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जीवन की विद्रूपताओं को उकेरता उपन्यास ‘सिक्कों में ढलते लोग’

– डॉ घनश्याम बादल

जीवन में व्याप्त विद्रूपता, पाखंड, चालाकियों, एवं धूर्तताओं तथा लंपटता पर एक करारा प्रहार है नेमपाल प्रजापति का नया उपन्यास सिक्कों में ढलते लोग। पराग बुक्स से प्रकाशित 164 पेज का यह व्यंग्य का पिटारा लेखक में बैठे हुए कवि को भी बार-बार आपके सम्मुख लेकर आता है ।  उपन्यास की शुरुआत ही एक कविता से होती है और बीच-बीच में विभिन्न पात्रों के माध्यम से एवं सूत्रधार के रूप में लेखक मारक किस्म की कविताओं से उपन्यास को सजाता चला गया है  इसलिए ऐसे पाठक जिनकी कविता में रूचि हो उन्हें यह उपन्यास ज्यादा रुचेगा ।

इससे पूर्व नेपाल प्रजापति का एक और उपन्यास बिसात 2017 में आया था इस उपन्यास पर भी ‘बिसात’ की छाया स्पष्ट झलकती है ।  शैली भी कमोबेश वही है और कथानक के पात्र बदले होने के बावजूद उपन्यास का बीज भी करीब करीब ऐसा ही है। लेखक ने पूरे उपन्यास को छोटे – छोटे से शीर्षकों  में बाँटा है जिनमें से कुछ के नाम तो पात्रों के ऊपर ही हैं तथा कुछ उसमें घटित होने वाली घटनाओं का संकेत करते हैं ।

लेखक का मुख्य पात्र चवन्नी लाल चौरसिया एक क्लर्क है जिस कविता के साथ-साथ कहानी आदि लिखने का भी चस्का है और जो अपनी रचना शीलता के माध्यम से नाम कमाकर प्रसिद्ध होने की ललक में डूबा है ।  चवन्नीलाल जीवन का एक साधारण सा पात्र है, जिसकी अपनी सीमाएं हैं और वह सीधा-साधा ऐसा व्यक्ति है जिसका उपयोग सेवाराम शास्त्री डॉक्टर सूर्य भानु सिंह, डॉक्टर सरगम आदि सहित सारे सक्षम पात्र करते हैं मगर मक्कार किस्म का एडवोकेट मौसमी लाल अग्रवाल उसका सबसे ज्यादा फायदा उठाता है और उसके प्रसिद्ध होने की ललक का फायदा उठाते हुए उससे अच्छे खासे पैसे भी हड़प लेता है तथा उसे बिना कुछ किए पीएचडी करवा देने , मानहानि का मुकदमा करके प्रसिद्ध होने, का जाल भी फेंकता है और चवन्नी लाल उसके ही नहीं हर एक पात्र के जाल में फंसता चला जाता है ।

उपन्यास साहित्य जगत के अंदर स्वयंभू मठाधीशों प्रकाशको एवं व्यवसायिक तत्वों के घुस आने लेखक की मजबूरी एवं लालसा का फायदा उठाने को भी सामने लाता है। उपन्यास में एक से बढ़कर एक मजेदार पात्रों के पूरी फौज है जिसमें एक से ज्यादा पात्र दमित यौन इच्छा के शिकार दर्शाए गए हैं और वे अपनी इस इच्छा को पूरा करने के लिए नैतिक अनैतिक का अंतर मिटा कर अपना लक्ष्य साधते हैं । ‘सिक्कों में ढलते लोग’ आज के भौतिक युग की दूसरे का बेवकूफ बनाकर अपना उल्लू सीधा करने की प्रवृत्ति को बेझिझक तरीके से उजागर करता चलता है एवं प्रत्यक्ष , अप्रत्यक्ष रूप से यह भी बताता है कि स्वार्थ सिद्धि में डूबे व्यक्ति के लिए ना कोई मित्र होता है न अपना,  उसके लिए न अपना स्वाभिमान मायने रखता है न किसी और का और ऐसी प्रवृत्ति के चलते हुए डॉ सूर्य भानु सिंह मौसमी अग्रवाल को ढाई लाख रुपए तक देने को विवश हो जाते हैं।

