से अधिक प्रगतिशील बताते थे और जिनमें माध्यम अंग्रेजी था। इसमें अलिखित आदेश यह भी दिया गया कि केवल ब्राह्मण विद्यार्थियों को ही प्रवेश दिया जाये। इसे उस काल में डाउनवर्ड परकोलेशन पालिसी कहा गया। बाद में जब इसका क्षत्रीय, वैश्य और कायस्थों ने संयुक्त विरोध किया तो उन्हें भी प्रवेश दिया जाने लगा, किन्तु हरिजनों को बाद में भी शिक्षा का अवसर नहीं मिला। इससे वर्ग भेद और जाति द्वेष दोनों पनपते गये। संघ ने दैनिक शाखाओं के माध्यम से इन दोनों अभिषापों को समाप्त करने का प्रयास किया। फलस्वरूप 1942 के संघ शिक्षा वर्ग में जब गांधी जी आए तो सभी जातियों और वर्गों के लोगों को साथ में भोजन करते हुए देखकर वे आश्चर्य चकित हुए।

 3. अनुशासन

प्रत्येक संगठन की सफलता के लिए अनुशासन महत्वपूर्ण मंत्र है। सामन्यतया यह मान्यता है कि बिना डण्डे या दबाव के अनुशासन लाना संभव नहीं है। किन्तु संघ में आत्मानुशासन पर बल दिया गया है। स्वयंसेवक कितना अनुशासित होता है यह देश के लोगों ने अनेक अवसरों पर देखा है। आपातकाल में प्रो0 राजेन्द्र सिंह (रज्जू भैय्या) भूमिगत होने के कारण नाम बदल कर एक माह मेरे घर पर रहे। उस समय मैं अपनी बहन के साथ शिवाजी नगर, कानपुर के एक छोटे मकान में रहता था। उत्तर प्रदेश के प्रांत संघचालक बॅरिस्टर नरेन्द्र जीत सिंह कानपुर जेल में थे, किन्तु अस्वस्थता के कारण उर्सला अस्पताल में भर्ती थे। रज्जूभैय्या जी, जयगोपाल जी और अशोक सिंघल जी तीनों की बॅरिस्टर सहाब से भेंट करने की इच्छा हुई। मैं साथ में था। जब हम अस्पताल पहुँचे तो देखा कि वहाँ पुलिस का पहरा था। तीनों अधिकारियों को बाहर कार में छोड़कर मैंने अन्दर जाकर बॅरिस्टर साहब को बताया कि तीनों अधिकारी भेंट करना चाहते हैं। इस पर बॅरिस्टर साहब ने कहा कि उनसे कहो कि एक-एक करके ही मिलने आयें। संघचालक की आज्ञा थी, इसलिए वैसा ही हुआ। सबसे अन्त में रज्जू भैय्या जी मिलने गये। इसे कहते हैं अनुशासन। कालान्तर में रज्जू भैय्या जी संघ के सर्वोच्च पद पर पहुँचे और चतुर्थ सर-संघचालक बने।

 4.आचरण

संघ की यह मान्यता है कि संगठन के विस्तार और समाज में संघ की प्रतिष्ठा बनाने के लिए वाद-विवाद से नहीं वरन् स्वयंसेवकों को अपने आचरण से संघ के सिद्धांत समझाने चाहिए। आचरण में महत्वपूर्ण तत्व है आत्मीयता। परमपूज्य गुरुजी इसे मराठी में ‘सलगी देणे’ कहते थे, अर्थात प्रेम के साथ व्यवहार करना। एक रोचक घटना 1995 की है। गुजरात में शंकर सिंह वाघेला ने तत्कालीन केशू भाई पटेल की भाजपा सरकार के विरूद्ध विद्रोह कर दिया था। नागपुर में विजया दशमी का उत्सव होना था। स्वयंसेवकों की इच्छा थी कि सर संघचालक जी को पहल करके गुजरात की समस्या का स्थाई समाधान निकालना चाहिए। संघ के इतिहास में पहली बार विजया दशमी उत्सव में कुछ स्वयंसेवक और जनता के कुछ लोग अपनी बात को रखने के लिए तख्ती लेकर आये। अन्य स्वयंसेवकों के कारण कार्यक्रम शांतीपूर्ण सम्पन्न हो गया।

