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गुरु बनने प्रवृत्त हो शिक्षक, शिक्षक दिवस पर विशेष

– डॉ. वंदना सेन

प्रायः कहा जाता है भारत विश्व गुरु रहा है। इसका तात्पर्य यही है कि भारत के पास विश्व का सर्वश्रेष्ठ ज्ञान का भंडार था। सभी क्षेत्रों में भारत बहुत ही संपन्न था। जिस समय विश्व के पास केवल किताबी शिक्षा थी, उस समय भारत के पास ज्ञान का विपुल भंडार था। भारत के पास विश्व विख्यात विश्वविद्यालय थे। नालंदा, विक्रम और तक्षशिला विश्वविद्यालय का इतिहास पढ़ लीजिए, आपको यह पता चल जाएगा कि हमारा भारत ज्ञान के क्षेत्र में समुन्नत था। भारत के साहित्य में हर समस्या का समाधान था, बल्कि कहा जाए तो हमारी शिक्षा समाधान कारक ही थी।

भारत में प्रति वर्ष डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन के जन्म दिवस 5 सितंबर को शिक्षक दिवस के रूप में मनाया जाता है। लेकिन हम अगर यह नहीं जानते कि शिक्षक क्या है? तो हम केवल हम दिवस मनाने तक ही सीमित रह जाएंगे, इसके लिए शिक्षकों को भी यह भान रहना चाहिए कि राष्ट्र के भावी निर्माण के लिए उनके क्या कर्तव्य हैं? इसका बोध रहेगा तो ही शिक्षक दिवस की प्रासंगिकता है। वास्तव में शिक्षक क्या होता है? इसका आशय केवल विद्यालय तक सीमित नहीं है, शिक्षक अपनी कृति से, अपने व्यवहार से आजीवन शिक्षा देने वाला होता है।

आज कई शिक्षक ऐसे भी दिखाई देते हैं जो विद्यालय के बाद अन्य उपक्रम करते हैं। क्या यह शिक्षक के कर्तव्य हैं? क्या यह देश की भावी पीढ़ी के उन्नयन की दिशा तय कर सकते है? कदाचित नहीं। हमारे देश के शिक्षकों को देश की भावी पीढ़ी को यह ज्ञान भी देना होगा कि उसके सामाजिक कर्तव्य क्या हैं? हम तब और केवल तब ही शिक्षक कहलाने के अधिकारी है, जब हमारी दी हुई शिक्षा के माध्यम से देश में समरसता का भाव निर्मित हो। लेकिन यह आज के समय में दिखाई नहीं दे रहा है।

वर्तमान में हम देखते है कि हमारे पास किताबें तो हैं, लेकिन अनुभव की कमी है। जीवन का मार्ग क्या होना चाहिए इस दिशा का अभाव है। यह केवल विवेक जाग्रत करने से ही आ सकती है, विवेक जाग्रत करने के लिए ज्ञान का होना बहुत ही आवश्यक है। भारत की पुरातन शिक्षा प्रणाली का बेहतर माध्यम गुरुकुल होते थे। ध्यान रखने वाला तथ्य यह है कि गुरुकुल में अध्यापन कराने वाले अपने आपको केवल शिक्षक नहीं मानते थे, वे गुरु की भूमिका में थे। जो केवल शब्द ज्ञान नहीं कराते, बल्कि जीवन की हर आवश्यक शिक्षा का बोध कराते थे। जहां जीवन की मर्यादित संहिताओं के अंतर्गत ज्ञान दिया जाता था।

जहां राष्ट्रीय कर्तव्यों का बोध कराया जाता था, जहां अध्यात्म की शिक्षा दी जाती थी। लेकिन वर्तमान में हम देखते हैं कि हमारे शिक्षालयों में केवल पुस्तकीय पाठ्यक्रम को ही मुख्य आधार बना लिया है, जो केवल डिग्री ही दिला सकता है अनुभव नहीं। ज्ञान और किताबी शिक्षा को एक उदाहरण से समझा जा सकता है। आज का बड़े से बड़ा चिकित्सक केवल तब ही उपचार करता है, जब वह मरीज की जांच करा लेता है, लेकिन पुरातन काल में जो वैद्य होते थे वह चेहरा देखकर बता देते थे कि मरीज को क्या बीमारी है। यह सब भारतीय ज्ञान के आधार पर ही संभव है।

