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एक निष्पक्ष और स्वस्थ संसार की चाहत में

– डॉ० घनश्याम बादल

हर साल 7 अप्रैल को विश्व स्वास्थ्य दिवस‌ के रूप में मनाया जाता है. इस समय पूरी दुनिया कोरोना वायरस से जूझ रही है ऐसे में इस दिन का महत्व और भी बढ़ जाता है । आज ही के दिन 1948 में विश्व स्वास्थ्य संगठन की स्थापना हुई थी। आइए जानते हैं इस दिन के इतिहास के बारे में और इस दिवस को मनाने के पीछे क्या उद्देश्य है. विश्व स्वास्थ्य संयुक्त राष्ट्र का हिस्सा है जिसका प्रमुख कार्य विश्व में स्वास्थ्य समस्याओं पर नजर रखना और इसके निवारण में मदद करना है. विश्व स्वास्थ्य दिवस मनाने की शुरुआत साल 1950 में हुई थी ।

मनाने का उद्देश्य

विश्व स्वास्थ्य दिवस को मनाने का मुख्य उद्देश्य वैश्विक स्वास्थ्य और उससे जुड़ी समस्याओं पर विचार-विमर्श करना है. पूरे विश्व में समान स्वास्थ्य देखभाल सुविधाओं के बारे में जागरूकता फैलाने व स्वास्थ्य संबंधी अफवाहों और मिथकों को दूर करना  इसका उद्देश्य है। यह दिवस पिछले 71 साल से हर साल लोगों में स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता फैलाने के उद्देश्य से  मनाया जा रहा है।

क्या है स्वास्थ्य ? 

विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार स्वास्थ्य “शारीरिक, मानसिक, मनोवैज्ञानिक अध्यात्मिक और सामाजिक दृष्टी से सही होने की संतुलित जमीन का नाम  है ।  स्वास्थ्य सिर्फ बीमारियों के न होने का नाम नही है।  हमें बहुमुखी स्वास्थ्य के बारें में नई सोच से संबंधित जानकारी अवश्य होनी चाहिए| स्वास्थ्य को मुख्य रूप से शारीरिक , मानसिक , बौद्धिक एवं आध्यात्मिक स्वास्थ्य में बांटा जाता सकता है ।

शारीरिक स्वास्थ्य  –

शारीरिक स्वास्थ्य शरीर कीउस  स्थिति को दर्शाता है जब शरीर के आंतरिक और बाह्य अंग, ऊतक व कोशिकाएं ठीक से काम करते हैं । इसमें शरीर की संरचना, विकास, कार्यप्रणाली और रखरखाव शामिल होता है। जब शरीर के सभी अंग सही तरह से काम करते हैं जैसे सुनाई देना, दौड़ना , चलना, दिखाई देना व अन्य सामान्य गतिविधियां| अच्छे शारीरिक स्वास्थ्य  के मापदंडों में संतुलित आहार की आदतें, सही श्वास का क्रम गहरी नींद । बड़ी आंत की नियमित गतिविधि व संतुलित शारीरिक गतिविधियां नाड़ी स्पंदन, ब्लडप्रेशर , शरीर का वजन व व्यायाम, सहने की क्षमता आदि सब कुछ व्यक्ति के ऊंचाई, आयु व लिंग के लिए सामान्य मानकों के अनुसार होना चाहिए।

शरीर के सभी अंग सामान्य आकार के हों तथा उचित रूप से कार्य कर रहे हों। पाचन शक्ति सामान्य एवं सही हों। बेदाग एवं कोमल सुंदर त्वचा हो।आंख नाक, कान, जिव्हा, आदि ज्ञानेन्द्रियाँ स्वस्थ हो। जिव्हा स्वस्थ एवं दुर्गंध मुक्त हों।दांत साफ सुथरें हो।मोतियों जैसे चमकदार हों।मुंह से दुर्गंध न आती हो।समय पर भूख लगती हो।शारीरिक चेष्टा सम प्रमाण में हो। रीढ़ की हड्डी सीधी हो। चेहर पर कांति ओज तेज हो।चेहर से सकारात्मकता का आभास हो। कर्मेन्द्रियां (हाथ पांव आदि) स्वस्थ हों।मल विसर्जन सम्यक् मात्रा में समयानुसार हो।शरीर की आकार और उंचाई के हिसाब से वजन हो। शारीरिक संगठन सुदृढ़ एवं लचीला हो।

मानसिक स्वास्थ्य  –

मानसिक स्वास्थ्य का अर्थ हमारे भावनात्मक और आध्यात्मिक लचीलेपन से है जो हमें अपने जीवन में पीड़ा आशाहीन और उदासी, दुःख की स्थितियों में जीवित रहने के लिए सक्षम बनाती है। मानसिक स्वास्थ्य हमारी मजबूत इच्छा शक्ति को भी दिखाती है। इसे सदैव अच्छा बनाए रखने के निम्नलिखित कार्य करने चाहिए – प्रसन्नता, शांति व व्यवहार में सच्ची खुशी। खुशी जो रोम रोम में प्रवाहित हो ।भीतर ही भीतर कोई संघर्ष न हो  मन की संतुलित अवस्था। भय क्रोध, इर्ष्या, से दूरी हो। मानसिक तनाव एवं अवसाद न हो। वाणी में संयम और मिठास हो। कुशल व्यवहारी हो। स्वार्थी न हों। संतोषम परम सुखम के भाव को जीवन में स्वीकार करें। अपने लिए तो सभी जीते हैं कभी दूसरों को भी अपने जीवन में सम्मिलित कर जीवन का आनंद लें। मन को बहुत शांति मिलेगी।

