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टोक्यो ओलंपिक : चमकते खेल रत्न और राजनीतिक रुदालियाँ

– डॉ घनश्याम बादल

टोक्यो में चल रहे चल रहे ओलंपिक में 7 अगस्त भारत के लिए एक ऐतिहासिक दिन के रूप में याद किया जाएगा । 7 अगस्त ने 5 अगस्त की चमक से भी ज्यादा जगमगाहट हासिल करके देश को एक तोहफा दिया है । 5 अगस्त को भी 2 पदक भारत की झोली में आए थे एक रजत एवं कांस्य, तो 7 अगस्त को भारत के नीरज चोपड़ा ने जैवलिन थ्रो में 87.56 मीटर रिकॉर्ड भाला फेंक स्वर्ण पदक हथिया लिया ।  वहीं चोट के चलते स्वर्ण पदक की दौड़ से बाहर हुए बजरंग पूनिया ने हर दर्द को एक तरफ रख कर भारत के मस्तक को कांस्य पदक से सजा दिया ।  इन दोनों खिलाड़ियों को पूरे ओलंपिक दल के साथ बहुत-बहुत बधाई । पूरा देश इस ओलंपिक दल पर गर्व कर सकता है।

अब टोक्यो  ओलंपिक धीरे-धीरे अपने अवसान की ओर बढ़ रहा है , कोविड-19 की महामारी के बावजूद जापान ने जिस प्रकार से दर्शक रहित इस आयोजन को किया उसकी जितनी प्रशंसा की जाए कम है ।  हालांकि इस ओलंपिक में कोविड-19 छाया भी पड़ी लेकिन इस काली छाया के बीच विभिन्न देशों के खिलाड़ियों ने जो रोशनी खेल भावना एवं सद्भाव की  वहां बिखेरी है उसकी चमक सारी दुनिया तक पहुंची है । गर्व एवं सौभाग्य का विषय है कि इस ओलंपिक में भारतीय खिलाड़ियों ने भी अपनी चमक से देश को गौरवान्वित किया है अभी तक के ओलंपिक खेलों पर नजर डालें तो भारत का प्रदर्शन कोई बहुत बड़ा या धमाकेदार  नहीं रहा है । 1928 से शुरू हुआ ओलंपिक खेलों में हॉकी से स्वर्ण पदक जीतने का सिलसिला कई ओलंपिक तक लगातार चला ।

फिर धीरे-धीरे हम हॉकी मैं मिलने वाले पदकों एवं गौरव को भी खोते चले गए । इसके कारणों की तह में जाएं तो कारण खेलों की आंतरिक राजनीति के साथ साथ हाकी में हुए अंतरराष्ट्रीय प्रयोग भी हैं । हॉकी कभी दक्षिण एशिया का खेल रहता था, वहां के गरीब देशों के खिलाड़ी नंगे पैरों घास के मैदान पर कलात्मक हॉकी खेलते थे लेकिन जबसे हॉकी में एस्ट्रो टर्फ की शुरुआत हुई एशियाई देश पिछड़ चले गए इसमें भारत भी शामिल था और पाकिस्तान भी । पश्चिमी देश अपने लंबे पासों फिजिकल फिटनेस एवं संसाधनों के बल पर आगे बढ़ते गए और दुनिया ने ऑस्ट्रेलिया,जर्मनी, नीदरलैंड, ,बेल्जियम तथा न्यूजीलैंड जैसे विजेता हॉकी में देखे ।

बेशक हमारे देश में इतने संसाधन नहीं थे लेकिन हमारे खिलाड़ियों में प्रतिभा की कमी नहीं थी । मगर पिछले कुछ ओलंपिक खेलों से भारतीयों ने भी अपनी उपस्थिति दर्ज करानी शुरू की और सारा भारत उस समय झूम उठा जब 2008 के बीजिंग ओलंपिक खेलों में अभिनव बिंद्रा ने निशानेबाजी में स्वर्ण पदक जीता कुंजारानी देवी भारत्तोलन में पदक लाइ, तो पीटी उषा चौथे स्थान पर रही। इससे पूर्व 1980 में हुए मास्को ओलंपिक में भास्कर पिल्लै के नेतृत्व में भारत ने हॉकी में स्वर्ण पदक जीता था।  लेकिन उस स्वर्ण पदक की चमक उतनी खरी नहीं थी जितनी आज के इस कांस्य पदक की चमक है ।

वजह यह है कि उस समय अमेरिका परस्त समस्त पश्चिमी देशों ने ओलंपिक का बहिष्कार किया था और भारत के समक्ष फाइनल में स्पेन जैसी कमजोर टीम की जिसे उसने 3-2 से हराकर स्वर्ण पदक जीता था । अब 41 वर्ष बाद एक बार फिर से दिग्गजों के बीच से हमारी टीम के खिलाड़ी यदि कांस्य पदक लेकर आए हैं तो यह बहुत बड़ी उपलब्धि मानी जानी चाहिए । जहां पुरुषों  ने तीसरा स्थान लेकर वाहवाही पाई एवं गले में पदक पहन कर लौटे वहीं भारतीय बेटियों के गले में पदक भले ही ना हो लेकिन उन्होंने 140 करोड़ भारतीयों के दिल में जगह बनाकर एक ऐसी आस जगाई है जो आने वाले समय में हॉकी के स्वर्णिम भविष्य की ओर संकेत करती है बशर्ते कि हमारे खेल संघों की राजनीति एवं खिलाड़ियों के चयन में होने वाला पक्षपात बीच में बाधा न बने।

