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खुशहाली का प्रतीक है बछबारस का पर्व

– डॉ मोनिका ओझा खत्री

हमारे देश में हर दिन कोई ना कोई त्यौहार और व्रत मनाया जाता है। श्रावणी तीज के बाद त्योहारों की लाइन सी लग जाती है। बछबारस का पर्व राजस्थान सहित देश के ज्यादातर हिस्सों में हर्षोल्लास से मनाया जाता है। इस साल 4 सितंबर को बछबारस का पर्व मनाया जाएगा। मान्यता है कि सभी देवी देवताओं का गाय में वास होता है और गाय और बछड़े की पूजा से भगवान प्रसन्न होते हैं। पौराणिक मान्यता के अनुसार भगवान श्रीकृष्ण के जन्म के बाद माता यशोदा ने इसी दिन गोमाता का दर्शन और पूजन किया था। जिस गोमाता को स्वयं भगवान कृष्ण नंगे पांव जंगल-जंगल चराते फिरे हों और जिन्होंने अपना नाम ही गोपाल रख लिया हो, उसकी रक्षा के लिए उन्होंने गोकुल में अवतार लिया। ऐसी गोमाता की रक्षा करना और उनका पूजन करना हर भारतवंशी का धर्म है।

राजस्थान में इस पर्व को बहुत ही खास महत्व दिया जाता है। बछ बारस के दिन महिलाएं गाय-बछड़े का चित्र बनाती है और उसका पूजा की जाती है। पूजा सामग्री में मुख्य रूप से जल, दही, मोठ-बाजरा, रोली, चावल, हरी दूब, बासी रोटी शामिल होती है। इस दिन कोई भी गाय के दूध, दही तथा चावल को खाने में शामिल नहीं करता है। महिलाएं व्रत रखकर बासी भोजन का सेवन करती है। तिलक में वैसे तो हम चावल का प्रयोग करते है लेकिन इस दिन तिलक के लिए खास तौर पर बाजरे का उपयोग किया जाता है। शास्त्रों में कहा है सब योनियों में मनुष्य योनी श्रेष्ठ है। यह इसलिए कहा है कि वह गोमाता की निर्मल छाया में अपने जीवन को धन्य कर सकें। गोमाता के रोम-रोम में देवी-देवता एवं समस्त तीर्थों का वास है। इसीलिए हमारे पौराणिक ग्रन्थ बताते हैं समस्त देवी-देवताओं एवं पितरों को एक साथ प्रसन्ना करना हो तो गौसेवा से बढ़कर कोई अनुष्ठान नहीं है।

 भविष्य पुराण के अनुसार गोमाता कि पृष्ठदेश में ब्रह्म का वास है, गले में विष्णु का, मुख में रुद्र का, मध्य में समस्त देवताओं और रोमकूपों में महर्षिगण, पूंछ में अनंत नाग, खूरों में समस्त पर्वत, गौमूत्र में गंगादि नदियां, गौमय में लक्ष्मी और नेत्रों में सूर्य-चन्द्र विराजित हैं।

बछबारस के दिन महिलाएं अपने बेटे की सलामती, लंबी उम्र और परिवार की खुशहाली के लिए यह पर्व मनाती हैं। इस दिन घरों में विशेष कर बाजरे की रोटी जिसे सोगरा भी कहा जाता है और अंकुरित अनाज की सब्जी बनाई जाती है। हमारे शास्त्रों में इसका माहात्म्य बताते हुए कहा गया है कि बछ बारस के दिन जिस घर की महिलाएं गोमाता का पूजन-अर्चन करती हैं। उसे रोटी और हरा चारा खिलाकर उसे तृप्त करती हैं, उस घर में मां लक्ष्मी की कृपा सदैव बनी रहती है और उस परिवार में कभी भी अकाल मृत्यु नहीं होती है।

इस दिन व्रत रखने वाली महिलाएं सवेरे स्नान करके साफ वस्त्र पहनती हैं।  इसके बाद गाय और उसके बछड़े को स्नान कराया जाता है।  दोनों को नए वस्त्र ओढ़ाए जाते हैं।  गाय और बछड़े को फूलों की माला पहनाएं, दोनों के माथे पर तिलक लगाएं और सीगों को सजाएं. इसके बाद एक तांबे के पात्र में अक्षत, तिल, जल, सुगंध और फूलों को मिला लें और इसे ’क्षीरोदार्णवसम्भूते सुरासुरनमस्कृते। सर्वदेवमये मातर्गृहाणाघ्र्य नमो नमः॥’ मंत्र का उच्चारण करते हुए गौ प्रक्षालन करें। गौ माता के पैरों में लगी मिट्टी से अपने माथे पर तिलक लगाएं।  बछ बारस की कथा सुनें और दिनभर व्रत रखें। रात को अपने इष्ट और गौ माता की आरती करके व्रत खोलें और भोजन करें। ऐसा कहा जाता है कि इस दिन गाय के दूध, दही और चावल नहीं खाने चाहिए. बाजरे की ठंडी रोटी खाएं।

लेखिका वरिष्ठ स्तंभकार हैं

नोट : लेख में लेखक द्वारा व्यक्त विचारों से मातृभूमि समाचार का सहमत होना आवश्यक नहीं है।

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