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शिक्षा की दशा और दिशा पर चिंतन मंथन की जरुरत

– बाल मुकुन्द ओझा

पूर्व राष्ट्रपति डॉ सर्वपल्ली राधाकृष्णन का जन्म दिवस 5 सितम्बर को हर साल शिक्षक दिवस के रूप में मनाया जाता है। इस दिन समाज और देश के विकास में शिक्षकों के योगदान पर प्रकाश डाला जाता है। समारोह आयोजित कर शिक्षकों का सम्मान किया जाता है। डॉ राधाकृष्णन छात्रों को लगातार प्रेरित करते थे कि वे उच्च नैतिक मूल्यों को अपने आचरण में उतारें। वे जिस विषय को पढ़ाते थे, पढ़ाने के पहले स्वयं उसका अच्छा अध्ययन करते थे। दर्शन जैसे गंभीर विषय को भी वे अपनी शैली की नवीनता से सरल और रोचक बना देते थे उनकी मान्यता थी कि यदि सही तरीके से शिक्षा दी जाए तो समाज की अनेक बुराइयों को मिटाया जा सकता है।

उनका मानना था कि करूणा, प्रेम और श्रेष्ठ परंपराओं का विकास भी शिक्षा के उद्देश्य हैं। वे कहते थे कि जब तक शिक्षक शिक्षा के प्रति समर्पित और प्रतिबद्ध नहीं होता और शिक्षा को एक मिशन नहीं मानता तब तक अच्छी व उद्देश्यपूर्ण शिक्षा की कल्पना नहीं की जा सकती।कोरोना ने शिक्षा के हर क्षेत्र को प्रभावित किया है। कोरोना संकट ने शिक्षा और शिक्षक दोनों  को बरबाद करने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी। इस दौरान शिक्षक और  विद्यार्थी  दोनों घरों में कैद होकर रह गए। अलबत्ता शिक्षकों ने जैसे तैसे ऑनलाइन पठन पाठन का कार्य जारी रखने का  भरसक प्रयास किया। बहुत से शिक्षकों ने कोरोना संकट में विद्यार्थियों की पढ़ाई को सुचारु चलाए रखने के लिए किताबों को घरों तक पहुंचाया। कुछ ने गूगल मीट और जूम एप से ऑनलाइन पढ़ाई करवाई। कुछ शिक्षकों ने स्कूलों में आकर स्मार्ट क्लासरूम से पढ़ाई को जारी रखा। शिक्षक दिवस हम इन्हीं चुनौतियों  बीच मनाने जा रहे है।

5 सितम्बर के दिन हमें डॉ राधाकृष्णन के विचारों के अनुरूप देश को ढालने और मजबूत बनाने की आवश्यकता है। संस्कारित, नैतिक और चरित्रवान समाज के निर्माण के उनके सपने को पूरा करने की जिम्मेदारी शिक्षकों के साथ साथ समाज की भी है। लेकिन सबसे पहले हमें आज की हमारी बुनियादी शिक्षा पर विचारने की जरुरत है। जब तक हमारी बुनियाद मजबूत नहीं होगी तब तक देश को मजबूत बनाने की बात कोरी कल्पना होगी। हमें यह देखना होगा कि हम किस प्रकार की शिक्षा अपने नौनिहालों को दे रहे और देना चाहते है जिनके बूते देश और समाज के दिशा निर्धारण की बात करते हैं। शिक्षक समाज की आधारशिला है। किसी राष्ट्र के वास्तविक निर्माता उस देश के शिक्षक होते हैं। शिक्षक निश्चय ही समाज और राष्ट्र के भविष्य का निर्धारण करते है इसमें कोई दो राय नहीं है मगर आज के दिन हमें बिना लाग लपेट के शिक्षा की वर्तमान दशा और दिशा पर भी चिंतन और मंथन करने की जरुरत है।

भारत में गुरूकुल की शिक्षा को आज भी याद किया जाता है। गुरूकुल की शिक्षा में हमारे आपसी सम्बन्धों, सामाजिक सांस्कृतिक एकता, गौरवशाली परम्पराओं को प्रमुखता से केन्द्र बिन्दु में रखा जाता था ताकि बालक पढ़ लिखकर चरित्रवान बने और उसमें नैतिक संस्कारों का समावेश हो। गुरुकुल शिक्षा का आधार, संस्कारों की बुनियाद है। संस्कारों के बिना सार्थक शिक्षा की कल्पना नहीं की जा सकती। गुरुकुल शिक्षा अंधेरे से प्रकाश की यात्रा है तथा संस्कार हमारी जीवन-शैली हैं। संस्कार हमें दिशा बोध के साथ-साथ कर्त्तव्यों का भी बोध कराते हैं। शिक्षा मानव के व्यक्तित्व का सर्वांगीण विकास कर उसे भले-बुरे का ज्ञान कराती है। किसी भी देश का विकास वहाँ की शिक्षा प्रणाली पर निर्भर करता है।

शिक्षा से न केवल व्यक्ति आगे बढ़ता है अपितु उसके जीवन से अज्ञानता का अंधेरा दूर होकर ज्ञान की रोशनी प्रज्जवलित होती है। मगर आज की शिक्षा प्रणाली संस्कारों से हट कर अंक प्राप्ति तक सीमित हो कर रह गई है। आज ज्ञान विज्ञान का स्थान अंक अर्जित करने पर अधिक हो गया है। डॉ राधाकृष्णन का कहना था कि यदि शिक्षा सही प्रकार से दी जाए तो समाज से अनेक बुराइयों को मिटाया जा सकता है। इसके लिए जरुरी है कि शिक्षक स्वयं नैतिक रूप से मजबूत हो। डॉ राधाकृष्णन के विचारों के अनुरूप हमारी बुनियादी शिक्षा गुणवत्तायुक्त और मजबूत होगी तो हम शिक्षा को गुणग्राही बनाकर देश को विकास के राह पर आगे बढ़ा पायेंगे।

लेखक राजस्थान के वरिष्ठ पत्रकार हैं.

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