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पुस्तक समीक्षा : संभावना जगाता सार्थक काव्य संकलन ‘सृजन सरोवर’

 

कृति  ‘सृजन सरोवर

प्रधान संपादक: सुरेंद्र कुमार सैनी

 प्रकाशक : नवसृजन साहित्यिक संस्था रुड़की

पृष्ठ संख्या: 286

मूल्य :  ₹200

 

डॉ० घनश्याम बादल

कोरोना काल में शिथिल पड़ी साहित्यिक गतिविधियाों को रुड़की जैसे छोटे से शहर से एक गति मिली है वहां के ४३स्थानीय कवियों के काव्य संकलन ‘सृजन सरोवर’ से । 286 पृष्ठों की इस हार्ड बाउंड पुस्तक में प्रत्येक कवि की पांच – पांच कविताएं सम्मिलित की गई हैं साथ ही हर कवि का संक्षिप्त जीवन वृत्त, श्वेत श्याम  छाया चित्र के साथ दिया गया है । ‘नवसृजन साहित्यिक संस्था’ द्वारा प्रकाशित इस पुस्तक के संपादन का कार्य प्रधान संपादक सुरेंद्र कुमार सैनी के साथ सुबोध कुमार पुंडीर ‘सरित्’, नीरज नैथानी, नवीन शरण निश्चल,  एवं पंकज त्यागी ‘असीम’ ने संभाला है। पुस्तक  में प्रकाशन सहयोगियों  का छाया चित्रों के साथ धन्यवाद दर्शाता है कि इस पुस्तक के प्रकाशन हेतु संपादक मंडल को आर्थिक संसाधन जुटाने के लिए काफी श्रम करना पड़ा है ।

‘सृजन सरोवर’ का एकमात्र उद्देश्य रुड़की के रचनाकारों को उनकी रचना धर्मिता के लिए सम्मानित करना एवं उनकी रचनाओं को आम पाठक तक पहुंचाना है तो साफ-सुथरे मुद्रण व शीर्षक को सार्थक करते आवरण तथा इसमें सम्मिलित रचनाओं के स्तर की कसौटी पर यह एक सफल प्रयास है । संकलन में केंद्रीय शिक्षा मंत्री एवं साहित्यकार डॉ रमेश पोखरियाल निशंक की शुभकामनाएं एवं उनकी पांच कविताओं को भी शामिल किया गया है । डॉ० योगेंद्र नाथ शर्मा ‘अरुण,बेचैन कंडियाल, नीरज नैथानी, नरेश राजवंशी, कृष्ण ‘सुकुमार’ अनीस उल हसन जैदी , हरि प्रकाश ‘खामोश’, राम शंकर सिंह, सौ सिंह सैनी, सुमंत सिंह आर्य जैसे प्रौढ़ रचनाकारों के साथ इस काव्य संग्रह में पंकज त्यागी ‘असीम’ , किसलय क्रांतिकारी, के पी ‘अनमोल’ राजकुमार उपाध्याय, विनीत भारद्वाज जैसे युवा साहित्यकारों को भी इस में जगह मिली है । महिला रचनाकारों में डॉ० मधुराका सक्सेना, डॉ० शालिनी जोशी पंत, अनुराधा शर्मा, अनुपमा गुप्ता,  संध्या चतुर्वेदी आदि भी इसमें शामिल हैं।

 डॉ० श्रीगोपाल नारसन ने रुड़की के काव्य इतिहास एवं वर्तमान का रोचक अंदाज में परिचय करवाया है । पुस्तक में समकालीन रचनाकारों के साथ-साथ रुड़की के दिवंगत कवियों में जगदीश शरण, हरि प्रकाश हरियाणवी, कृष्ण लाल प्रेमी, रतिराम वर्षवाल एवं इरशाद सेवक की रचनाएं भी श्रद्धांजलि के रूप में दी गई हैं । यदि एक नजर पुस्तक में शामिल की गई कविताओं पर डालें तो उनमें वैविध्य दिखाई देता है । डॉ निशंक धरातल से जुड़ी हुई समसामयिक पंक्तियों में कहते हैं”मिट्टी पानी और हवा, इन तीनों की वृक्ष दवा, वृक्ष कटे तो खेत कटेंगे, हरे भरे खलियान बंटेंगें “डॉ० ‘अरुण’ सीख देते हुए कहते हैं “छल छद्म करेंगे हम जितने, उतना ही मैला मन होगा,बस, सहज सरल जितने होंगे, उतना सुंदर जीवन होगा’ “बेचैन कंडियाल की पंक्तियां जिंदो से नहीं मुर्दों से पूछिए, क्या तुम भी एहसास करते हो” संवेदना जगाती हैं , नीरज कुमार नैथानी पहाड़ों के प्रति अपने लगाव को व्यक्त करते हुए कहते हैं “पहाड़ गुस्से में, नदियां बेकाबू, दरकी चट्टानें, ध्वस्त ठिकाने,”

