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नवजात शिशु के शुभ व अशुभ योग, भाग-1 : जानें निशुल्क समाधान

– श्याम जी शुक्ल

ज्योतिषाचार्य व वास्तु विशेषज्ञ

मो० : +91-8808797111

पायल’ विचारः- जातक के जन्म के समय यदि चंद्रमा लग्न में हो अथवा लग्न से छठे या ग्यारहवें भाव में हो तो बालक का जन्म ‘स्वर्ण-पाद’ (सोने का पायला) में कहना चाहिए। यदि दूसरे, पांचवें अथवा नवें भाव में हो तो ‘रजत-पाद’ (चांदी का पायला) में, तीसरे, सातवें अथवा दशम भाव में हो तो ‘ताम्र-पाद’ (तावें का पायला) में और यदि चैथे, आठवें अथवा बारहवें भाव में हो तो ‘लौह-पाद’ (लोहे का पायला) में हुआ कहना चाहिए।

टिप्पणी – चारों पाद क्रमशः एक दूसरे से न्यून शुभ होते हैं। लौह पाद को कष्टप्रद माना गया है। मातृ-सुख विचार-यदि मंगल-शनि एक ही राशि में बैठे हों और उससे प्रथम पंचम अथवा सप्तम भाव में चंद्रमा हो तो बालक को जन्म देने के बाद माता उसे त्याग देती है परंतु यदि चंद्रमा या गुरु की दृष्टि हो तो वह त्यागार हुआ बालक दीर्घायु एवं सुखी रहता है। (श्री तुलसीदास जी की 120 वर्ष आयु) यदि शनि सूर्य से दृष्ट चंद्रमा लग्न में हो तथा उसके सप्तम, भाव में मंगल हो तो माता द्वारा परित्यक्त बालक मर जाता है। यदि पाप – दृष्ट चंद्रमा एक ही राशि गत शनि-मंगल से ग्यारहवें भाव में हो तो भी यही फल होता है। यदि किसी शुभ-ग्रह की दृष्टि चंद्रमा पर हो तो वह शुभ-ग्रह जिस वर्ण का स्वामी हो, उसी वर्ण के पुरुष अथवा स्त्री के हाथ में परित्यक्त बालक पहुँचता है। यदि चंद्रमा पाप-ग्रह से दृष्टि हो और उस पर गुरु की दृष्टि न हो तो किसी अन्य के हाथ में जा पहुँचने पर भी उस बालक की मृत्यु हो जताी है।

पितृ-नाश योग: – 1. यदि लग्न से दशम भाव में मंगल अपने शत्रु ग्रह की राशि में बैठा हो अथवा 2. जन्म लग्न में शनि, छठे भाव में चंद्रमा तथा सातवें भाव में मंगल हो तो पिता की शीघ्र मृत्यु होती है। यदि लग्न में गुरु एवं द्वितीय भाव में शनि, सूर्य, मंगल एवं बुध हो तो जातक के विवाह के समय उसके पिता की मृत्यु हो जाती है।

बन्धु-नाश योग: – यदि जन्म लग्न से तृतीय भाव में सूर्य हो तो जातक के बड़े भाई की मृत्यु होती है, शनि हो तो छोटे भाई की मृत्यु होती है और यदि मंगल हो तो सभी भाइयों की मृत्यु हो जाती है।

अशुभ-योग: – यदि छठे भाव में मंगल अथवा सप्तम भाव में राहु या अष्टम भाव में शनि हो तो ऐसे पुरुष की पत्नी जीवित नहीं रहती है (यदि स्त्री की जन्मकुण्डली में ऐसा योग हो तो उसका पति जीवित नहीं रहता) अथवा विशेष कष्ट होता है।

मातृ-पितृ नाशक योग: – यदि जन्म लग्न से छठे तथा बारहवें भाव में पाप-ग्रह हो तो जातक की माता के कष्ट होता है। चतुर्थ स्थान में पाप-ग्रह हो तो माता को एवं दशम स्थान में पाप-ग्रह हो तो पिता का अरिष्ट होता है।

