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अफगानिस्तान में फिर विफल रहा दंतहीन संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद

– सारांश कनौजिया

संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की स्थापना विश्व युद्ध के बाद शांति स्थापित करने के उद्देश्य से हुई थी, किंतु यह संगठन अधिकांश बड़े मामलों में बयानबहादुर ही बनकर रह गया। सुरक्षा परिषद ने ऐसा कुछ भी नहीं किया, जिससे यह माना जा सके कि इस संगठन ने प्रभुत्व वाले देशों से अलग अपनी पहचान बनायी और विश्व में सार्थक पहल की। अफगानिस्तान में यह तीसरी बार है, जब सुरक्षा परिषद पूरी तरह से विफल रहा है।

एक समय था, जब सोवियत संघ (रुस) ने अफगानिस्तान पर शासन करने का प्रयास किया। अमेरिका ने इसके विरोध में तालिबान को खड़ा किया और सोवियत संघ को चुनौती देने का प्रयास किया। यद्यपि तालिबान में शामिल पस्तूनों का एक समूह पाकिस्तान से भी संबंध रखता है। वह दौर 1990 के लगभग का था। जब सोवियत संघ की सेनाओं को अफगानिस्तान से कुछ विशेष नहीं हासिल हो सका और वो वापस जाने का मन बना चुकी थीं। रुस अपनी मर्जी से अफगानिस्तान में आया था और अपनी इच्छानुसार ही वापस गया। उस समय भी संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद ने कोई ऐसी कार्रवाई नहीं की, जिससे यह लगे की वो रुस को अफगानिस्तान में अपनी सेनाएं भेजकर अतिक्रमण करने से रोकना चाहता है।

रुस के जाने के बाद तालिबान और ताकतवर होने लगा। एक समय ऐसा आया, जब अमेरिका के सहयोग से बना तालिबान उसी के लिये मुसीबत बन गया। अमेरिका ने ओसामा बिन लादेन और तालिबान को सबक सिखाने के लिये अफगानिस्तान पर धावा बोल दिया। उसकी सेनाएं अफगानिस्तान में स्थिरता बनाये रखने के नाम पर लगभग 20 वर्षों तक रहीं। जबकि विश्व में शांति के लिये तो संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद नाम का संगठन बनाया गया था। यह काम अमेरिका का नहीं सुरक्षा परिषद का था। संयुक्त राष्ट्र के पास इसके लिये अपनी स्वयं की शांति सेना भी है, जिसमें भारत सहित विभिन्न देशों के सैनिक शामिल हैं। इस शांति सेना ने उन देशों में स्थिरता के लिये प्रयास भी किया है, जहां अस्थिरता के लिये अमेरिका, रुस या चीन जैसा कोई बड़ा देश जिम्मेदार नहीं है।

इस बार अमेरिका को युद्ध में बड़ा नुकसान उठाना पड़ा। उसके हजारों सैनिक तालिबानियों ने मार दिये या गंभीर रुप से घायल कर दिये। अमेरिका ने अरबों रुपये खर्च किये, लेकिन रुस की ही तरह अमेरिका को भी अफगानिस्तान छोड़ने का निर्णय लेना पड़ा। इस बार भी अमेरिकी सेना की वापसी सुनिश्चित करने के लिये सुरक्षा परिषद ने कुछ नहीं किया था। यह अमेरिका के राष्ट्रपति जो बाइडेन का निर्णय था। जब भी कोई बड़ा देश कुछ गड़बड़ करता है, तो उससे किसी न किसी देश में अस्थिरता उत्पन्न होती है। संयुक्त राष्ट्र सिर्फ इस अस्थिरता पर अपनी चिंता व्यक्त कर अपना कार्य पूरा क्यों मान लेता है? क्या इतने से काम के लिये ही संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद जैसे संगठनों को बनाया गया था?

अमेरिका के जाने के बाद अब अफगानिस्तान पर एक बार फिर तालिबान का सैन्य कब्जा है। पिछले तालिबान और इस तालिबान में सिर्फ इतना अंतर है कि इस बार वो कहता कुछ है और करता कुछ। तालिबान स्वयं को अच्छा दिखाने का असफल प्रयास कर रहा है। हिंसा और अत्याचार के लिये तालिबान को चीन और पाकिस्तान का समर्थन हासिल है। तालिबान का समर्थन करते हुये पाकिस्तानी सेना ने पंजशीर में भी भारी तबाही मचायी है। पाकिस्तान की इस कार्रवाई की मुस्लिम राष्ट्र ईरान ने भी निंदा की है, उसने इसे अफगास्तिान के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप माना है, लेकिन ऐसे समय संयुक्त राष्ट्र कहां है, सुरक्षा परिषद चीन के समर्थन से पाकिस्तान के द्वारा किये गये इस कार्य के खिलाफ खड़ा क्यों नहीं हो रहा? वह अफगानिस्तान की जनता को इस प्रकार प्रताड़ित होते हुये कैसे छोड़ सकता है?

वास्तव में 1945 में द्वितीय विश्व युद्ध के बाद संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद का गठन तो विश्व में शांति के लिये हुआ था, लेकिन इसके स्थायी सदस्यों की संख्या को सीमित करके इसे कभी विश्व का संगठन बनने ही नहीं दिया गया। संयुक्त राष्ट्र और इसकी सुरक्षा परिषद सिर्फ कुछ देशों की राजनीतिक महत्वकांक्षाओं को पूरा करने का माध्यम मात्र बनकर रह गयी। यही कारण है कि अफगानिस्तान के बारे में यह संगठन निंदा प्रस्ताव पारित कर सकता है, अपनी चिंता व्यक्त कर सकता है, लेकिन दंतहीन होने के कारण इस चिंता को दूर करने के लिये कुछ भी विशेष नहीं कर सकता है, जब तक की ताकतवर देश ऐसा कुछ करना न चाहें।

लेखक मातृभूमि समाचार के संपादक हैं।

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