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चिंतनीय है प्रेस की स्वतंत्रता का मुद्दा

– डॉ घनश्याम बादल

सर वॉल्टेयर ने कभी कहा था कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता आपका अधिकार है एवं मैं हर हाल में आपके इस अधिकार की रक्षा करूंगा उनका यह वक्तव्य अलग-अलग भाषाओं में अनूदित होकर थोड़े बहुत फेरबदल के साथ  दुनिया भर के समाचार पत्रों के मुख पृष्ठ पर छपता रहा है । बहुत अच्छा लगता है सुनकर कि दुनिया भर की सरकारें प्रेस की आजादी की हिमायती हैं एवं उसकी कद्र करती हैं लेकिन जब यथार्थ के धरातल पर उतरते हैं तो वास्तविकता कुछ और ही नजर आती है ।

दरअसल होता यह है कि जब तक प्रेस सरकारों के मनमाफिक चलता है, उनकी रीतियों,नीतियों का गुणगान करता है सरकारों के दोषों, खामियों एवं कमियों को उजागर नहीं करता है जब तक सरकार के खिलाफ जमकर नहीं लिखता है  तब तक ही सरकारों को प्रेस की स्वतंत्रता अच्छी लगती है । इसके अतिरिक्त एक और मुद्दे पर भी प्रेस सरकार का दुलारा बन जाता है वह है जब वह विपक्ष के आंदोलनों की या तो कवरेज नहीं करता या फिर उसके दुष्परिणामों से बार-बार जनता को आगाह करते हुए उसमें प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से भाग न लेने के लिए एक लोकमत का निर्माण तैयार करता रहता है । लेकिन जब वही प्रेस सत्ताधारी दलों या सरकारों की जनविरोधी नीतियों, देश में फैली अव्यवस्था , लगातार उग्र होते आंदोलनों व उनके पीछे के न्यायोचित कारणों को उजागर करने पर उतर आता है तब वही प्रेस सरकार को दुश्मन दिखने लगता है और उस पर कमोबेश विश्व के हर भाग में कहीं खुल्लम खुल्ला तो कहीं प्रच्छन्न ढंग से बंदिशें लगा दी जाती हैं।

सरकारों की इन्हीं नीतियों, नीतियों एवं लगातार प्रेस के दमन, प्रेस कर्मियों के शोषण ,उन पर होने वाले अत्याचारों  गिरफ्तारियों व  दमन के खिलाफ एक सोच उभर कर और पूरे विश्व में 3 मई को विश्व प्रेस स्वतंत्रता दिवस का आयोजन किया जाता है । विश्व स्तर पर प्रेस की आजादी को सम्मान देने के लिए संयुक्त राष्ट्रसंघ की महासभा द्वारा 3 मई को विश्व प्रेस स्वतंत्रता दिवस घोषित किया गया, जिसे विश्व प्रेस दिवस के रूप में भी जाना जाता है। कोलम्बिया के पत्रकार गुइलेर्मो काना इसाज़ा के सम्मान में पुरस्कार की घोषणा की जाती है, जो दिसंबर 1986 में बोगोटा में अपने समाचार पत्र के कार्यस्थल के प्रवेश के लिए मारे गए थे । इस वर्ष  प्रेस फ्रीडम डे की थीम ‘जर्नलिज्म विद आउट बॉर्डर ‘ है।