प्रकीर्ण विषय: – सूर्य से नवें स्थान से पिता के बारे में, चंद्रमा से चैथे स्थान से माता के बारे में, मंगल से तीसरे स्थान से भाई के बारे में तथा बुध से तीसरे स्थान में मामा के संबंध में देखना चाहिए।

परमायु योग: – यदि पंचम भाव में चंद्रमा, त्रिकोण से बृहस्पति और दशम भाव में मंगल हो तो परमाणु (लम्बी आयु) का लाभ होता है।

मूक-योग: – यदि शुक्र तृतीय भाव में हो, बृहस्पति सिंह अथवा मेष राशि में हो तथा सूर्य और मंगल दशम भाव में हो तो जातक गूँगा होता है।

कुल-दीपक योग: – जिसके लग्न में शुक्र या बुध हो, केंद्र में बृहस्पति हो तथा दशम भाव में मंगल हो वह बालक कुलदीपक होता है।

पराश्रित योग: – यदि लग्न में शुक्र या बुध न हो, केंद्र में बृहस्पति न हो तथा दशम भाव में मंगल न हो तो ऐसा बालक कुछ नहीं कर पाता अर्थात् पराश्रित ही रहता है।

दृष्टि-ग्रह प्रभाव परिहार: – यदि जन्मकुुण्डली में गुरु लग्न अथवा केंद्र (4, 7, 10 वें भाव) में हों अथवा नवम या पंचम भाव में हों अथवा इन भावों पर शुभ-ग्रहों की दृष्टि हो तो फिर शेष खराब-ग्रह कुछ भी नहीं कर सकते अर्थात् त्रिकोणस्थ बृहस्पति सभी दोषों को दूर कर पाते है।

नेत्र-पाश योग: – बारहवें भाव में मंगल हो तो बायें नेत्र का नाश होता है और सूर्य अथवा राहु हो तो दाँई आंख नष्ट होती है।

म्लेच्छ योग: – यदि किसी बालक का जन्म सिंह लग्न में हुआ हो तो तथा सप्तम भाव में शनि बैठा हो ता ेवह ‘म्लेच्छ’ हो जता है।

षडंगुलि योग: – दशम भाव में बुध और गुरु एवं लग्न, चतुर्थ, सप्तम अथवा दशम भाव में सूर्य और मंगल अथवा ग्यारहवें स्थान में पाप-ग्रह हो तो जातक के हाथ में 6 अँगुलियाँ होती है।

अरिष्ट योग: – यदि सूर्य, राहु, मंगल और शनि अथवा लग्न अथवा पंचम भाव में हो तो कष्टदायक सिद्ध होते हैं। शनि, सूर्य पिता को, राहु माता को, मंगल भाई को तथा शनि बालक को कष्ट देता है।

          यदि मंगल के घर में बृहस्पति हो तथा चंद्रमा छठे, आठवें भाव मं हो तो बालक को आठवें वर्ष कष्ट होता है।

          यदि राहु दशम भाव में अथवा लग्न में हो तो 16 वर्ष में अरिष्ट होता है।

          यदि जन्म लग्न में मंगल अथवा अष्टम भाव में बृहस्पति हो तो जातक की अरिष्ट होता है। क्रूर-ग्रह लग्न में हो तथा क्रूर-ग्रह ही चतुर्थ अथवा दशम भाव में हो तो बालक कष्ट से ही जीवित रहता है। शनि के घर में सूर्य और सूर्य के घर में शनि हो तो आयु के 12वें वर्ष में अरिष्ट होता है। यदि जन्म कुण्डली के दशम भाव में राहु हो तो माता-पिता को कष्ट होता है तथा जातक को स्वयं 12 वें वर्ष में अरिष्ट होता है। यदि जन्म कुण्डली के दशम भाव में राहु हो तो माता-पिता को कष्ट होता है तथा जातक को स्वयं 12वें वर्ष मृत्यु-तुल्य-अरिष्ट होता है।

