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मुकद्दर और मशीनों से लड़ता मज़दूर बेचारा !

– डॉ०  घनश्याम बादल

होने को को तो हर आदमी पेट का मज़दूर है । पर,  कुछ ऐसे भी मजबूर लोग  हैं जो दूसरों के लिए काम करके किसी तरह अपने बच्चों का और अपना  पेट पालने को विवश  हैं । न उनके पास पर्याप्त मात्रा में पूंजी है न , खेती करने लायक ज़मीनें , न  रोजगार है न दुकानें , न उद्योग और न ही एक नियमित नौकरी  ,ऐसे ही लोगों को सर्वहारा, भूमिहार श्रमिक या  मज़दूर कहा जाता है   । अब उनकी हालत कैसी है  इसी पर  चिंतन मनन करने  का दिन है मजदूर दिवस  । एक नज़र इनके रहन सहन पर डालें तो रुह कांप उठती है । करीब ८० प्रतिशत‌ मजदूर तबके के पास अपने मकान नहीं हैं , वे झुग्गी झोपड़ियों में, नालों के किनारे, गंदी बस्तियों में या फूंस के घरों में रहने को विवश हैं । उनके मकान भी प्रशासन अवैध कहकर अक्सर तोडता, उजाड़ता रहता है , कॉलोनाइजर्स की निगाहों उनके आवासों पर गड़ी रहना बहुत आम बात है । पोषक खाना भी इन्हें मयस्सर नहीं होता है । अत: बीमारी और मजदूर का चोली-दामन का साथ रहता है ।

आज भी आजीविका के रूप में मुख्यतः खेती , उद्यम , नौकरी या स्वरोजगार ही मुख्य हैं । पर , इन सब के लिए कहीं पूंजी चाहिए तो कहीं ज़मीन या कुशलता यानि किसी धंधें में ट्रेंड होना । लेकिन  एक बड़ा वर्ग आज भी ऐसा है जिसके पास इनमें से एक भी चीज  नहीं है तब उनके पास दूसरे के अधीन रहकर काम करने के अलावा कोई चारा नहीं बचता है और वें किसी बड़े किसान या साहूकार के यहां खेतीहर मज़दूर ,किसी ठेकेदार के पास श्रमिक के रूप में या किसी उद्यमी के कारखाने अथवा फैक्ट्री में दिहाड़ी पर काम करते हैं , वें अकुशल या अर्द्धकुशल कामगार होते हैं उनके पास तकनीकी ज्ञान अथवा मशीनों पर काम करने का अनुभव व दक्षता कम ही होती है पूरे साल में इन्हे भारत में करीब 100 दिन ही रोजगार उपलब्घ हो पाता है और परिवार को चलाने के लिए उन्हे अपने घर की औरतों व बच्चों तक को काम पर लगाना पड़ता है , इसी सर्वहारा वर्ग की हालत और हालात पर मंथन करने के उद्देश्य से मई दिवस का प्रवाधान संयुक्त राष्ट्रसंघ तथा दुनिया भर के देशों ने एक मई का दिन चुना है ।

एक समय था जब शीतयुद्ध से त्रस्त विश्व पूंजीवाद और समाजवादी खेमों बंटा था अमेरिका व ब्रिटेन के नेतृत्व में एक खेमा औद्योगिकरण व औद्योगिक क्रांति के विचार के साथ आगे बढ़ रहा था जिसकी सोच थी मशीनों की मदद से किसी भी उत्पाद की कीमत कम से कम कर उसे आम आदमी के पहुंच में लाना व अधिक से अधिक उत्पादन करना तो वहीं दूसरा खेमा तत्कालीन संयुक्त सोवियत संघ की अगुआई में उस प्रक्रिया के पीछे उद्योगपतियों द्वारा श्रमिकों का शोषण देख रहा था और वह मज़दूर की खस्ता हालत के लिए इन्हे ही जिम्मेदार मानकर सारे उद्योगों का सरकारीकरण कर रहा था जिससे कि मज़दूर का शोषण रुक सके और माक्र्स व लेनिन के नेतृत्व में एक समतामूलक समाज के निर्माण का सपना लेकर वह समाजवादी व्यवस्था को दुनिया भर में फैलाना चाहता था रूस के बाद चीन इस आंदोलन का सबसे बड़ा हिमायती था और कमोबेष भारत पर भी आज़ादी के तुरंत बाद इसी विचारधारा का प्रभाव पूंजीवाद के मुकाबले अधिक था इसी वजह से वह रूस के नज़दीक जा रहा था । अपनी अपनी विचाराधारा का वर्चस्व बनाने के लिए दोनों खेमे बेहद व्यग्र व उग्र थे । दो – दो विश्वयुद्धों को भी इसी वर्चस्व के संघर्ष के आलोक में देखा जा सकता है ।

