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संविधान से हटनी चाहिए हिन्दुओं का नरसंहार करने वाले टीपू सुल्तान की तस्वीर

– सारांश कनौजिया

भारतीय इतिहास किस प्रकार हिन्दू विरोधी मानसिकता के साथ लिखा गया है, इसका एक उदाहरण मैसूर के शासक टीपू सुल्तान की जीवनी है। उसे अंग्रेजों से लड़ने वाला क्रांतिकारी बताया गया है। हद तो तब हो गई जब इसी हिन्दू विरोधी मानसिकता के साथ काम करने वाले लोगों ने सचित्र संविधान में भी इस अत्याचारी, क्रूर शासक का चित्र भारत की महान हस्तियों के रुप में प्रकाशित करवा दिया। अधिकांश स्थानों पर सचित्र संविधान का प्रकाशन नहीं होता है, इसलिये ज्यादातर लोगों को इसकी जानकारी नहीं है। विशेष बात यह है कि टीपू सुल्तान का चित्र रानी लक्ष्मीबाई के साथ प्रकाशित किया गया है, जिन्होंने कभी किसी निर्दोष को नहीं सताया, चाहें वो किसी भी धर्म का हो। उनके साथ एक धर्मांध शासक का चित्र प्रकाशित कर उनका भी अपमान किया गया है।

टीपू सुल्तान का वास्तविक नाम सुल्तान फतेह अली खान शाहाब था। इतिहास में उसे अंग्रेजों से लड़ने वाला महान क्रांतिकारी शासक कहा गया है। किंतु वह किन लोगों के लिए आदर्श हो सकता है, इसका एक उदाहरण स्वयं टीपू सुल्तान की तलवार पर लिखा एक वाक्य बताता है। उसकी तलवार पर लिखा था कि मालिक मेरी सहायता कर की मैं काफिरों का सफाया कर दूं। उसके लिये हिन्दू और ईसाई अंग्रेज दोनों ही काफिर थे। वह इसी कारण काफिर (गैर इस्लामिक) अंग्रेजों को अपना शत्रु मानता था। इसके बाद भी उसने अपना शासन बचाने के लिये 1784 में मंगलौर संधि की थी। टीपू सुल्तान के द्वारा गैर मुस्लिमों की लगातार हत्याओं के कारण अंग्रेजों से संधि का उसका छल काम नहीं कर सका। अपना अत्याचार जारी रखने के लिये वह अंग्रेजों पर दबाव बनाना चाहता था, इसके लिए उसने तत्कालीन फ्रांसीसी शासकों से भी मदद लेने का प्रयास किया।

कुछ इतिहासकारों ने टीपू सुल्तान को हिन्दुओं के प्रति उदार दिखाने के लिये कई उदाहरण प्रस्तुत किये हैं, इसलिये मैं भी हिन्दुओं का नरसंहार व उनका धर्मांतरण करने वाले इस धर्मांध इस्लामिक कट्टरवादी का एक चेहरा आपके सामने रखना चाहता हूं। 19वीं सदी के एक ब्रिटिश अधिकारी व लेखक विलियम लेगान की किताब मालाबार मैनुअल’ के अनुसार टीपू सुल्तान ने कालीकट में दिल दहला देने वाला नरसंहार किया। उसके 30 हजार सैनिकों के दल ने रास्ते में पड़ने वाले हर व्यक्ति की हत्या कर दी। बुजुर्गों, महिलाओं व बच्चों किसी को नहीं छोड़ा गया। लोगों में टीपू सुल्तान के नाम का डर पैदा करने के लिये कई लोगों को सार्वजनिक स्थान पर फांसी पर लटका दिया गया, जिससे यह टीपू सुल्तान के आदेशों को न मानने वालों के लिए एक उदाहरण बन सके। ऐसे अनेक अत्याचारी कार्य टीपू सुल्तान के द्वारा किये गए। यद्यपि इतिहास में उसको महान बनाने के लिये इनके बारे में लिखने से बचा गया।

अब प्रश्न यह उठता है कि ऐसे अत्याचारी व्यक्ति का चित्र भारत के संविधान में क्यों दिया गया है? तो इसके लिये भारत की स्वतंत्रता से पहले और स्वतंत्रता के समय की कुछ घटनाओं का ध्यान करना आवश्यक है। मोपला दंगों में हजारों हिन्दुओं की हत्या कर दी गयी, लेकिन गांधी जी ने इसे आपसी संघर्ष बताया, जबकि यह भारतीय इतिहास का पहला सांप्रदायिक दंगा था। स्वामी श्रद्धानंद नाम के एक हिन्दू धार्मिक संत थे, जो क्रांतिकारी विचारों के समर्थक भी माने जाते थे। कट्टरपंथी मानसिकता से दूषित होकर अब्दुल रशीद नाम के एक मुस्लिम व्यक्ति ने उनकी हत्या कर दी। महात्मा गांधी ने इस हत्यारे को अपना भाई बताया और हिन्दू धर्मगुरु की हत्या का बचाव करते हुये इसे सही सिद्ध करने का प्रयास किया। गणेश शंकर विद्यार्थी की हत्या हिन्दू-मुस्लिम दंगों में हुई। एक सम्प्रदाय विशेष के लोगों द्वारा उनकी हत्या की गयी, इस सत्य को गांधी जी ने कभी स्वीकार नहीं किया। यह भारत की पहली मॉब लिंचिंग की घटना थी। धर्म के आधार पर भारत का विभाजन हुआ, एक हिस्सा मुस्लिमों को पाकिस्तान के रुप में मिला, लेकिन हिन्दुओं को हिन्दुस्थान नहीं मिल सका। भारत को हिन्दू राष्ट्र घोषित करने पर गांधी जी सहित कई लोगों ने आपत्ति दर्ज कर दी।

उपरोक्त कुछ उदाहरणों से स्पष्ट है कि स्वतंत्रता से पूर्व गांधी जी और तत्कालीन कुछ कांग्रेसी नेताओं द्वारा लगातार हिन्दुओं की उपेक्षा की जाती रही और हिन्दुओं का उत्पीड़न करने वालों का महिमामंडल कर उन्हें महान सिद्ध करने की सुनियोजित साजिश होती रही। इसी का परिणाम था कि हिन्दुओं का नरसंहार व धर्मांतरण करने वाले क्रूर, धर्मांध, इस्लामिक कट्टरपंथी शासक टीपू सुल्तान के चित्र को भारतीय संविधान में स्थान दिया गया। मैं लेख के माध्यम से भारत सरकार से अनुरोध करता हूं कि टीपू सुल्तान का चित्र संविधान से हटाकर इसके स्थान पर भारत के पूर्व राष्ट्रपति डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम या फिर स्वतंत्रतापूर्व हुए स्वामी श्रद्धानंद जैसे किसी महान व्यक्ति का चित्र लगाया जाये।

लेखक मातृभूमि समाचार के संपादक हैं।

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