बौद्धिक स्वास्थ्य  – 

हमारा बौद्धिक स्वास्थ्य  हमारी रचनात्मकता और निर्णय लेने की क्षमता में सुधार करने में मदद करता है। बौद्धिक रुप से हम जितने मजबूत होते है अन्य क्षेत्रों में हमारी सहभागिता उतनी स्थायी होती है । आलोचना को सहज स्वीकार कर सकने की क्षमता व  विषम परिस्थितियों से व्यथित न होकर सकारात्मक रहना अच्छे स्वास्थ्य की निशानी है । किसी की भी भावात्मक आवश्यकताओं की समझ, सभी प्रकार के व्यवहारों में शिष्ट रहना व दूसरों की आवश्यकताओं को ध्यान में रखना, नए विचारों को सहजता से स्वीकार करना, आत्मनियंत्रण , डर , क्रोध, मोह, ईर्ष्या  या तनाव मुक्त रहना भी अच्छे बौद्धिक स्वास्थ्य को दर्शाता है ।

आध्यात्मिक स्वास्थ्य –

हमारा अच्छा स्वास्थ्य आध्यात्मिक रूप से स्वस्थ हुए बिना खोखला है। जीवन के वास्तविक अर्थ और उद्देश्य की खोज करना हमें आध्यात्मिकता की ओर ले जाता है। अच्छे आध्यात्मिक स्वास्थ्य को प्राप्त करने का कोई निश्चित तरीका नहीं है। श्रीकृष्ण ने अर्जुन को गीता में जीवन का सार आध्यात्मिकता के माध्यम से समझाया -कि जिंदगी को जो न समझे उसका जीना व्यर्थ है। जिंदगी को जो समझे उसके जीने का अर्थ।अर्थहीन जीवन से मुक्ति केवल आध्यात्म से ही संभव है।  ‘सर्वे भवन्तु सुखिनः’  का आचरण हो। वसुधैव कुटुम्बकम की भावना हो तन, मन, एवं धन शुद्वता से परिपूर्ण हो परस्पर सहानुभूति वाला हो। परोपकार एवं लोकल्याण की भावना वाला हो। कहने और करनें में अंतर न हो। प्रतिबद्वता, कर्त्तव्यपालन वाला हो योग एवं प्राणायाम का अभ्यास करनें वाला हो। श्रेष्ठ चरित्रवान व्यक्तित्त्व हो। इन्द्रियों को संयम में रखने वाला हो।सकारात्मक जीवन शैली के महत्व को समझने वाला हो ।

सामाजिक स्वास्थ्य – 

हम सामाजिक प्राणी हैं। अतः संतोषजनक, संतुलित रिश्ते को बनाना और उसे बनाए रखना हमें स्वाभाविक रूप से आता है। सामाजिक रूप से सबके द्वारा आत्मसात करना हमारे भावनात्मक खुशहाली में वृद्धि का कारक है।  व्यक्ति एक सामाजिक प्राणी है और उसे अपने शारीरिक स्वास्थ्य के साथ साथ मानसिक स्वास्थ्य का भी ध्यान रखना चाहिए ,और अपने व्यवहार से समाज में अपनी प्रतिष्ठा एवं मान सम्मान को बनाए रखने की जिम्मेदारी भी व्यक्ति की स्वयं होती है । एक व्यवहार कुशल व्यक्ति सामाजिक स्वास्थ्य के प्रति भी अच्छी भूमिका व जिम्मेदारी बख़ूबी निभाना जानता है ।

पिछली बार बार वर्ल्ड हेल्थ डे  की  थीम थी- ‘एवरीवन, एवरीवेयर’. जिसका मतलब था, सभी वर्ग के लोगों को बिना किसी वित्तीय कठिनाई के बेहतर स्वास्थ्य सेवा मिले. तब नर्सों के योगदान को थीम इसलिए रखा गया था क्योंकि, कोरोना वायरस की इस संकट की घड़ी  में डॉक्टरों और नर्सों ने अपना बहुत बड़ा योगदान दिया था। वर्ष 20 21 के लिए थीम है ‘बिल्डिंग फेयरर एंड हेल्दीयर  वर्ल्ड ‘ जिसे हिंदी में हम ‘एक निष्पक्ष एवं स्वस्थ विश्व का निर्माण कह सकते हैं।’ जिस प्रकार से दुनिया भर के देशों में कोरोनावायरस की कहीं दूसरी कहीं तीसरी तो कहीं चौथी वेव आई है उसको देखते हुए यह एक सार्थक थीम की जा सकती है क्योंकि इस संक्रमण काल में वैक्सीन का निष्पक्ष तरीके से वितरण किया जाना एवं दुनिया भर के लोगों को बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएं प्रदान करना समय की मांग है।

लेखक वरिष्ठ साहित्यकार हैं.

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