उपन्यास के ऊपर साठोत्तरी कहानी का भी प्रभाव देखने को मिलता है क्योंकि यह उपन्यास केवल समस्याएं उठाकर नहीं छोड़ता अपितु उन्हें उनके अंत तक भी लेकर जाता है ।  उदाहरण के लिए उपन्यास के अंत में धन का लोभी, मक्कार एवं धूर्त एडवोकेट मौसमी अपना मानसिक संतुलन खो बैठता है और राष्ट्रपति का चुनाव लड़ने की बातें करता दिखाई देता है । साथ ही साथ लोगों में घटती हुई आत्मीयता एवं केवल अपने तक ही सीमित रहने दूसरों की हँसी उड़ाने की प्रवृत्ति को भी नेमपाल प्रजापति ने एक लेखक के रूप में बखूबी उभारा है। उपन्यास के माध्यम से लेखक के पढ़ाकू होने का पता चलता है ।  बहुत सारे विद्वानों की उक्तियों के साथ साथ व्यवहारिक जीवन की सारगर्भित उक्तियों को उद्धृत करने की क्षमता एवं प्रवृत्ति दोनों ही इस उपन्यास में झलकते हैं । इसकी एक बानगी देखिए :  “दलित लोगों को अपनी रोजी-रोटी कमाने रहन-सहन और पढ़ने में कइतना कष्ट उठाना पड़ा है यह मानव का मानव पर अत्याचार ही है “, और “देखो मित्रसेन यह घड़ियाली आंसू तो मुझे दिखाओ नहीं, मुझे भी 20 – 25 साल हो गए प्रैक्टिस करते हुए, मैंने बहुत लोगों के यह घड़ियाली आंसू देखे हैं”

इस उपन्यास में प्रयुक्त संवाद  एक चुटीलापन लिए हुए हैं और पाठक का भरपूर मनोरंजन करते हैं । बड़े लोगों द्वारा छोटे लोगों का उपयोग करना, सार्वजनिक स्थानों पर उन्हें अपने घर आने के लिए कहना एवं घर के पास होने पर भी न बुलाना जैसी प्रवृत्तियों पर भी उपन्यास गहरी चोट करता है। ‘सिक्कों में ढलते लोग’  चवन्नी लाल की कहानी के  साथ  डॉ सूर्य भानु सिंह के पूर्वजों की हवेली, उसका इतिहास, उस हवेली के अंदर दबे रहस्य और अनैतिकता को भी सक्षम तरीके से कथानक में पिरोने में सक्षम हुआ है । आदमी के अपने अंदर के खोखलेपनको छुपाने और दूसरों की कमियां ढूंढने, दूसरों की स्त्रियों एवं धन पर निगाह रखने जैसी प्रवृत्तियों को भी यह उपन्यास एक साफगोई के साथ उजागर करता है ।  सेवाराम शास्त्री जैसे यौन रोगों का इलाज करने वाले लोग अपने बहुत करीबी लोगों को भी ठगवाने से बाज नहीं आते और उसमें अपना स्वार्थ सिद्ध कर लेते हैं ।

उपन्यास की भाषा सरल , शैली चटक एवं शब्दावली एक प्रवाह लिए हुए हैं ।  भले ही इसमें प्रांजलता न हो लेकिन इसका चटकपना मनोरंजन करने में सहायक सिद्ध होता है ।  यौन जैसे विषय को भी बार-बार उठाने के बावजूद उपन्यासकार अश्लील साहित्य को नकारने के रूप में चवन्नी लाल की पुस्तक को प्रतिष्ठित प्रकाशन द्वारा वापस कर देने के रूप में सामने लाता है ।  हां, एक जगह लेखक स्वयं भी अश्लील शब्द प्रयुक्त कर बैठा है ।  हो सकता है उसके मन में उपन्यास को चर्चित करवाने का एक तरीका हो लेकिन ऐसे शब्द की इस उपन्यास में कतई जरूरत नहीं थी क्योंकि उपन्यास अपने आप में सक्षम है । एक बार उपन्यास पढ़ना शुरू करने के बाद यदि आपके पास समय है तो आप इसे पूरा करे बगैर शायद न उठें ।  कहानी के तार अच्छे से आपस में जुड़े हुए हैं इसीलिए ताना-बाना सुदृढ़ है ।  कीमत भी ज्यादा नहीं है इसलिए आसानी से खरीदा जा सकता है।

समीक्षक वरिष्ठ साहित्यकार हैं

नोट : लेख में लेखक द्वारा व्यक्त विचारों से मातृभूमि समाचार का सहमत होना आवश्यक नहीं है।

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