टोक्यो ओलंपिक खेलों में पदकों की शुरुआत चानू ने की जिन्होंने भारत्तोलन में गजब की प्रतिभा का प्रदर्शन करते हुए रजत पदक जीता , तो लवलीना ने मुक्केबाजी में कांस्य पदक जीतकर जताया कि मैरी कॉम की हार के ग़म को इस तरह भी दूर किया जा सकता है ।  लवलीना जिस पृष्ठभूमि से आई है एवं जैसे संसाधनों के साथ में वहां तक पहुंची है उसके लिए उसकी जितनी प्रशंसा की जाए कम है। मुक्केबाजी के बाद भारत की सबसे बड़ी आशा कुश्ती थी और कुश्ती के पहलवानों ने निराश भी नहीं किया । ठीक है कुश्ती में स्वर्ण नहीं आ पाया लेकिन रवि दहिया ने जिस दमखम के साथ अपना खेल दिखाया और जिस प्रकार से उन्होंने कजाकिस्तान के पहलवान को चारों खाने चित किया वह नजारा देखने वाला था । रवि दहिया की पृष्ठभूमि भी कोई अमीर खानदान की नहीं है।

इस तरह एक और गुदड़ी का लाल देश के मुकुट में चमकदार रत्न चढ़ने में कामयाब रहा।  हां देश दीपक पुनिया से भी बड़ी उम्मीदें लगाए था मगर दुर्भाग्य से वें पदक नहीं ला पाए मगर जाते-जाते बजरंग पूनिया ने कांस्य पदक जीत कर देश की नाक ऊंची की । बहुत-बहुत बधाई बजरंग एवं रवि दहिया को ।  साथ ही साथ हरियाणा सरकार भी इस मामले में बधाई की पात्र है जिसने तुरंत प्रभाव से दोनों पहलवानों के लिए एक बड़ी राशि इनाम के रूप में तुरंत घोषित की एवं उन्हें सरकारी सेवा में कार्य करने का भी प्रस्ताव दिया खिलाड़ियों को इस प्रकार के प्रस्तावों की बहुत ज्यादा जरूरत होती है । तो हरियाणा सरकार को भी इस ओलंपिक में राज्य सरकारों में एक विशेष स्वर्ण पदक की हकदार माना जा सकता है क्योंकि 7 पदको में से 4 पर हरियाणा के खिलाड़ियों का नाम लिखा है।

जब सारे टीवी चैनल खिलाड़ियों का हौसला अफजाई करने के लिए विशेष कार्यक्रम आयोजित कर रहे थे तब कुछ विपक्षी राजनीतिक दल अलग ही खिचड़ी पका रहे थे। ठीक है, आप राजनीति की दृष्टि से हो सकता है गलत न हों लेकिन घर में जश्न के समय रुदाली बनना किसी भी तरीके से सही नहीं कहा जा सकता है । यह मौका मोदी या केंद्र सरकार की भर्त्सना करने या उससे श्रेय छीन लेने का नहीं है अपितु बड़ा दिल करके उसे बधाई देने का है क्योंकि आजादी के 75 वर्षों में इंदिरा गांधी को छोड़कर शायद ही नरेंद्र मोदी के अलावा किसी दूसरे प्रधानमंत्री ने खिलाड़ियों से इस प्रकार का संवाद स्थापित किया हो । इसके लिए नरेंद्र मोदी खिलाड़ियों के लिए एक आदर्श व प्रेरणा स्रोत बनकर उभरे हैं तो आप भी स्यापा बंद करें ।  बधाई नहीं दे सकते तो न दें,  कम से कम चुप तो रह सकते हैं ।

कांग्रेस की पीड़ा समझी जा सकती है कि खेल रत्न का नाम अब राजीव गांधी के नाम के बजाय हॉकी के जादूगर ध्यानचंद के नाम पर रख दिया गया है मगर इसमें गलत क्या है ?  सर्वेक्षणों में जिस प्रकार से आंकड़े बता रहे हैं कि सैकड़ों पुरस्कारों, संस्थाओं स्टेडियमों पर केवल एक परिवार का नाम है तो यह भी एक चिंतनीय एवं ज्वलंत प्रश्न है कि स्टेडियम या खेलो के पुरस्कार किसके नाम से दिया जाने चाहिए थे । खैर मेरी नजर में तो मोदी सरकार ने लंबे समय से चली आ रही एक भूल को ठीक किया है निश्चित रूप से मेजर ध्यानचंद  खेल रत्न पुरस्कार पर अपना नाम लिखवाने के हर तरह से योग्य हैं ।  मगर एक बड़ा प्रश्न यहां भी खड़ा  होता है कि खेल रत्न पर तो ध्यानचंद का नाम लिखवा दिया मगर भारत रत्न कब ध्यानचंद के नाम लिखा जाएगा ?  यह प्रश्न भी पूछा ही जाना चाहिए और सरकार को कोशिश करनी चाहिए कि आने वाले समय में किसी को यह प्रश्न पूछने का मौका न मिले।

अस्तु इस बार के ओलंपिक भारत के लिए अविस्मरणीय बन गए हैं लेकिन मंजिल अभी बहुत दूर है और आर्थिक तथा राजनीतिक ताकत के साथ साथ खेल जगत की महाशक्ति बनने की ओर भी भारत को कदम बढ़ाने होंगे जिसके लिए कठोर परिश्रम तकनीकी संसाधनों निष्पक्ष चयन तथा खिलाड़ियों को भरपूर प्रोत्साहन दिए जाने की आवश्यकता है।

लेखक वरिष्ठ स्तंभकार हैं

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