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ये किसान पंचायत थी या राजनीतिक रैली

— सारांश कनौजिया

उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर में किसान नेता राकेश टिकैत ने एक सभा का आयोजन किया। इसे नाम किसान पंचायत का दिया गया। भीड़ अच्छी दिखे, इसके लिये अन्य प्रदेशों से भी किसान नेताओं के समर्थकों को बुलाया गया। राकेश टिकैत को उम्मीद थी कि योगी सरकार की पुलिस इस आयोजन को रोकने का प्रयास करेगी क्योंकि उत्तर प्रदेश में चुनाव अगले ही साल हैं। राकेश टिकैत बार-बार चेतावनी दे रहे थे कि यदि किसानों को रोका गया, तो वो बैरिकेडिंग तोड़ देंगे। शायद उनका इशारा 15 अगस्त की घटना की ओर था, जहां उपद्रवियों ने किसान ट्रैक्टर रैली निकालने के नाम पर देश की राजधानी में जमकर हिंसा की, जिसमें कई पुलिस वाले गंभीर रुप से घायल हुये थे। संभव है कि राकेश टिकैत चाहते थे कि यदि टकराव हुआ, तो उनकी रैली की चर्चा अधिक होगी।

किंतु ऐसा हो न सका। इसलिये उन्होंने रैली में देश के किसानों से अधिक प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की चर्चा की। दोनों की जमकर आलोचना की। टिकैत ने भाजपा को उत्तर प्रदेश में पश्चिम बंगाल की तरह सबक सिखाने की चेतावनी भी दी। किसानों से अधिक इस पंचायत में उत्तर प्रदेश के प्रस्तावित चुनावों में भाजपा को हराने के लिये एकजुट होने पर अधिक ध्यान दिया गया। यदि सिर्फ भाषणों को सुने, तो ऐसा लगेगा जैसे यह किसी विपक्षी दल की राजनीतिक रैली हो, जिसमें किसानों की समस्याएं भी एक मुद्दा है। राकेश टिकैत एक बार फिर चुनाव न लड़ने की बात कह रहे हैं। लेकिन इसके पीछे की वजह वो नहीं है, जो उनके द्वारा बतायी जा रही है।

राकेश टिकैत दो बार चुनाव लड़कर अपनी जमानत जब्त करा चुके हैं। किसान आंदोलन के नाम पर राजनीति कर वो अपने आप को राष्ट्रीय स्तर का नेता मानने लगे हैं, अब अगर इस बार जमानत जब्त हो गयी, तो टिकैत कैसे कहेंगे कि उन्हें पूरे देश के किसानों का समर्थन हासिल है। हां, यह जरुर हो सकता है कि यदि उन्हें अपनी जीत का शत-प्रतिशत विश्वास हुआ, तो वो 2024 के लोकसभा चुनाव में उतर सकते हैं। राकेश टिकैत पहले कई बार किसान आंदोलन के 2024 तक चलने की बात कह चुके हैं। मुजफ्फरनगर की उनकी रैली इसी तैयारी की शुरुआत है।

इस महापंचायत को रैली कहने का मेरे पास और भी आधार है। पंजाब की कैप्टन सरकार ने हाल ही में किसान आंदोलन के आगे घुटने टेकते हुये गन्ना का समर्थन मूल्य 50 रुपये बढ़ाया, इसके बाद यह पड़ोसी राज्य से अधिक हो सका। इसकी मांग वहां के किसान लंबे समय से कर रहे थे। लेकिन एक बार भी राकेश टिकैत ने इस मुद्दे को पंजाब में जाकर नहीं उठाया। पंजाब कांग्रेस के अध्यक्ष नवजोत सिंह सिद्धू स्वयं अपनी पार्टी की सरकार के द्वारा किसानों की अनदेखी की पोल खोल चुके हैं। इसके बाद मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह को भी कहना पड़ा था कि जो बचे हुये वादे हैं, उन्हें भी हम जल्दी पूरा कर लेंगे। राकेश टिकैत ने उनकी सरकार के बक्कल उखाड़ने की कभी बात नहीं की, जबकि वो मोदी और योगी सरकार को लगातार चुनौती दे रहे हैं।

इसके अलावा हाल ही में हरियाणा के किसान नेताओं विकल पचार व प्रदीप धनखड़ आदि ने राकेश टिकैत सहित आंदोलनरत संयुक्त किसान मोर्चा के सभी नेताओं पर इस आंदोलन के नाम पर 1200 करोड़ रुपये एकत्रित कर अपनी सुख-सुविधाओं के लिये पैसे खर्च करने का आरोप लगाया था। इन नेताओं का कहना था कि इस पैसे से आंदोलन के दौरान घायल या मृत्यु को प्राप्त हुये किसानों की मदद की जा सकती थी, लेकिन संयुक्त किसान मोर्चा के नेता ऐसा करना ही नहीं चाहते। 1200 करोड़ छोटी राशि नहीं होती।

इससे तो यह संभावना भी लगती है कि इसी कारण आंदोलनरत नेता कोई समझौता नहीं करना चाहते क्योंकि उन्हें डर है कि यदि आंदोलन समाप्त हो गया, तो उन्हें मिलने वाला चंदा आना बंद हो जायेगा, इसलिये इस आंदोलन को कम से कम 2024 तक तो चलाया ही जाये। उपरोक्त बातों से तो ऐसा ही लगता है कि किसानों के नाम पर जो चंदा एकत्रित हुआ है, उसे उत्तर प्रदेश चुनाव तक अपनी राजनीतिक जमीन तैयार करने के लिये इसी प्रकार खर्च किया जाता रहेगा।

लेखक मातृभूमि समाचार के संपादक हैं।

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