स्थापित ग़ज़ल कार कृष्ण सुकुमार की गजलों में परिपक्वता भी है और दर्शन भी । उनकी ग़ज़लें लुभाती बिना शोर किए असर करने वाली हैं । उनका एक शेर देखिए “खामोशी सैलाब कभी बन जाती है, लहरें पक्की दीवारें ढा जाती हैं ” सुबोध पुंडीर सरित्  की कविताओं में “ऐसे द्वार नहीं जाते हम” एक जीवन दर्शन को तो प्रकट करती हैं।  प्रधान संपादक सुरेंद्र कुमार सैनी की ग़ज़ल “इस सदी में पंछियों की बात मत करना, चहचहाते घोंसलों की बात मत करना, क्या मिलेगा जख्म उनके छेड़कर तुमको, पर्वतों से निर्झरों की बात मत करना” पर्यावरण के प्रति चेतना जगाती है ।  अनीस उल हसन जैदी की गजलें अपने शिल्प एवं कथ्य  दोनों से आकर्षित करती हैं । उनका कहना है ” पेड़ लगा ले आंगन में, लेकिन फल की बात न कर, जेहन में अपने ‘घर ‘को रख, ताजमहल की बात न कर”   । डॉ० आनंद भारद्वाज कविता ‘मां’संवेदना जगाती है तो पंकज त्यागी असीम की गजलें भी कम संवेदनशील नहीं हैं। मनोज पांडे होश में परिपक्वता भी है एवं दर्शन भी । वें जागरुक करते हुए  कहते हैं, “निजामत पर नजर रखनी है हमको,सवाल अपनी, तुम्हारी ख़ैर का है “।

डॉ घनश्याम बादल की बाल कविताएं रोचक बन पड़ी हैं , उनकी कविता “नानी छोड़ो बात पुरानी” बच्चों को कविताओं के माध्यम से विज्ञान सिखाती है तो बाल गीत “टपर -टपर  टप टप्पर टूं, अंडा फूटा मुर्गी रोई   “टपर -टपर  टप टप्पर टूं” गुदगुदाने वाला है। अलका घनशाला की कविताएं ‘औरत, ‘यह लड़की’ और ‘खुशबू वाले ख़त’ उनकी रचना धर्मिता की गहराई को प्रकट करते हैं महावीर वीर के मुक्तक, पंकज गर्ग की गजलें, डॉ० श्रीगोपाल नारसन के  व्यंग्य गहरे असर करते हैं । डॉ० मधुराका सक्सेना व डॉ० शालिनी जोशी पंत की कविताएं स्त्रीवादी कविताएं हैं  । नरेश राजवंशी की ग़ज़ल ” मेरे लिए सच्चाई अजाब बन गई,  मुझको लगेगी फांसी मेरे बयान पर” तथा हरि प्रकाश खामोश की “फूलऔर कांटा” कविता ,सज्जाद झंझट का हास्य व्यंग्य, अनुराधा शर्मा के गीत व  डॉ अनिल शर्मा की ग़ज़लें भी प्रभाव छोड़ती हैं।

डॉ० सम्राट ‘सुधा’ की कविता ‘प्यास देखता हूं’ अंदर तक झकझोरती है, वें लिखते हैं,   ‘मछुवे ने मीन देखी जल में, और मैं प्यास देखता हूं”  , राम शंकर सिंह के गीत, दिनेश कुमार वर्मा डीके के व्यंग्य, अशोक शर्मा आर्य की छोटी-छोटी कविताएं अच्छी बन पड़ी हैं । पुस्तक के छायाचित्र साधारण हैं । शुभकामनाओं एवं प्रकाशन सहयोगियों का आभार एवं उनके चित्र स्थानीयता एवं संसाधनों की सीमाओं की ओर इशारा करते हैं। कुल मिलाकर ‘सृजन सरोवर’ एक पठनीय रुड़की के साहित्य प्रेमियों के लिए संग्रहणीय संकलन बन पड़ा है जिसे रुड़की के काव्य जगत के सफ़र का दस्तावेज कहा जा सकता है। ‌ बेशक ,समय एवं अनुभव के साथ युवा रचनाकार और निखरेंगें ही इस संकलन के माध्यम से उनमें संभावनाएं देखी जा सकती हैं।

समीक्षक वरिष्ठ साहित्यकार हैं.

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