भारत में अक्सर प्रेस की स्वतंत्रता को लेकर चर्चा होती रहती है।  प्रेस की स्वतंत्रता पर बातचीत होना लाजिमी भी है। आज अखबारों के साथ-साथ डिजिटल या आभासी अथवा ई प्रेस दुनिया में खबरें पहुंचाने का सबसे बेहतरीन माध्यम है। भारत में प्रेस की स्वतंत्रता भारतीय संविधान के अनुच्छेद-19 में भारतीयों को दिए गए अभिव्यक्ति की आजादी के मूल अधिकार से सुनिश्चित होती है। खेद का विषय है कि भारत पत्रकारिता के लिहाज से दुनिया के सुरक्षित देशों में शुमार नहीं है। अंतरराष्ट्रीय पत्रकारिता के गैर लाभकारी संगठन  ,’रिपोर्टर्स विदाउट बॉर्डर्स’ की ओर से जारी विश्व प्रेस फ्रीडम इंडेक्स 2021 में भारत की रैंकिंग पिछले वर्ष की तरह 142 ही है। 180 देशों में सबसे ऊपर नॉर्वे के बाद फिनलैंड और डेनमार्क हैं। जबकि सबसे नीचे इरिट्रिया है और चीन 177वें, तुर्कमेनिस्तान 178वें, उत्तरी कोरिया 179 स्थान पर हैं। दक्षिण एशियाई देशों में पड़ोसी नेपाल 106वें, श्रीलंका 127वें, म्यांमार (तख्तापलट से पहले) 140वें, पाकिस्तान 145वें और बांग्लादेश 152वें स्थान पर हैं।

इस रिपोर्ट के अनुसार, पत्रकारिता के लिहाज से भारत विश्व के सबसे अधिक खतरनाक देशों में है, जहां पत्रकारों को अपना काम सुविधाजनक तरीके से करने में काफी परेशानियों का सामना करना पड़ता है।  रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत, ब्राजील, मैक्सिको और रूस के साथ ‘खराब’ श्रेणी में है। 2004 में यूपीए सरकार ने सत्ता संभाली तो भारत की रैंकिंग 120 थी, जो 2005 में 106 तक आ गई। वहीं, 2014 में यूपीए की सत्ता जाने तक रैंकिंग गिरकर 140 तक पहुंच गई थी। हालांकि, यूपीए शासनकाल के दौरान 2006 व 2009 में 105 तक भी आ गई थी।इस कारण आने लगी गिरावट: यूपीए शासनकाल के अंतिम दौर में वर्ष 2013 और 2014 में भारत की रैंकिंग 140 तक गिर गई। आरएसएफ के अनुसार इसमें सबसे बड़ा हाथ कश्मीर और छत्तीसगढ़ में पत्रकारों के साथ हिंसा का रहा।

यह रिपोर्ट कहती है कि  देश में कवरेज के दौरान पत्रकारों को पुलिस हिंसा, राजनीतिक कार्यकर्ताओं और अपराधियों की गैंग के हमलों का सामना करना पड़ता  रिपोर्ट में यह भी कहा है कि सरकार ने देश के मीडिया पर पकड़ को और मजबूत किया है। रिपोर्ट के अनुसार भारत में हिंदुत्व का समर्थन करने वालों के खिलाफ लिखने वाले पत्रकारों को निशाना बनाया जा रहा है। विशेष रूप से महिलाओं को निशाना बनाया जाता है। इसी तरह अधिकारियों के खिलाफ लिखने वाले पत्रकारों के खिलाफ देशद्रोह जैसे मुदकमे दर्ज कर उन्हें परेशान किया जाता है।रिपोर्ट में भारत में आलोचना करने वाले पत्रकारों  के लिए  डराने-धमकाने के माहौल को जिम्मेदार ठहराया है।  यूनेस्को द्वारा 1997 से हर साल 3 मई को विश्व प्रेस स्वतंत्रता दिवस पर दिए जाने वालागिलेरमो कानो वर्ल्ड प्रेस फ्रीडम प्राइज  उस व्यक्ति अथवा संस्थान को दिया जाता है जिसने प्रेस की स्वतंत्रता के लिए उल्लेखनीय कार्य किया हो। भारत में अब तक यह पुरस्कार किसी भी पत्रकार या प्रेस को नहीं दिया गया है  इसके पीछे वजह बताई जाती है कि भारत के किसी भी पत्रकार को यह पुरस्कार नहीं मिलने की एक बड़ी वजह कई वरिष्ठ पत्रकार पश्चिम और भारत में पत्रकारिता के मानदंडों में अंतर  है ।

