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स्वतंत्रता आंदोलन में राहुल गांधी के परिवार से कौन हुआ था शहीद

– सारांश कनौजिया

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कुछ समय पूर्व जलियांवाला बाग के नवीनीकरण का लोकार्पण किया। इस कार्यक्रम में पंजाब के मुख्यमंत्री और वरिष्ठ कांग्रेस नेता कैप्टन अमरिंद सिंह ने भी भाग लिया। आॅनलाइन आयोजित इस कार्यक्रम में ही कैप्टन ने नवीनीकरण के लिये प्रधानमंत्री का धन्यवाद दिया था और बाद में भी उनके द्वारा इसे अच्छा कार्य बताया गया। इसके बाद भी कांग्रेस के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष राहुल गांधी को यह कार्य शहीदों का अपमान लगता है। उन्होंने अपने एक बयान में कहा कि मैं एक शहीद का बेटा हूं और शहीदों का अपमान किसी भी कीमत पर बर्दाश्त नहीं करुंगा। जलियावालां बाग भारत के स्वतंत्रता संग्राम से जुड़ा हुआ है, ऐसे में राहुल गांधी को यह बताना चाहिए था कि देश की आजादी में उनके परिवार से कौन शहीद हुआ, जो वो स्वतंत्रता के लिये बलिदान होने का महत्व और लोगों से अच्छी प्रकार से जानते हैं।

नेहरु-गांधी परिवार से सबसे पहले मोती लाल नेहरु कांग्रेस की राजनीति में सक्रिय हुये। उनकी मृत्यु 6 फरवरी 1931 को हुई। उनको न ही अंग्रेजों ने फांसी दी थी और न वो अंग्रेजों की गोली या लाठी का शिकार हुये थे। गांधीजी, इंदिरा गांधी और राजीव गांधी तीनों की हत्या हुई थी, लेकिन ये घटनाएं स्वतंत्रा मिलने के बाद की हैं। वास्तविकता यह है कि गुलामी के समय मोतीलाल नहेरु, जवाहरलाल नेहरु या इंदिरा गांधी किसी को भी अंग्रेजों ने एक लाठी तक नहीं मारी, बलिदान होना तो बहुत दूर की बात है। इसलिये स्वतंत्रता के आंदोलन में जो लोग बलिदान हुये, राहुल गांधी द्वारा उनसे अपने परिवार की तुलना करना इन बलिदानियों का अपमान है।

अभी बात जलियांवाला बाग की है, तो वापस उसी विषय पर आते हैं। जलियावालां बाग में जिन स्वतंत्रता सेनानियों ने अपना बलिदान दिया, उनके लिये कांग्रेस ने क्या किया? इस पर एक नजर डालते हैं। अंग्रेज ब्रिगेडियर जनरल रेजीनाल्ड डायर ने 1919 में अकारण जलियावालां बाग में गोलियां चलवा दीं। जहां एक ओर कांग्रेस ने इस घटना की निंदा कर अपना कर्तव्य पूर्ण मान लिया, वहीं दूसरी ओर पूरे देश और विदेशों में रह रहे भारत माता के भक्तों में इसको लेकर बहुत नाराजगी थी। पहले ब्रिगेडियर जनरल रेजीनाल्ड डायर ने अंग्रेज अधिकारियों को बताया था कि उस पर हमला हुआ था, जिसके जवाब में उसने गोली चलायी, लेकिन बाद में हंटर कमीशन के सामने उसने स्वीकार किया कि वह पहले ही तय करके आया था कि सबकी हत्या करनी है।