कार्यक्रम के बाद सर संघचालक जी के निर्देश पर कुछ लोगों को चाय पर बुलाया गया। सर-संघचालक रज्जू भैय्या जी ने सभी की बातें शान्तिपूर्वक सुनी और फिर कहा कि ‘भाजपा एक स्वतंत्र राजनीतिक दल है, हम उनके कार्यकलापों में दखल नहीं देते। यदि भाजपा को आवश्यकता होती है तभी वे संघ से परामर्श करते हैं। राजनीति में चरित्रवान और अनुशासित लोग होने चाहिए इसे ध्यान में रखकर ही 1951 में संघ के योगदान से श्यामा प्रसाद मुखर्जी की अध्यक्षता में भारतीय जनसंघ की स्थापना हुई थी जो कालान्तर में भाजपा बनी है। लेकिन यदि इसी तरह भाजपा में अनुशासन तार-तार होता गया तो संघ को नये राजनीतिक दल के लिए सोचना पड़ेगा’। बड़ी कठोर और स्पष्ट राय उन्होंने दी जो राजनीतिक क्षेत्र में काम करने वालों के लिए एक संदेश भी था। व्यवहार के अन्तर्गत दूसरा पक्ष है ‘पहिले करो फिर बोलो’। समर्थ गुरु रामदास ने कहा है- ‘‘हे प्रचीतीचे बोलिले, आधी केले मग सांगितले’’। इसीलिए स्वयंसेवक से कहा गया कि वह पहले करके दिखाये फिर दूसरे से अपेक्षा करें।

 5. समाज हित में निःस्वार्थ कार्य

संघ के स्वयंसेवकों को प्रथम दिन से ज्ञात होता है कि संघ का कार्य निःस्वार्थ रूप से करना है। यहाँ मिलना तो कुछ नहीं है, जेब से जाना अवश्य है। यद्यपि अपनी ऐसी मान्यता है कि निःस्वार्थ सेवा से भी स्वार्थ पूरा होता है – ‘‘आत्मनो मोक्षार्थ, जगत हिताय च’’। इसी बात को समर्थ गुरु रामदास ने कहा है:

                ‘‘जन्मा आलियाचे सार्थक, करावे पुरुषार्थाचे कौतुक।

                जेणे करिता समस्त लोक, मस्तक डोलती।।“

मनुष्य जन्म प्राप्त हुआ है, तो ऐसा कुछ तो करें कि जिससे संसार से जाने के बाद लोगों के मस्तक डोलें।

देश पर जब-जब संकट की घड़ी आई तो स्वयंसेवकों ने स्वयम् आगे आकर पूरे सामथ्र्य के साथ देश की जनता की सेवा की। 1947 में देश के विभाजन के बाद पश्चिमी और पूर्वी पाकिस्तान से लाखों की संख्या में हिन्दू शरणार्थी भारत में आये थे। लगभग 3000 राहत शिविर लगाकर इन शरणार्थियों की मदद संघ के स्वयंसेवकों ने की थी। उसी समय कश्मीर पर पाकिस्तान द्वारा आक्रमण किया गया था तब सैनिकों के साथ स्वयंसेवक भी लड़ते हुए शहीद हुए थे। कश्मीर राज्य का भारत में विलय कराने के लिए तत्कालीन उप-प्रधानमंत्री सरदार पटेल के कहने पर परमपूज्य गुरुजी और बॅरिस्टर नरेन्द्र जीत सिंह ही कश्मीर के राजा हरी सिंह के पास गये थे, जिसके बाद में हरी सिंह ने अपना विलय की स्वीकृति का पत्र भारत सरकार को भेजा था।

1962 के चीन के युद्ध के समय संघ ने जिस तत्पर्तता से सीमा पर लड़ रहे सैनिकों को मदद की थी तथा शहीदों के परिवार की यथायोग्य चिन्ता की थी, उससे प्रभावित होकर, नेहरू जी ने 1963 के गणतंत्र दिवस की परेड में संघ के स्वयंसेवकों को यह कहकर आमंत्रित किया था कि ‘देश की जनता देखे कि केवल दण्ड सिखाकर कैसे सीमा पर सेवा करने वाले बहादुर बनाये जा सकते हैं’। 1965 में पाकिस्तान युद्ध के समय दिल्ली की यातायात व्यवस्था के संचालन के लिए तत्कालीन प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री जी ने संघ से ही मदद की अपेक्षा की थी।

1971 में तो संघ के साथ ही जनसंघ ने भी सारे मतभेदों को भुलाकर इन्दिरा गांधी के स्वर में स्वर मिलाया था। यहाँ तक कि अटल जी ने लोकसभा के अपने भाषण में इन्दिरा जी को दुर्गा की प्रतिमूर्ति कहा था। ऐसे अनगिनत उदाहरण हैं जब संघ ने देशहित में काम किये। 1954 में दादरा और 1961 में गोवा को पुर्तगाली शासन से मुक्त कराने में संघ की अभूतपूर्व भूमिका थी। एक प्रधानमंत्री की कुर्सी संकट में पड़ने के कारण 25 जून 1975 को आपातकाल लगाया गया, जो बीस महीने की कालरात्रि में परिवर्तित किया गया। विरोधी दलों के तथा संघ के अनेक महत्वपूर्ण कार्यकर्ताओं को बिना किसी अपराध के जेल में बन्द कर दिया गया। उस समय संघ के भूमिगत कार्यकर्ताओं के अथक परिश्रम से ही विभिन्न दलों के मतभेदों को समाप्त करके ‘जनता पार्टी’ की स्थापना की गई, जिसने बाद में इन्दिरा जी को अपदस्थ किया।