शिक्षा का भारतीयकरण किया जाना आज के समय में अत्यंत प्रासंगिक भी है और भारत के बहुमुखी विकास के लिए आवश्यक भी है। आज जो व्यक्ति भारत की मूल शिक्षा की बढ़ते कदमों को रोकने का प्रयास करते दिखाई देते हैं, वह निसंदेह देश को आगे बढ़ने से रोकने का ही प्रयास कर रहे होते हैं। यह हमें भी तय करना होगा कि हम अपने बच्चों को कैसी शिक्षा दें। क्योंकि आज की शिक्षा के माध्यम से नैतिक जीवन मूल्यों का पतन हो रहा है। जो अभिभावक अपने बच्चों को अपने सुखद भविष्य के लिए शिक्षा ग्रहण कराते हैं, एक दिन वे ही छोड़कर चले जाते हैं।

यह संस्कारों की कमी के चलते ही हो रहा है। यह संस्कार एक शिक्षक ही दे सकता है। जीवन की खुशियों को पैसों से तौलकर देखने की परिपाटी बनती जा रही है, इसके विपरीत पारिवारिकता और सामाजिकता का लगातार ह्रास हो रहा है। हमारे परिवार और समाज के प्रति क्या कर्तव्य हैं, यह ज्ञान हमारी शिक्षा से बहुत दूर होते जा रहे हैं। इस समय भारत को किताबी शिक्षा के साथ ही ज्ञान की भी बहुत आवश्यकता है, जिसे देश का शिक्षक समाज बहुत अच्छे से कर सकता है।

हम जानते हैं कि लम्बे समय तक भारत परतंत्र रहा। इस कालखंड में मुगल और अंग्रेज शासकों भारत की व्यवस्था को पूरी तरह से बदल दिया। आशय यही है कि हमारे भारत का वह स्वरूप नहीं रहा, जो इनके पहले था। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद वह भारत दिखना चाहिए था, वैसे ही गुरुकुल भी बनाए जाने चाहिए थे, लेकिन सरकारें वैसा नहीं कर सकीं। अब लगभग एक वर्ष पूर्व केंद्र की मोदी सरकार ने शिक्षा नीति में व्यापक परिवर्तन करके उस राह पर कदम बढ़ाने का प्रयास किया है।

नई शिक्षा नीति छात्रों को उस दिशा की तरफ ले जाने में समर्थ होगी, जो भारत की दिशा है। यह शिक्षा बहुत ही आवश्यक है, लेकिन अब हमारे शिक्षकों को यह भी तय करना चाहिए कि इस शिक्षा में आध्यात्मिक शिक्षा का भी समावेश होना चाहिए। लेकिन विद्यालयों में वेदों का अध्ययन नहीं कराया जा रहा, यह हमारे शिक्षा तंत्र का ही दोष था, जिसे अब दूर करने का प्रयास भी किया जा रहा है।

वर्तमान में जो शिक्षक हैं उन्हें यह तय करना होगा कि वे अपने छात्रों को ऐसा भी ज्ञान दें जो केवल किताबी न हो, बल्कि जीवन को दिशा देने वाला हो। हमारे राष्ट्रीय कर्तव्य क्या हैं? यह शिक्षा डिग्रियों से नहीं आ सकती। वास्तव में एक शिक्षक को गुरु की भूमिका में आना होगा। तभी शिक्षा के साथ विवेक का जागरण हो सकेगा। और तभी भारत विश्व गुरु के मार्ग पर कदम बढ़ा सकेगा।

लेखिका मध्यप्रदेश की वरिष्ठ शिक्षाविद हैं.

नोट : लेख में लेखक द्वारा व्यक्त विचारों से मातृभूमि समाचार का सहमत होना आवश्यक नहीं है।

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