अंग्रेजों के आंकड़े के अनुसार जलियावालां बाग में 379 लोगों के बलिदान हुये थे। उस समय एक अंग्रेज की हत्या करने पर क्रांतिकारियों को फांसी पर लटका दिया जाता था, लेकिन रेजिनाल्ड डायर को क्या सजा मिली, यह बड़ा प्रश्न है क्योंकि वह स्वयं सभी आरोप स्वीकार कर चुका था। पहले हाउस ऑफ़ लार्ड ने रेजीनाल्ड डायर जिसका कद घटाकर कर्नल कर दिया गया था, उसके कार्यों की प्रशंसा करते हुये उसे प्रशस्ति पत्र दिया। बाद में विवाद बढ़ा, तो उसे पद्मुक्त कर दिया गया। रेजिनाल्ड डायर की 1927 में स्वभाविक मौत इंग्लैंड में हुई। इस घटना एक अन्य आरोपी अंग्रेज अधिकारी तत्कालीन गर्वनर जनरल माइकल ओ ड्वायर को क्रांतिकारी उधम सिंह ने 1940 में मौत के घाट उतारा था।

जालियांवाला बाग में जो लोग जमा हुये थे, उनमें से कई गांधीजी के द्वारा चलाये जा रहे रोलेट एक्ट के विरोध में आंदोलन की योजना बनाने के लिये एकत्रित हुये थे। ऐसे में गांधीजी और राहुल गांधी के पूर्वज मोतीलाल नेहरु को जलियांवाला बांग के नरसंहार का खुलकर विरोध करना चाहिए था। गांधीजी सहित पूरी कांग्रेस को दोषी अंग्रेजों को फांसी की सजा दिलाने के लिये आंदोलन करना चाहिए था। इससे अन्य अंग्रेजों को भी सबक मिलता, किंतु ऐसा कुछ नहीं हुआ। रवींद्र नाथ टैगोर के नरसंहार के विरोध में अंग्रेजों द्वारा उनको दी गयी नाइटहुड की पदवी वापस करने और जांच के लिये मदनमोहन मालवीय के नेतृत्व में एक समिति के गठन का उल्लेख मिलता है। लेकिन इसके बाद भी दोषियों को सजा नहीं मिली।

इस नरसंहार से क्रांतिकारियों को बहुत बड़ा धक्का लगा था। वो इसे सहन नहीं कर सके। भगत सिंह, जो उस समय मात्र 12 वर्ष के थे, वो सूचना मिलते ही इतने विचलित हो गये कि छोटी सी आयु में मीलों की पैदल यात्रा कर जलियांवाला बाग पहुंचे। उनके क्रांतिकारी बनने में जलियावालां बाग नरसंहार के दोषियों को सजा दिलाने के लिये कांग्रेस के द्वारा कोई प्रयास न किये जाने का बहुत बड़ा योगदान है। अन्यथा असहयोग आंदोलन को वापस लेने तक भगत सिंह, गांधीजी के ही प्रशंसक थे। भगत सिंह को जब फांसी दी जा रही थी, तब गांधजी से कुछ लोगों ने इस फांसी को निरस्त करवाने के लिये दबाव बनाने का आग्रह किया था। इसके पीछे तर्क भगत सिंह की कम आयु का दिया गया था। किंतु गांधी जी का मानना था कि इससे अंग्रेजों के विरुद्ध हिंसा को बढ़ावा मिल सकता है, जो उन्हें किसी भी कीमत पर स्वीकार नहीं था। इसलिये उन्होंने ऐसा करने से इनकार कर दिया।

एक अन्य क्रांतिकारी उधम सिंह भी तभी से बदला लेने का अवसर तलाश रहे थे। 1940 में जब उन्होंने माइकल ओ ड्वायर को गोली मारी, तो अंग्रेजों से भी अधिक दुख गांधजी और पं. जवाहरलाल नेहरु को हुआ। दोनों ने इस बदले की कड़े शब्दों में निंदा की। कहने का तात्पर्य यह है कि जिनके पूर्वजों ने जलियांवाला बाग नरसंहार के दोषियों को कभी सजा दिलाने का प्रयास नहीं किया। इसके विपरीत उधम सिंह जैसे क्रांतिकारियों की निंदा करते रहे, उनके वंशज राहुल गांधी बलिदान की बात कर रहे हैं। यह कितना सही है, इस पर गंभीरता से विचार करने की आवश्यकता है।

लेखक मातृभूमि समाचार के संपादक हैं।

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