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पाकिस्तान की आर्थिक स्थिति को कमजोर कर कट्टरवाद को बढ़ाता ईशनिंदा कानून

– सारांश कनौजिया

पाकिस्तान में इस्लाम के खिलाफ बोलने को ईशनिंदा मानकर आरोपी को कड़ी सजा देने का प्रावधान है। पाकिस्तान एक मुस्लिम राष्ट्र है, इसलिये कानून भी उसी के अनुसार बनाये जाएंगे, लेकिन फिर क्या दूसरी मान्तयाओं को मानने वाले लोगों को पाकिस्तान छोड़ देना चाहिए। ईशनिंदा कानून भारत-पाकिस्तान विभाजन के बाद हुए उस समझौते के भी विरुद्ध है, जिसके अनुसार दोनों देश अपने यहां अल्पसंख्यकों की पूरी चिंता करेंगे। इस्लामिक कट्रवाद से प्रभावित इस पक्षपातपूर्ण कानून पर अब यूरोप के हाल के प्रस्ताव से पाकिस्तान की आर्थिक स्थिति और खराब हो जायेगी।

स्वयं को इस्लाम का सबसे बड़ा उपासक सिद्ध करने के चक्कर में पाकिस्तानी प्रधानमंत्री इमरान खान एक बड़ी भूल कर गये। उन्होंने यूरोपीय यूनियन सहित विश्व के विभिन्न देशों से ईशनिंदा के विरुद्ध कानून पारित करने का अनुरोध किया। पाकिस्तान के ईशनिंदा कानून के अनुसार इस्लाम का अपमान करने वाले व्यक्ति को मौत की सजा भी दी जा सकती है। इमरान खान ने यूरोपीय यूनियन से इस्लाम का अपमान करने वालों के लिये ऐसी ही सजा की मांग की थी, लेकिन वो ये भूल गये कि यदि सम्प्रदाय के आधार पर यूरोपीय यूनियन ने ऐसा कोई कानून बनाया, तो वहां ईसाई सम्प्रदाय का अपमान करने वालों को मौत की सजा मिलेगी। फिलहाल पाकिस्तान के ईशनिंदा कानून से सबसे अधिक दिक्कत ईसाई समुदाय को ही है। पाकिस्तान में उन पर अक्सर धर्मांतरण का आरोप लगता है और उनके खिलाफ ईशनिंदा कानून के अंतर्गत कार्रवाई की जाती है।

भारत में भी ईसाई मिशनरियों पर धर्मांतरण कराने के आरोप हमेशा लगते रहे हैं, लेकिन आरोप सिद्ध होने की स्थिति में भी किसी को सजा-ए-मौत नहीं दी जाती। फिर कानून ऐसा होना चाहिए कि कोई भी व्यक्ति किसी दूसरे की मान्तया का अपमान न करे, ईशनिंदा कानून जहां एक ओर सिर्फ इस्लाम का अपमान करने की स्थिति में कार्रवाई करता है, वहीं अहमदिया मुसलमानों की मस्जिदों को अगर मुस्लिमों द्वारा ही गिरा दिया जाता है, तो यह कानून कुछ नहीं करता। सिख सम्प्रदाय के गुरुद्वारे हों या हिन्दुओं के अन्य मंदिर, उन पर हमलों को यह कानून नहीं रोकता। भारत से पाकिस्तान गए मुस्लिमों पर होने वाले अत्याचारों पर भी यह कानून मौन रहता है। कट्टरवादी इस्लामिक विचार के साथ बनाया गया यह कानून अब यूरोपीय यूनियन को परेशान करने लगा है। पाकिस्तानी प्रधानमंत्री के द्वारा ईशनिंदा कानून की बात करने से उनके घाव फिर हरे हो गये हैं और इसका दुष्परिणाम पाकिस्तान की आर्थिक स्थिति पर पड़ना तय है।

पाकिस्तान का टेक्सटाइल उद्योग पूरी तरह से बर्बाद होने के कगार पर पहुंच चुका है। पहले इमरान खान ने भारत से कपास आयात करने का निर्णय लिया, लेकिन फिर अपनी कट्टरपंथी इस्लामिक राष्ट्र की छवि को बनाये रखने के लिये यूटर्न ले लिया। अभी पाकिस्तानी जनता इस सदमे से बाहर भी नहीं निकल पायी थी कि यूरोपीय यूनियन ने उन्हें और बड़ा झटका दे दिया है। यूरोपीय देशों ने इस ईशनिंदा कानून और हाल ही में पाकिस्तान के द्वारा आतंकी संगठन घोषित किये गये तहरीक-ए-लब्बैक पाकिस्तान के द्वारा फ्रांस के विरुद्ध हुये हिंसक प्रदर्शनों पर कड़ा रुख अपनाते हुये एक प्रस्ताव पारित किया है। इस प्रस्ताव के लागू होने के बाद पाकिस्तान को यूरोपीय देशों द्वारा दिया गया वरीयता का दर्जा समाप्त हो जायेगा। इसके बाद पाकिस्तान के लिये यूरोपीय देशों को निर्यात करना बहुत मुश्किल हो जायेगा। यूरोपीय देशों से आयात पर भी नये प्रस्ताव का असर पड़ेगा।

पाकिस्तानी जनता पहले ही बहुत परेशान है। वहां के ज्यादातर लोगों का मानना है कि यदि भारत से सहायता लेकर उनका कुछ भला हो सकता है, तो हमें ऐसा जरुर करना चाहिए। कुछ लोगों का तो स्पष्ट रुप से मानना है कि चीन की अपेक्षा भारत से संबंध रखना अधिक लाभदायक है। इसके बाद भी स्वयं को इस्लाम का सबसे बड़ा समर्थक बताने के कारण पाकिस्तानी सरकार अपने नागरिकों को दो वक्त की रोटी से भी दूर रखे हुये हैं। ऐसे में यदि यूरोपीय देश भी पाकिस्तान से अपना व्यापार कम कर देंगे या पाकिस्तान का वरीयता का दर्जा समाप्त होने के कारण उसके उत्पाद यूरोपीय देशों में महंगे हो जाएंगे, तो फिर हालात और खराब होने से कोई नहीं रोक सकता। कई मुस्लिम देश पहले ही पाकिस्तान का साथ छोड़ चुके हैं। चीन हर सहायता के लिये पाकिस्तान से बड़ी कीमत वसूलता है, इसलिये चीनी निवेश का पाकिस्तानी क्षेत्रों में भारी विरोध है। ऐसे में पाकिस्तान प्रतिदिन के खर्च भी कैसे निकाल पायेगा, यह उसे विचार करना होगा।

हम इस्लाम का विरोध नहीं कर रहे और न ऐसा करने का समर्थन करते हैं। किंतु नियम सभी के लिये समान होने चाहिए, ऐसा हमारा दृढ़ विश्वास है। इसलिये पाकिस्तान को यदि शेष विश्व से संबंध रखना है, तो उसे सभी को समान अधिकार देने ही चाहिए। पाकिस्तान की कानून व्यवस्था उसका आतंरिक मामला हो सकती है, लेकिन जब इस कारण उसका असर भारत पर प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रुप से पड़ता है, तो अपने विचार रखने आवश्यक हो जाते हैं।

लेखक मातृभूमि समाचार के संपादक हैं।

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