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औरंगजेब जैसे आक्रांताओं के द्वारा तोड़े गए मंदिरों को वापस लेने का सही समय

– सारांश कनौजिया

भारत में जो भी आक्रांता बाहर से आया, उसने हिन्दू धार्मिक स्थलों को निशाना बनाया। उन्हें लूटा और तोड़ दिया। इसलिये यह ठीक-ठीक बता पाना संभव नहीं है कि इन आक्रांताओं के द्वारा कितने मंदिर तोड़े गए? इसके बाद भी कुछ मंदिरों को तोड़े जाने के साक्ष्य उपस्थित हैं। यदि इनके बारे में भी पता करने का प्रयास गंभीरतापूर्वक किया जाये, तो इनकी संख्या हजारों में मिलेगी। भारत को स्वतंत्र हुए 7 दशक से भी अधिक का समय हो गया है, इसके बाद भी इन तोड़े गये मंदिरों की ओर किसी का ध्यान क्यों नहीं गया, इसको समझने के लिए हमें कुछ इतिहासकारों के अजीबोगरीब तर्कों को जानना होगा।

औरंगजेब ने अनगिनत हिन्दू मंदिरों को तोड़ा। इनमें से कुछ के साक्ष्य उपस्थित हैं। ऐसा माना जाता है कि 9 अप्रैल को उसने पहली बार हिन्दू मंदिरों को तोड़ने का आदेश दिया था। इसके बाद भी कुछ तथाकथित इतिहासकार औरंगजेब को आक्रांता मानने को तैयार नहीं हैं। उनका कहना है कि औरंगजेब एक बहुत ही उदार व्यक्ति था। उसके शासनकाल में राज्य का कार्य हिन्दी में होता था। उसने मुगलों से ज्यादा हिन्दुओं पर भरोसा कर उन्हें महत्वपूर्ण पदों की जिम्मेदारी दी। वह संगीत को पसंद करता था। यद्यपि ये इतिहासकार भी इस बात से इनकार नहीं कर पाते हैं कि औरंगजेब ने मंदिरों को तुड़वाया, लेकिन इसमें भी उनका एक तर्क है। इन इतिहासकारों के अनुसार औरंगजेब ने जितने मंदिर तुड़वाये, उससे अधिक बनवाये भी। इनमें से यदि कोई इतिहासकार जीवित हो, तो उससे पूंछा जाना चाहिए कि यदि कोई व्यक्ति हिन्दुओं के प्रति उदार है, तो उसे एक भी मंदिर तोड़ने की आवश्यकता क्यों पड़ी? उस समय तो आज की तरह विकास कार्य करवाने के लिये जमीन की कमी भी नहीं थी।

एशियाट लाइब्रेरी, कोलकाता में सुरक्षित औरंगजेब के एक आदेश के अनुसार उसने काशी विश्वनाथ मंदिर को तोड़कर ज्ञानवापी मस्जिद बनाने का आदेश दिया था। इस घटना का विवरण तत्कालीन लेखक साकी मुस्तईद खां की किताब ‘मसीदे आलमगिरी’ में भी मिलता है। ऐसे ही विभिन्न ऐतिहासिक दस्तावेजों के अनुसार 2 सितंबर 1669 को यह कार्य पूरा कर लिया गया था। मंदिर तोड़ने के साथ-साथ औरंगजेब ने हिन्दू ब्राह्मणों का बड़े स्तर पर धर्मांतरण किया। कुछ वर्तमान लेखक इसी आधार पर यह दावा करते हैं कि उत्तर प्रदेश के 90 प्रतिशत से अधिक मुसलमानों के पूर्वज हिन्दू ब्राह्मण थे। इसी प्रकार औरंगजेब ने मथुरा में भगवान कृष्ण की जन्मभूमि, जो एक कारागार था पर कब्जा कर मस्जिद का निर्माण करवा दिया। महाक्षत्रप सौदास के समय के एक शिलालेख के अनुसार इस मस्जिद की जगह पर 80 से 57 ईसा पूर्व वसु नाम के व्यक्ति ने पहला मंदिर बनवाया था। इसके बाद विक्रमादित्य के काल में एक अन्य भव्य मंदिर का निर्माण करवाया गया था। औरंगजेब से पहले 1017-18 में महमूद गजनबी और फिर 16वीं शताब्दी के आरंभ में सिकंदर लोदी ने इन मंदिरों को तोड़ा। महमूद गजनबी और फिर सिकंदर लोदी के द्वारा तोड़े गये मंदिरों का दुबारा निर्माण किसी न किसी हिन्दू शासक ने करवा दिया, किंतु औरंगजेब ने हिन्दू मंदिर को तोड़कर जो मस्जिद बनवायी, वह आज भी आक्रांताओं के अत्याचारों की गवाही दे रही है।

मथुरा के ही मदन मोहन मंदिर को औरंगजेब ने तुड़वा दिया था। इस मंदिर की स्थापना 1590 से 1627 ई. के मध्य मुल्तान के राम दास खत्री ने की थी। कुछ लोगों का मानना है कि औरंगजेब के द्वारा इस कृष्ण मंदिर को तुड़वाने के बाद मूल प्रतिमा को राजस्थान भेज दिया गया था। जो आज भी राजस्थान के करौली में विराजमान है। संभवतः उस समय के कृष्ण भक्तों को लगा होगा कि अत्याचारी औरंगजेब कभी भी दोबारा हमला कर सकता है, इसलिये मूल प्रतिमा की सुरक्षा बहुत जरुरी है। औरंगजेब के द्वारा सोमनाथ मंदिर को पहले 1665 और फिर 1706 ईस्वी में तोड़ा गया। दरअसल जब औरंगजेब ने पहली बार सोमनाथ मंदिर को 1665 में तोड़ा, तो उसे उम्मीद थी कि अब हिन्दू यहां पूजा-पाठ नहीं करेंगे। लेकिन हुआ इसके उलट, हिन्दुओं की आस्था इस धर्म स्थल के प्रति और बढ़ गयी। इसी कारण उसने यहां बहुत कत्लेआम भी किया। यही कारण था कि उसे 1706 में फिर इस मंदिर को तुड़वाना पड़ा।

ऐसा नहीं है कि सिर्फ औरंगजेब ने हिन्दू मंदिरों को लूटने और तोड़ने का काम किया। 7वीं शताब्दी के लगभग से आक्रांताओं द्वारा भारत पर आक्रमण और हिन्दू मंदिरों को तोड़ने का क्रम शुरु हो चुका था। इन मंदिरों को तोड़ने के बाद बड़े स्तर पर धार्मिक निर्माण मुस्लिम शासकों द्वारा किये गए। अयोध्या में किया गया ऐसा ही निर्माण जिसे बाबरी के नाम से जाना जाता था, अब अस्तित्व में नहीं है। मैं किसी हिंसा या दंगे का समर्थन नहीं करता, लेकिन तोड़े गये हिन्दू मंदिरों, जिनके सबूत उपलब्ध हैं, उन्हें कानूनी तरीके से वापस लेकर पुनः मंदिरों का निर्माण किया जाना चाहिए। इसके लिये अयोध्या के बाद अब काशी और मथुरा से अभियान को शुरु करना होगा। बाद में इस आधार पर देश के विभिन्न क्षेत्रों में लम्बा कानूनी संघर्ष करना होगा।

लेखक मातृभूमि समाचार के संपादक हैं।

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