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माँ से बड़ा ना कोय !

– डॉ० घनश्याम बादल

फिल्म दीवार में अमिताभ बच्चन एक दृश्य में शशि कपूर से कहते हैं, “मेरे पास गाड़ी है, बंगला है,  दौलत है । तुम्हारे पास क्या है ?”   तब शशि कपूर बहुत शांत भाव से एक छोटा सा जवाब देते हैं ” मेरे पास मां है”  और पिक्चर हॉल तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठते हैं । भले ही  बोला गया डायलॉग फिल्मी पर है जीवन का अटूट सत्य । जिसके हिस्से में मां का साथ , मां का आशीर्वाद आ जाता है दुनिया की कोई काली छाया उसका कुछ नहीं बिगाड़ पाती यही है मां की महिमा ।

हर बच्चा मां में सबसे बड़ी सुरक्षा ढूंढता है मां के आंचल के साए में उसे खुद को सबसे महफूज महसूस करने का एहसास होता है हालांकि समय के साथ भौतिकता की अंधी दौड़ में मां का हिस्से में आना भी कई बार अजीब सा एहसास कराता है शायर मुनव्वर राणा अपने एक शेर में जब कहते हैं -” किसी के हिस्से  मकां आया, किसी के हिस्से दुकां आई/ मैं सबसे छोटा था, मेरे हिस्से में मां आई”  तो यह समय की विद्रूपता पर एक करारा तमाचा होता है  । मरहूम शायर निदा फ़ाज़ली मां का एहसास ‘मिस्सी रोटी पर रखी खट्टी चटनी की तरह महसूस करते हैं ‘ तो बहुत सारे कवियों व शायरों ने मां में ईश्वर के दर्शन किए हैं ।  यानी मां की महिमा अनंत एवं अपरंपार है जिसका वर्णन असंभव है और न हीं कोई आज तक पूर्ण रूप से मां का बखान कर पाया है। ‌ सच कहें तो मां एक शरीर नहीं एहसास है, एक भावना है। मां ही  समर्पण, ममता, वात्सल्य व  बच्चे पर जान छिड़कने वाली जीवंत प्रतिमा है ।

जब भी आदमी पर कोई आफत जाफत आती है और उसे अपने बचाव का कोई रास्ता नज़र नहीं आता, वह बहुत दुखी होता है तब उसके मुंह से बरबस एक ही शब्द निकलता है ‘ओ मां’ । मां जन्म देने की साथ ही बच्चे को सीने से चिपकाकर उसकी हिफाज़त करती है  , उसके लिए मौत से भी टक्कर ले सकती है , अपने हिस्से में  भूख रखकर भी अपना खाना उसे दे देती है , खुद गीले में लेट कर भी बच्चे को सूखे में सुलाती है , उसके सोने पर सोती है उसके खा लेने पर खाती है  ,और अपनी छातियों के अमृतरस से उसे जीवन दे पालती पोषती है , स्नेह धार से  सींचती ही नहीं अपितु  और भी जाने क्या क्या करती है  ।

वह शख्स मां ही है जो अपने जीवन को संकट में डाल , मौत से भी लड़कर बच्चे को जन्म देती है , अपने सारे सुख चैन ताक पर रखकर उसका पालन पोषण  व शिक्षा के लिए भी वह कैसे न कैसे समय निकाल ही लेती है । दफ्तर या घर के थकान भरे काम के बाद भी अपने बच्चे की हर ज़िद को पूरा करने को सदैव तैयार , अपने जतन से बचाकर रखे पैसों को भी संतान पर खर्च करने में जरा भी संकोच अगर किसी को नहीं होता है तो वह मां ही है । बेशक , दुनिया का सबसे प्यारा शब्द  अगर कोई है तो वह है ‘मां’ ही है । न केवल मनुष्य अपितु दुनिया के हर जीव को समान रूप से लुभाता है ‘मां’ शब्द । आई, माई, मां , मदर , मम्मी , माॅम , अम्मा , भाबो , ताई , या और कुछ कहें , भले ही अलग अलग देशों व प्रदेशों में उच्चारण व भाषा की दृष्टि से अलग हों पर , दुनिया के किसी भी कोने में जाईए, हर जगह  मां ही है  जो बच्चे की सबसे प्रिय लगती है । दुनिया का हर शिशु अपनी भाषा में सबसे पहला जो शब्द बोलना सीखता है वह भी ‘मां’ या उसका पर्याय ही है ।