खैर समय के साथ पूंजीवाद बना , बचा रहा और रूस के नेतृत्व वाला सोवियत संघ बुरी तरह बिखर गया । इसे एक तरह से समाजवाद का पतन माना गया हालांकि चीन आज भी थोड़े बहुत बदलावों के साथ अपने रास्ते पर चल रहा है । यह संघर्ष  आदमी पर मषीन की जीत का प्रतीक बनकर उभरा और यह उभार अभी भी जारी है । इसी उभार की सबसे बड़ी मार उस तबके पर पड़ी जिसे यह दुनिया मज़दूर कहती है ।  उद्यमी अपनी पूंजी व प्रबंधन के बल पर टिके हैं , बड़े किसानों को उनकी ज़मीनों का सहारा है कारपोरेट सैक्टर तकनीकी के बलबूते हावी है पर अकुशल मज़दूर मारा गया है । आज के भौतिकतावादी युग में उपयोगितावाद सबसे ज्यादा हावी है और मज़दूर के सामने रोजी – रोटी का संकट मंुह बाए खड़ा है जिस काम को अभी पिछले दषक तक दस बीस या सौ मज़दूर मिलकर करते थे उसे आज एक जे सी बी जैसी मषीन घंटों में कर डालती है , जिस खेत की फसल काटने या उसे जोतने के लिए कई सारे मज़दूरों की ज़रुरत होती थी उसे आज एक हारवेस्टर या ट्रैक्टर बड़ी आसानी से कम कीमत पर व कम समय में कर देता है ऐसे में कोई मज़दूर का मुंह क्यों जोहेगा ?

आज तकनीकी क्रांति का युग है और इसने मानवता को बहुत कुछ दिया है पर जो इसने छीना है वह है किसी के मुंह का निवाला , किसी के परिवार का रोजगार , किसी के बच्चों की षिक्षा का हक और इसके जिससे यह सब छिना है वह और कोई नहीं मज़दूर तबका है आज उसके और रोटी के बीच मशीन अड़कर खड़ी हो गई है और जो तकनीकी रूप से समृद्ध नही हो पाया है वह भुखमरी के कगार पर खड़ा है , आत्महत्या कर रहा है या उग्र होकर उस रास्ते पर चल निकला है  जो  मानव सभ्यता को विनाश की तरफ ले जाता है । इस मई दिवस पर इस पर गहन चिंतन व मनन की ज़रुरत है । अगर भारत के संदर्भ में देखें तो यहां मज़दूर हमेशा से ही शोषण व दमन का शिकार रहा है कभी उसे साहूकार लूटते थे तो कभी वह कारपोरेट के शोषण का शिकार होता है । मज़दूरी के नाम उसे सदा ही ठगा जाता है उसकी मज़बूरी व अशिक्षा भरपूर फायदा उठाया जाता है । उसके साथ ही उसके बच्चे व परिवार की महिलाएं भी इस दमन चक्र में पिसते हैं उनका बचपन खुशियों भरा नहीं जिम्मेदारियों से लदा होता है तों जवानी कर्जे के जाल को काटने में गुजरती है और बुढ़ा़पा बिमारी के नीचे घिसट- घिसट कर बीतता है ।

उसकी वार्षिक आय का ग्राफ बेहद ऊपर नीचे होता हुआ गरीबी की रेखा के नीचे ही रहता है । मज़दूर पर लगता है किसी भी दल की सरकार असर नहीं करती चाहे व प्रधानमंत्री रोजगार योजना हो या कम से कम 200 दिन रोजगार का लक्ष्य हो या फिर उसे न्यूनतम मज़दूरी दिलवाने की बात हो सब कागज पर ही रह जाती हैं और देश में आश्चर्यजनक रूप  से औद्योगिक क्रांति के बाद भी सबसे ज्यादा संख्या मज़दूर की ही बढ़ी है । उसके पास न घर है न दर , न नियमित आय के साधन हैं न प्रशिक्षण के उपयुक्त व कारगर संस्थान , वह महंगी होती षिक्षा का बोझ ढोने के काबिल नहीं हो पा रहा है तो उसकी अगली पीढ़ी का भविष्य भी ख़तरे से बाहर नहीं है । प्रगति के सुहाने गीत बहुत अच्छे हैं , विकास की उच्च दर बढ़िया है पर यें सब किस काम के अगर देश का बहुसंख्यक मज़दूर रोटी व रोजगार के लिए मोहताज रहे । इन मुद्दों पर केवल चिंतन ही काफी नहीं है अपितु मज़दूर की दशा सुधारने को कारगर उपाय उठाने भी ज़रुरी हैं क्योंकि अकुशलता के बावजूद उसे भी सम्मान व चैन से जीने का पूरा हक है । देखें कब तक व कैसे तथा किसके द्वारा मज़दूर को उसका वांछित सम्मान व हक मिलता है और मिलता भी या नहीं यह देखने वाली बात है ।

लेखक वरिष्ठ साहित्यकार हैं.

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