अल्पायु योग: – यदि जन्मकुण्डली में राहु छठे, आठवें अथवा प्रथम भाव में बैठा हो तो बालक की मृत्यु आयु के चैथे वर्ष में हो ताजी है।

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जानिए क्या आपका घर आय की दृष्टि से आपके लिए शुभ है या अशुभ

नया घर बांधने या नया फ्लैट लेने से पहले यह जान लेना नितांत जरुरी है कि वह घर आपके लिए उन्नतिकारक होगा या नहीं। इस हेतु घर की ‘आय व व्यय’ की गणना की जाती है। आय की गणना: घर का क्षेत्रफल निकालें। इस क्षेत्रफल को 8 से भाग दें। जो संख्या बाकी रहे उसे ‘आय’ समझना चाहिए। यदि बाकी रहे संख्या 1, 3, 5, 7 है तो घर आपके लिए सुख समृद्धि लाएगा, मगर 0, 2, 4, 6, 8 हो तो घर अशुभ या धन की कमी करने वाला हो सकता है। ऐसे में घर ‘बिल्ट अप एरिया’ में परिवर्तन करके शुभ आय स्थापित की जा सकती है। व्यय की गणना: घर के क्षेत्रफल को 8 से गुणा करके 27 से भाग दें। यह संख्या घर का गृह नक्षत्र बताएगी। इस संख्या को 8 से भाग देने पर शेष संख्या ‘व्यय’ कहलाएगी। यदि ‘आय’ की संख्या व्यय से अधिक है, तो घर शुभ माना जाए, यदि आय-व्यय बराबर हों तो आय-व्यय से कम हो तो वह घर कदापि आपको उन्नति नहीं देगा। ऐसे घर में परिवर्तन करना नितांत आवश्यक होता है।

उदाहरण: एक घर का क्षेत्रफल 1100 वर्गफिट है। इसकी आय की गणना निम्नानुसार करेंगे।

1100 भाग 8 शेष 4

4 सम आय है जो अशुभ है।

व्यय की गणना: क्षेत्रफल – 1100 वर्गफिट

1100 गुणा 8 – 8800

8800 भाग 27

शेष – 25

यहां आय-व्यय को देखें तो व्यय-आय से अधिक है। अतः घर धन व समृद्धिदायक नहीं रहेगा। घर बनाने से पहले इन सारी बातों का विचार करना आवश्यक है ताकि नया घर आपके जीवन में खुशियां ला सके। ज्योतिष, वास्तु, जन्मकुंडली, परामर्श तथा फलित एवं घर, दुकान, फैक्ट्री, प्लाट के वास्तु दोष निवारण के लिए उपरोक्त मोबाइल नंबर पर संपर्क कर सकते हैं। आप इस हेतु मातृभूमि समाचार को भी  [email protected] पर ईमेल कर सकते हैं।

जानिए वास्तु दोष और उसका निराकरण

फेंग-शुई शास्त्र में सब कुछ ‘‘ची’’ अर्थात् सकारात्मक ऊर्जा पर आधारित है। आपकी उन्नति या अवनति में जहां भाग्य व कर्म का हाथ होता है। वहीं वास्तु के शास्त्र को नकारा नहीं जा सकता है। लेकिन जहां ईश्वर द्वारा मिले भाग्य को बदलना हाथ में नहीं है लेकिन कर्म द्वारा संवारा जा सकता है, उसी प्रकार जिस घर, व्यवसाय, फैक्ट्री में पहले सुख, शांति एवं समृद्धि थी। वहां पर वास्तुदोष बताकर तोड़फोड़ करना उचित नहीं है। केवल उपस्थित दोष के निवारण के लिये साधारण से उपाय अपनाकर इन दोषों को दूर किया जा सकता है।

