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शिक्षक की ओर निहार रहा देश

– डॉ० घनश्याम बादल

कोरोना संक्रमण की तीसरी लहर के आने के भय के बीच पठन-पाठन की प्रक्रिया रुक-रुक, थम-थम के अंदाज में चल रही है। हर वक्त बच्चों से घिरे रहने वाला शिक्षक आज दूर बैठकर ऑनलाइन कक्षाएं ले रहा है । बेशक यह परिस्थितियों की मांग है कि शिक्षक परिस्थितियों के अनुसार शिक्षण की शैली एवं माध्यम दोनों में खुद को इस तरह समायोजित करें कि  शिक्षण और शिक्षक दोनों का सम्मान बना रहे एवं उसके विद्यार्थियों को भी वह सब मिल सके जिसकी उसे न केवल आज जरूरत है अपितु आने वाले समय में भी उसके जीवन के लिए वह एक बहुपयोगी उपहार ज्ञान के रूप में उससे प्राप्त कर सकें।

शिक्षक है समाज की धुरी

 शिक्षा का मूल उद्देश्य भविष्य के ऐसे नागरिक तैयार करना होता है जो अपने समय के समाज एवं देश के कल्याण एवं उत्थान के लिए कार्य कर सकें एक व्यक्ति के रूप में अपना सर्वांगीण विकास कर सकें तथा परिपक्व होने पर आने वाली पीढ़ी के लिए एक ऐसा मंच तैयार कर सके कि वह काल परिस्थिति एवं आवश्यकताओं के अनुरूप भविष्य का निर्माण संरक्षण एवं संवर्धन कर सकें। शिक्षक सदा समाज की धुरी रहा है और समाज को दिशा देने में शिक्षक से अधिक महत्वपूर्ण भूमिका शायद ही किसी और की रही हो ।  कहने को तो नेता, प्रशासक, शासक एवं कर्मचारी मिलकर राष्ट्र का संचालन एवं निर्देशन करते हैं लेकिन गहराई से देखा जाए इन सब को गढ़ने का काम शिक्षक ही करता है ।

तकनीकी ज्ञान हो गया जरूरी

शिक्षक का कार्य केवल अक्षर ज्ञान कराने या पुस्तकीय ज्ञान देने , परीक्षा में पास होने के गुर सिखाने तक सीमित नहीं कहा जा सकता।  भले ही दायित्व के रूप में उसे परीक्षा परिणाम देना होता है तथा गुणवत्ता परीक्षा परिणाम के लिए आजकल उसे उत्तरदायी भी बना दिया गया है लेकिन यदि प्राथमिक स्तर तक की शिक्षा को छोड़ दें तो  माध्यमिक शिक्षा में परीक्षा या पाठ्यक्रम से संबंधित विषय सामग्री का लगभग 60 से 70% तक विद्यार्थी सहायक पुस्तकों, पाठ्य पुस्तकों, नेट या दूसरे माध्यमों से आसानी से प्राप्त कर लेता है ।  आज का विद्यार्थी कक्षा में दिए जाने वाले व्याख्यान पर भी पूरी तरह निर्भर नहीं है सच कहें तो यदि शिक्षक का ज्ञान एवं तकनीकी अपडेटेड ना हो तो आज का विद्यार्थी उसके कक्षा कक्ष में किए गए शिक्षण पर अधिक ध्यान नहीं देता ।  या फिर यूं कहिए कि वह अब शिक्षक के पीछे नहीं अपितु शिक्षक से आगे चलने वाला विद्यार्थी बनकर उभर रहा है और इसकी वजह है विभिन्न प्लेटफॉर्म्स पर प्राप्त गुणवत्तापरक व बहुतायत में उपलब्ध सामग्री।

ज्ञान के स्रोत बहुत पर शिक्षक का नहीं विकल्प:

 यूट्यूब, गूगल, दीक्षा, स्वयंप्रभा, ई पाठशाला, दूरदर्शन के प्रसारण, विभिन्न निजी चैनलों के द्वारा शैक्षिक सामग्री एवं पाठों का प्रसारण आदि अब आसानी से उपलब्ध हैं और आर्थिक रूप से सक्षम अभिभावक अपने बच्चे के लिए यह सब उपलब्ध करा रहे हैं । रही सही कमी कोचिंग सेंटर्स ने पूरी कर दी है यानी इस दृष्टि से सोचें तो आज के विद्यालय शिक्षक का स्थान लेने के लिए बहुत सारे विकल्प तत्पर एवं उद्यत हैं ।तो क्या इसका मतलब यह समझा जाए कि अब शिक्षक की कोई आवश्यकता नहीं रह गई है अथवा कक्षा कक्ष-  शिक्षण की महत्ता समय के साथ कम होते हुए खत्म होने की ओर बढ़ रही है ?   तो इस प्रश्न का उत्तर ‘हां’ भी है और ‘नहीं’ भी ।  यदि शिक्षा का अर्थ केवल ज्ञान प्राप्त करना या सैद्धांतिक शिक्षा प्राप्त करना है तो निश्चित ही शिक्षक का अस्तित्व एवं वर्चस्व खतरे में है लेकिन ऐसा है नहीं ।

