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पाकिस्तान के लिए बड़ा नुकसान है भारत विरोधी गिलानी का इस दुनिया से जाना

– सारांश कनौजिया

अलगाववादी नेता सैयद अली शाह गिलानी की मृत्यु हो गयी। अधिक आयु और बीमार रहने के कारण उनका निधन हुआ। गिलानी का जन्म जम्मू-कश्मीर के बारामूला जिले में हुआ। वो सोपोर के विधानसभा क्षेत्र से तीन बार विधायक रहे। गिलानी का जन्म से पाकिस्तान का कोई संबंध नहीं था। फिर भी पूरा पाकिस्तान उनकी मौत से दुःखी है। पाकिस्तानी प्रधानमंत्री इमरान खान ने अपना राष्ट्रीय ध्वज आधा झुकाने का आदेश सुना दिया। सामान्यतः किसी देश में जब किसी राष्ट्रीय स्तर के व्यक्ति का निधन होता है, तो उनके सम्मान में ऐसा किया जाता है। हाल ही में अमेरिका ने काबुल में अपने सैनिकों की शहादत में अपना झंडा झुकाया था क्योंकि ये सैनिक अमेरिका के लिये बलिदान हुये। इसका सीधा अर्थ यह है कि पाकिस्तान गिलानी की मौत को अपनी बहुत बड़ी राष्ट्रीय क्षति मानता है। ऐसा क्यों? तो ध्यान में आता है कि गिलानी खाते भारत का थे, लेकिन नौकरी पाकिस्तान की करते थे।

गिलानी के रिश्तेदार पाकिस्तान के साथ ही सऊदी अरब व लंदन आदि देशों में भी हैं। कहने का मतलब यह है कि उन्होंने अपने परिवार को अच्छी शिक्षा दी और अच्छा वातावरण भी देने का प्रयास किया। कोई एयरलाइंस में पायलट है, कोई पत्रकार, तो कोई डाॅक्टर। लेकिन वो जम्मू-कश्मीर वालों को हमेशा भारत के विरोध में भड़काते रहे, उन्हें आतंकवाद के लिये उकसाते रहे। बात-बात पर पाकिस्तान का समर्थन करना, भारत के खिलाफ माहौल तैयार करना उनके लिये आम बात थी। ऐसा नहीं है कि उन्हें पाकिस्तान बहुत पसंद था। इसका एक उदाहरण तब मिला, जब उन्होंने अपने बेटे नईम और उनकी पत्नी को पाकिस्तान से वापस बुला लिया। दोनों पेशे से डाॅक्टर हैं और 2010 तक पाकिस्तान के रावलपिंडी में अपनी प्रैक्टिस कर रहे थे।

परिवार में सभी लोगों को अच्छी पढ़ाई दी, उन्हें अच्छी नौकरी के लिये प्रेरित किया, लेकिन जम्मू-कश्मीर के लोगों को अलगाववाद की ओर ढकेलते रहे। इसका परिणाम यह हुआ कि 1950 से जम्मू-कश्मीर की राजनीति में सक्रिय गिलानी को कई बार उनकी करतूतों के कारण जेल में डाला गया। हालांकि हर बार तुष्टीकरण के नाम पर इसका विरोध होता रहा और उन्हें आजाद कर दिया जता। वो स्वयं तीन बार विधायक रहे, लेकिन उनके नापाक एजेंडे के कारण कई बार उन्हें चुनाव पूर्व गिरफ्तार करना पड़ता था। वो कितना जहरीला बोलते थे, इस बात का अंजादा इसी बात से लगाया जा सकता है कि पाकिस्तान का समर्थन करने वाले जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने जम्मू-कश्मीर में आतंकवाद और हत्याओं के लिये गिलानी को जिम्मेदार माना था, तो वहीं पूर्व मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती ने उनके निधन पर शोक व्यक्त करने के साथ ही यह भी बता दिया कि वो गिलानी के विचारों से सहमत नहीं हैं।

इससे यह स्पष्ट हो जाता है कि जैसे-जैसे गिलानी का वास्तविक एजेंडा सामने आता रहा, लोग उनसे दूर जाते रहे। अंत में कुछ अलगाववादियों को छोड़कर कोई भी उनके साथ नहीं था। जिस व्यक्ति को भारत में भी समर्थन नहीं मिलता, पाकिस्तान उसे अपना राष्ट्रीय महापुरुष मानकर सम्मान दे रहा है। इसके पीछे सिर्फ एक ही कारण है गिलानी की घटती लोकप्रियता के बाद भी पाकिस्तान को उम्मीद थी कि वो अपना कोई ऐसा उत्तराधिकारी दे कर जायेंगे, जो भारत की जमीन से उनके लिये काम कर सके और भारत को अस्थिर करने का नाकाम सपना देखे।

लेखक मातृभूमि समाचार के संपादक हैं।

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