वास्तुशास्त्र में पूर्व दिशा वंश वृद्धि, पश्चिम दिशा सफलता कीर्ति एवं ऐश्वर्य, उत्तर दिशा माता के लिये, दक्षिण दिशा धन धान्य समृद्धि प्रसन्नता, ईशानकोण ईश्वर से जुड़ाव, ईश्वर कृपा, वायव्य कोण मित्रता एवं शत्रुता, आग्नेय कोण क्रोध, अग्नि, रसोईघर नैऋत्यकोण आचार-विचार का कारक है।

  1. छरवाजे के ठीक सामने एवं प्रवेश द्वार की ओर पैर करके कभी नहीं सोना चाहिये।
  2. दर्पण में डाइनिंग टेबल का प्रतिबिम्ब दिखना चाहिये।
  3. रेगिस्तानी काँटेदार कटिदार वृक्ष होने पर घर के लोगों को रक्तचाप, हृदयविकार रहता है।
  4. बिना जरुरत वाली वस्तुएं घर में नहीं रखनी चाहिये।
  5. मंगलकारी एवं शुभचिन्हों स्वास्तिक, ॐ, त्रिशूल, का सही विधि से प्रयोग करें।
  6. घर में हंसते हुये बुद्ध की मूर्ति समुचित दिशा में लगाये।
  7. ऊपरी मंजिल वाला फ्लैट न लें, यदि ले लिया है तो वास्तु सुधार करवायें।
  8. सपरिवार प्रसन्नचित मुद्रा वाला चित्र सही दिशा में लगवायें।
  9. समृद्धिदायक स्फटिक गोले को शुद्ध करके सही दिशा में स्थापित करें।
  10. मछलीघर को शयनकक्ष में न रखें। किसी योग्य विद्वान से मछलीघर की दिशा पूछ लें।
  11. दोपहर के बाद की सूर्य की किरणें रोकने के लिये उपाय करें।
  12. अपने सिर को उत्तर की ओर और पैरों को दक्षिण की ओर करके न सोयें।
  13. यदि आपकी कुण्डली में बृहस्पति खराब है। तो आपके निवास का उत्तर, उत्तर पूर्व कोना दूषित होगा। अतः वास्तु के साथ-साथ अपनी कुण्डली का भी किसी योग्य विद्वान से विश्लेषण करवाना चाहिये।
  14. व्यवसायिक स्थल में मुखिया का चित्र दक्षिण दिशा में लगाना चाहिये, कंपनी व उत्पाद का नाम लाल रंग के अक्षरों में दक्षिण क्षेत्र में लगाना चाहिये।
  15. अपने मोबाइल को अग्निकोण या ईशानकोण या पूर्व में रखना चाहिये।
  16. लक्ष्मी प्राप्ति के लिये भाग्यशाली सिक्कों को शुद्ध करवाकर लाल रंग के  धागे में बाँधकर अपने पर्स में रखना चाहिये।
  17. घर में कोई वास्तुदोष होने पर घर के मुख्य द्वार पर शुक्लपक्ष के प्रथम बृहस्पतिवार को श्री विष्णु भगवान् के वास्तु शांति मंत्र से अभिमंत्रित किये चित्र को लगाने से वास्तु दोष दूर होने लगता है।
  18. ऋग्वेद में दिये भगवान कृष्ण के वास्तु दोष नाशक मंत्र का पाठ गृहस्वामी द्वारा महिने में एक बार करने से वास्तुदोष समाप्त हो जाते हैं। मंत्र पूछ लें।

        वास्तु से जुड़ी किसी जानकारी या शंका के समाधान के लिये आप उपरोक्त नंबर पर मुझसे संपर्क कर सकते हैं। आप मातृभूमि समाचार को भी ज्योतिष या वास्तु से जुड़ी किसी समस्या के लिए [email protected] पर ईमेल कर सकते हैं।