समय के साथ बदले शिक्षक

समय के साथ परिवर्तन अवश्यंभावी है । बिना परिवर्तन के प्रगति संभव भी नहीं है और जो समय के साथ नहीं बदलता समय उसे पीछे छोड़ कर आगे निकल जाता है । आज के शिक्षा के परिवेश एवं स्वरूप तथा माध्यम के साथ-साथ शिक्षक को भी इस बदलाव के साथ बदलना होगा। अब चॉक, डस्टर, श्यामपट्ट प्रयोग करने वाले या व्याख्यान देने वाले शिक्षक बच्चों को आकर्षित नहीं करते ।  शिक्षक केंद्रित शिक्षण के जमाने में भी अब लग गए हैं ।

बहुत बड़ा है शिक्षक का दायित्व

आज शिक्षक के ऊपर विद्यार्थियों या अभिभावकों की निर्भरता भी लगातार घट रही है जिसके चलते शिक्षक के प्रति उनका श्रद्धा भाव या भावनात्मक लगाव भी अब बहुत कम हो गया है तथा शिक्षक को भी समाज में अब एक वेतन पाने वाले कर्मचारी के रूप में देखने वाले लोग बड़ी संख्या में हो गए हैं। सच यह भी है कि शिक्षा या ज्ञान की प्राप्ति केवल पुस्तकों बुद्धि लब्धि या तर्क शास्त्र के नियमों से नहीं हो सकती है । बेशक, वहां तर्क काम करता है लेकिन यदि शिक्षक एवं विद्यार्थी के बीच में एक आत्मिक लगाव एवं जुड़ाव होता है तब ज्ञान केवल तार्किक नहीं रह जाता अपितु भावनात्मक तथा व्यवहारिक भी हो जाता है । अब यह शिक्षक की जिम्मेदारी है कि बेतहाशा दौड़ते हुए आज के इस युग में उसे एक ऐसा ठहराव लाना है जिससे गति भी बाधित न हो एवं मानसिक संवेग, मनोभाव, दया, करुणा,सहानुभूति, आत्मानुभूति तथा सौहार्द्र जैसे गुण बचे रह सके। सार रूप में कहीं तो शिक्षक का दायित्व बहुत बड़ा है।

आपदा को अवसर में बदले

बेशक, आज के डिजिटल संसार में शिक्षक का तकनीकी रूप से सक्षम एवं दक्ष होना आवश्यक नहीं अपितु अनिवार्य हो गया है । उसे अधुनातन तकनीकियों का प्रयोग अधिकार के साथ करना आना चाहिए। उसके शिक्षार्थी या शिष्य उसका सम्मान तभी करेंगे जब है उन्हें उस सामग्री से इतर व श्रेष्ठ सामग्री दे सके जो विभिन्न प्लेटफॉर्म्स पर उपलब्ध नहीं है क्योंकि यदि बच्चे को उसी सामग्री को पढ़कर देखकर यह सुनकर ही ज्ञान प्राप्त करना है सब है शिक्षक पर आश्रित क्यों होगा ?

वस्तुतः शिक्षक को ज्ञान संप्रेषण हेतु उपयोगी ,व्यवहारिक ,अपग्रेडेड एवं गुणवत्ता परक सामग्री रोचक तरीके से शिक्षार्थियों तक पहुंचानी होगी और इसके लिए यह जरूरी नहीं कि सारे समय वही बोलता रहे , अधिकांश समय वही प्रस्तोता हो बल्कि उसे अपने विद्यार्थियों को इस प्रकार से ‘प्रो एक्टिव’ रखना होगा कि कक्षा के केंद्र बिंदु वही रहे और शिक्षक कक्षा में एक पर्यवेक्षक या फैसिलिटेटर की भूमिका में रहे । वह बच्चों को उपयुक्त शैक्षिक वातावरण प्रदान करे उनमें उत्कंठा, जिज्ञासा एवं कटिबद्धता पैदा करे।  अपने विद्यार्थियों में जागरूकता एवं तार्किकता के साथ-साथ दूसरों के द्वारा प्रस्तुत की गई सामग्री को स्वीकार्यता प्रदान करना उसमें से काम की विषयवस्तु का चयन करना एवं उसको अपनी व्यवहारिक जीवन में उपयोग करना सिखाना होगा। आने वाला समय शिक्षकों के लिए और भी चुनौती भरा होने वाला है। यदि  कोविड-19 संक्रमण एक आपदा के रूप में आया है तो यह एक अवसर भी है कि शिक्षक आने वाली परिस्थितियों को भांपकर बिना विद्यार्थियों के भौतिक संपर्क में आए किस प्रकार से उनकी शिक्षा को आगे बढ़ा सकता है।‌

बनना होगा नवाचारी

ऑनलाइन शिक्षा के इस दौर में उसकी उपयोगिता के साथ-साथ उसकी सीमाएं एवं बच्चों तथा शिक्षकों के शारीरिक एवं मानसिक स्वास्थ्य पर पड़ने वाले को प्रभाव भी सामने आए हैं । अब यह शिक्षक की महती जिम्मेदारी हो गई है कि वह ऑनलाइन शिक्षा की परिधि को बढ़ाए।  इसकी सीमाओं एवं जटिलताओं व  कठिनाइयों का निवारण करने के लिए नवाचार के लिए आगे आए ।

लेखक अनुभवी शिक्षाविद हैं.

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