अब यह रिपोर्ट कितनी निष्पक्ष एवं कितनी पूर्वाग्रहों पर आधारित है यह कहना मुश्किल है । सच यह भी है कि समय-समय पर सरकारों ने भारत में प्रेस को दबाने का पुरजोर प्रयास किया । 1975 में ऐसे ही प्रयासों के अंतर्गत आपातकाल लागू किया गया एवं तब की सरकार के खिलाफ लिखने वाले पत्रकारों को ढूंढ – ढूंढ कर जेलों में ठूंसा गया । उसके बाद भी उत्तर प्रदेश में  प्रेस के एक खास वर्ग पर ‘हल्ला बोल’ जैसे कृत्य किए गए । सरकार के खिलाफ लिखने वाले पत्रकारों को सत्ताधीशों ने हमेशा ही आंख की किरकिरी माना है । कई नामी-गिरामी पत्रकार सरकार विरोधी विचारों पर अडिग रहने के चलते घर भेजे गए  हैं यानी मौका मिलने पर सरकार प्रेस की स्वतंत्रता का गला घोटने में कोई कसर नहीं छोड़ती है । दूसरा सच यह भी है की भारत में प्रेस का एक बड़ा वर्ग भी पूर्वाग्रह ग्रसित होकर लिखने, बोलने से नहीं कतराता है । हालत तब से अधिक खराब हुए हैं जब से अखबारों के मालिकों का संपादकीय विभाग में  हस्तक्षेप बढ़ा है । सरकार उस के पक्ष में किसी भी हद तक जाने वाले नामी-गिरामी पत्रकारों को भी चोर दरवाजे से लाभान्वित कर उन्हें खुश करती है जब से एक खास चैनल के बड़े एंकर एवं मालिक राज्यसभा में गए तब से उस चैनल के दृष्टिकोण में भारी फर्क देखा गया है।

अस्तु स्वतंत्रता ऐसा शब्द है जिसकी सुनिश्चित व्याख्या करना बहुत दुष्कर है और सच यह भी है कि यदि प्रेस रूपी घोड़े को बिना लगाम के छोड़ दिया जाए तो फिर वह लोकतंत्र को उस दिशा में ले जा सकता है जहां वह चाहता है और यह भी एक खतरनाक स्थिति होती है मगर यदि प्रेस दबा हुआ है, सत्ता से डरता है या पक्षपात पूर्ण भड़काने वाली विद्वेष पूर्ण खबरें दिखाता है तथा लाभ पाने के लिए अपने मानकों से नीचे उतर आता है तो फिर प्रेस की आत्मा ही मर जाती है । बेहतर यह है कि प्रेस को सरकारी दखल से स्वतंत्र रखा जाए एवं उस पर नियंत्रण के लिए एक निष्पक्ष नियामक हो जो प्रेस की स्वतंत्रता के साथ उस पर दिशा भटकाव से रोकने के लिए नियंत्रण भी रखे। ‌प्रेस को एक दर्पण की तरह काम करना चाहिए और यह दर्पण भी ने उत्तल हो और न अवतल बल्कि एक समतल दर्पण हो जो हकीकत को दिखाए। खबरें देने से पहले उनके आफ्टर इफैक्ट्स पर चिंतन करे । वास्तविकता के नाम पर जनता को भया क्रांत करने वाली खबरें दिखाने से भी बचना चाहिए यें खबरें अगर बहुत जरूरी हो तोइस तरह दिखाए कि ‘पैनिक क्रिएट’ न हो।

लेखक वरिष्ठ साहित्यकार हैं.

नोट : लेख में लेखक द्वारा व्यक्त विचारों से मातृभूमि समाचार का सहमत होना आवश्यक नहीं है।

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