मंगली योग : सटीक विश्लेषण

ज्योतिष शास्त्र में शनि, राहु, केतु को पाप ग्रह माना गया है। ये अपनी दष्टि एवं युति द्वारा किसी भी भाव के फल को नष्ट कर सकते हैं। मंगली योग में प्रमुख बात यह मानी गई है कि लग्न, चतुर्थ, सप्तम, अष्टम एवं द्वादश स्थान पर मंगल होने से मंगली योग होता है। किंतु इस योग का प्रभाव एक सा नहीं होता। जब यह योग लग्न से बनता है तो इसका दुष्प्रभाव अपेक्षाकृत कम, चंद्रमा से मंगली होने पर दुष्प्रभाव अधिक तथा शुक्र से मंगली योग बनने पर इसका प्रभाव सर्वाधिक होता है। पाप ग्रहों में मंगल, शनि, सूर्य, राहु एवं केतु उत्तरोत्तर कम पापी माने गये हैं। इसी लिए इन ग्रहों से दुष्प्रभाव में उत्तरोत्तर कमी होती जाती है। स्वराशि, मूल त्रिकोण, उच्चराशि तथा मित्र राशि में स्थित ग्रह भाव के फल की वृद्धि करता है किंतु नीच या शत्रु राशि में स्थित ग्रह भाव के फल को नष्ट करता है।

मंगली दोष युक्त कुण्डली में ही मंगली दोष भंग योग भी पाया जाता है। जिसे अलग-अलग 27 प्रकार की ग्रह स्थितियों से पहचाना जा सकता है। ऐसा होने पर कुण्डली में मंगली दोष नहीं रहता है।

उपरोक्त मंगली दोष भंग योग न होने पर शीघ्राति-शीघ्र मंगली दोष शांति का उपाय कर लेना चाहिए। मंगल शांति का वैदिक, पौराणिक, बीज, सामान्य मंत्र में से कोई एक का सवा लाख जप, दशांश हवन तथा जल में प्रवाहित सामग्री, दान की वस्तुयें, टोटके आदि कई उपाय उपलब्ध हैं। उचित मुहूर्त में इन उपायों को किसी योग्य विद्वान द्वारा संपन्न कराने से मंगली दोष का निवारण होता है तथा दाम्पत्य जीवन सुखमय बनता है। आप इस दोष की मुक्ति के लिये मुझसे भी उपरोक्त मोबाइल नंबर पर संपर्क कर सकते हैं। आप मातृभूमि समाचार को भी ज्योतिष या वास्तु से जुड़ी किसी समस्या के लिए [email protected] पर ईमेल कर सकते हैं।

जानिए पितृदोष की पहचान और निवारण

अपने पूर्वजों के किये पापों का फल जब उसके वंश में किसी एक जातक को भोगना पड़ता है तो उसे पितृदोष कहा जाता है। महाराज दशरथ ने श्रवण को तीर मारने पर श्रवण के माता-पिता के शाप ने दिया, ‘‘जैसे हम पुत्र-वियोग में मर रहे हैं, वैसे आप भी पुत्र वियोग में मरेंगे।’’ महाराज दशरथ पुत्र वियोग में मरे। उनका अपना दोष था, लेकिन राम का तो कोई दोष न था। उन्हें वन के कष्ट सहने पड़े पिता के दोष के कारण।

उपरोक्त पितृदोष के अतिरिक्त स्व-ऋण, मातृ ऋण, स्त्री ऋण, संबंधी ऋण, बहन-बेटी का ऋण, निर्दयी ऋण, अज्ञात का ऋण, दैवी ऋण आदि दोष पाये जाते है। जिनकी पहचान और निवारण करने हेतु विभिन्न ग्रहों के अलग-अगल प्रकार के उपाय किये जाते हैं। इन सभी दोषों के उपायों के विषय में जानने के लिये आप +91-8808797111 पर अपनी कुंडली व्हाट्स एप कर सकते हैं।

श्री बद्रीनाथ के पास स्थित बृऽमहकपाल में दिवंगत के तर्पण का विधान है। स्कन्द पुराण के अनुसार यह स्थान गया से 8 गुना अधिक पुण्यदायक है। पितृदोष निवारण हेतु आप मुझसे उपरोक्त मोबाइल नंबर पर तर्पण के लिए भी संपर्क कर सकते हैं।

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One comment

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