निर्विवाद रूप से मां से ही सृष्टि का निर्माण हुआ है , मानव समाज में ‘मां’ ने ही इंसान को सभ्य बनाया । यह मां का ही जिगर है कि वह अपनी सारी खुशियां ,सारे आराम, और चैन त्याग न केवल बच्चे का पालन पोषण करती है अपितु अपनी जान को जोखिम में डाल कर एक शिशु को जन्म देती है और फिर अपने सारे सुख एक तरफ रख कर उसे पालती है , उसकी सलामती  की दुआ करती है, उसकी रक्षा के लिये मौत से भी टकराने में नहीं हिचकती , ऐसा दुनिया के किसी भी कोने में बसने वाली मां बिना किसी झिझक के करती है । जीजाबाई , पन्नाधाय , ध्रुव की मां सुनीति , लक्ष्मीबाई , कुंती , माद्री न जाने कितने ही चमकदार नाम हैं भारतीय मां के गौरवशाली इतिहास को चमक देते हुए ।

बच्चे को  जन्म देने की प्रक्रिया में यूं तो तो स्त्री एवम् पुरुष का बराबर का हाथ होता है पर  पर जब बच्चे के पालन पोषण , उसके दायित्व की बात आती है तो प्राणी जगत में केवल और केवल मां ही इस दायित्व को लेने के लिए आगे आती है । प्राणी जगत् में नर जहां बाहर घूमने व अन्य व्यवस्था जुटाने के नाम पर अपने बराबर के दायित्व से मुंह मोड़कर निकल लेता है वहीं मादा  दिन रात एक करके भी अपने दायित्व का निर्वहण ही नहीं करती बल्कि संकट आने की स्थिति में अपनी जान की बाजी लगाकर भी अपने बच्चे की हिफाजत करती है । यही तो है मां होने का गौरव व गर्व भरा अहसास ।

हालांकि यह सच है कि समय के साथ मां में  भी बदलाव आए हैं उसके सोचने ,समझने , पहनने ओढ़ने , कार्य करने व जिम्मेदारियों के साथ उसके आचार विचार बदले हैं , उसने भी समय के साथ करवटें बदली हैं उसके हावों भावों में भी बदलाव देखे गए हैं , पर जहां तक उसके अपने बच्चों प्रति नजरिए की बात आती है तो आज भी वह उसी असीमित प्यार और स्नेह के साथ अपने बच्चों के लिए कुछ भी करने को तत्पर नजर आती है । अब ,जब मां के रूप  में कोई हमारे लिए इतना कुछ करता है तो हमारा भी दायित्व बनता कि हम भी उसके लिए कुछ न कुछ तो करें ही । खास तौर मदर्स डे या मातृदिवस पर तो कुछ खास करना बनता ही है । तो साचें क्या कर सकते हैं हम जन्मदात्री मां के लिए –

निर्विवाद रूप से  माँ  से बढ़कर दुनिया में कोई भी नहीं है  ।  वह दिन रात हमारे लिये दुआ के अलावा हमारे हर हित का ,ख्याल रखती है तब हमें भी उसकी खुशी के लिए कुछ तो करना ही चाहिए । तो इस मदर्स -डे पर अपनी प्यारी सी  मां  के लिए एक प्यारा सा उपहार देना तो बनता ही है न ।  अब उपहार कैसा हो इसके लिए पहले  जान लीजिए कि इस वक्त उनकी जरुरत क्या है और अपनी तरफ से वही चीज उन्हे दे दीजिए ।  देखना, मां खिल उठेंगीं । ज़रूरत न भी जान पाएं तो भी उनका स्वभाव तो जानते ही हैं  उसके अनुरूप उन्हे भेंट दें । मां अगर  पूजा- पाठी है तो  उनके आराध्य की मूर्ति ला सकते हैं , उनका खुद का फोटो फ्रेम करवा के भेंट दे सकते हैं। सुबह सुबह उन्हे फोन पर एक मीठा सा मैसेज भी काफी है मां को ख़ुश करने के लिए । कहीं बाहर हैं तो वीड़ियो चैट करके मां को हैप्पी मदर्स डे कहना न भूलें।

लेखक वरिष्ठ साहित्यकार हैं

नोट : लेख में लेखक द्वारा व्यक्त विचारों से मातृभूमि समाचार का सहमत होना आवश्यक नहीं है।

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