24 मार्च 2020 को जब प्रधानमंत्री मोदी द्वारा एकाएक लाॅकडाउन लगाने की घोषणा की गई तो पूरे देश ने उसका सम्मान किया। किन्तु जब लाॅकडाउन की अवधि बढ़ती गई तो हजारों की संख्या में प्रवासी मजदूर सड़कों से बिना वाहनों के पैदल ही घर की ओर निकल पड़े। प्रतिदिन कमाने-खाने वाले मजदूरों के लिए जीवन यापन कठिन हो गया था। देश में इन निर्धन और असहाय लोगों की चिन्ता करने का समय आ गया। प्रश्न उठा कि:

                परमेश्वर का जिसे प्राप्त हैं, चिर विजयी वरदान।

                संघ अतिरिक्त कौन स्वीकारे, समय का आह्वान।।’’

इसलिए सभी की निगाहें फिर से संघ की ओर लग गई। संघ के स्वयंसेवक बिना किसी केन्द्रीय निर्देश के अपनी ओर से सेवा कार्यों में जुट गये। प्राप्त जानकारी के आधार पर देश में पच्चासी हजार स्थानों पर चार लाख अस्सी हजार स्वयंसेवकों ने लाखों निर्धन परिवारों की मदद की। संघ के मार्गदर्शन में चल रहे अनेक अनुषांगिक संगठनों के कार्यकर्ताओं को भी जोड़ लिया जाए तो यह संख्या बहुगुणित हो जायेगी। इस कोविड-19 की महामारी से विश्व के कई विकसित देशों में बहुत अधिक नुकसान हुआ है, किन्तु कहीं भी किसी देश में किसी अन्य संगठन ने इस परिमाण का सेवा कार्य किया हो, ऐसा एक भी उदाहरण नही है।

बहुत पूर्व परमपूज्य गुरुजी से एक पत्रकार ने पूछा था कि संघ की शक्ति कितनी है? गुरुजी ने कहा कि यह बताना तो संभव नहीं है। इस पर पत्रकार ने उनसे कहा कि किसी भी संगठन में जितनी कुल सदस्य संख्या होती है उससे उस संगठन की शक्ति तय हो जाती है। गुरुजी ने कहा ऐसा नहीं है। संगठन की शक्ति चार कारकों से तय होनी चाहिए। पहला ‘सिद्धान्त’ क्योंकि सिद्धांत की भी अपनी शक्ति होती है। दूसरा ‘संख्याबल’। तीसरा ‘संगठन की शक्ति’-जब सम्पूर्ण संख्याबल एक ही दिशा में काम करता है तो संगठन की शक्ति अलग दिखती है।

                अल्पानामपि वस्तुनां संहति कार्यसाधिका।

                तृणैर्गुणत्वमापन्ने, र्बध्यन्ते मत्तदन्तिनः।।

छोटी वस्तुओं का समूह भी कार्यसाधक होता है, जैसे घास से बटी हुई रस्सी से मतवाले हाथी भी बंध जाते हैं। चैथा और महत्वपूर्ण कारक है ‘संगठन की समाज में स्वीकार्यता’। इन चारों कारकों के आधार पर मूल्यांकन करें तो राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ आज विश्व का सबसे बड़ा प्रभावशाली संगठन है। अपने यहाँ ऋग्वेद में कहा है:-

                त्रेतायां मंत्र-शक्तिश्च, ज्ञानशक्तिः कृते युगे।

                द्वापरे युद्ध-शक्तिश्च, संघ शक्ति कलौ युगे।।

सत्ययुग में ज्ञान शक्ति, त्रेता में मंत्र शक्ति तथा द्वापर में युद्ध शक्ति का महत्व था किन्तु कलियुग में संगठन की शक्ति का ही महत्व रहेगा।

 

लेखक राष्ट्रीय शैक्षिक महासंघ के उ.प्र. संयोजक हैं.

नोट : लेख में लेखक द्वारा व्यक्त विचारों से मातृभूमि समाचार का सहमत होना आवश्यक नहीं है।

मित्रों,
मातृभूमि समाचार का उद्देश्य मीडिया जगत का ऐसा उपकरण बनाना है, जिसके माध्यम से हम व्यवसायिक मीडिया जगत और पत्रकारिता के सिद्धांतों में समन्वय स्थापित कर सकें। इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए हमें आपका सहयोग चाहिए है। कृपया इस हेतु हमें दान देकर सहयोग प्रदान करने की कृपा करें। हमें दान करने के लिए निम्न लिंक पर क्लिक करें -- Click Here


* 1 माह के लिए Rs 1000.00 / 1 वर्ष के लिए Rs 10,000.00

Contact us

Check Also

Submit Form to get Plasma

लोड हो रहा है…

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *