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मोरारजी देसाई प्रधानमंत्री बनने के लिये थे पं. जवाहरलाल नेहरु से बड़े दावेदार

– सारांश कनौजिया

भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरु बने। कई लोगों का ऐसा मानना है कि सरदार बल्लभ भाई पटेल नेहरु से ज्यादा काबिल थे। लेकिन एक और व्यक्ति था जो प्रधानमंत्री बनना चाहता था और कुछ हद तक नेहरु से ज्यादा इस पद के लिये योग्य भी था। इस व्यक्ति को हम सभी मोरारजी देसाई के नाम से जानते हैं। जहां एक ओर जवाहरलाल नेहरु अपने पिता मोतीलाल के दम पर राजनीति में आये और प्रधानमंत्री बने, तो वहीं मोरारजी ने अपनी जमीन स्वयं तैयार की और आगे बढ़ते चले गये। ये अलग बात है कि मोरारजी देसाई 81 वर्ष की आयु में प्रधानमंत्री बनने के बाद भी अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर सके, जबकि नेहरु जी अपनी मृत्यु तक प्रधानमंत्री बने रहे।

मोरारजी देसाई का जन्म 29 फरवरी 1896 में हुआ था और जवाहरलाल नहेरु का जन्म 14 नवंबर 1889 में हुआ था। इस हिसाब से मोरारजी, नेहरु में सिर्फ 3 वर्ष का अंतर था। दोनों ही ब्राह्मण परिवार से थे। लेकिन दोनों की स्थितियों में बहुत अंतर था। मोरारजी देसाई स्कूल अध्यापक के बेटे थे, तो वहीं जवाहरलाल के पिता मोतीलाल बैरिस्टर थे और अपने बेटे को भी सफल वकील बनाना चाहते थे। लेकिन ऐसा हो न सका। इसके पीछे जवाहर के बचपन था। जवाहरलाल की प्रारम्भिक शिक्षा 15 वर्ष तक घर पर ही हुई थी क्योंकि उनके पिता मोतीलाल का मानना था कि यदि बालक जवाहर भारतीय स्कूलों में पढ़ा, तो वो बिगड़ सकता है। इसके बाद जवाहर को आगे की पढ़ाई पूरा करने के लिये विदेश भेज दिया गया।

वहीं दूसरी ओर मोरारजी एक शिक्षक के बेटे थे। यद्यपि मोरारजी की पढ़ाई मुम्बई के एलफिंस्टन कॉलेज में हुई। यह उस समय का सबसे मंहगा कॉलेज हुआ करता था। इसने मोरारजी देसाई के मन में भी महत्वकांक्षा को बहुत अधिक बढ़ा दिया था। मोरारजी के पिता का देहांत बहुत जल्दी हो गया था। इस कारण उनके पास मोतीलाल जैसा कोई व्यक्ति नहीं था। इसके बाद भी मोरारजी ने मेहनत की और 1918 में अहमदाबाद के उप जिलाधीश बन गये। मोरारजी अपनी ही धुन में रहते थे। 1930 में उन्होंने अंग्रेज सरकार की नौकरी छोड़ दी और वो भारतीय स्वतंत्रता संग्राम से जुड़ गए। 1931 में गुजरात कांग्रेस के सचिव बन गये। वो 1937 तक इस पद पर बने रहे।

जहां एक ओर मोतीलाल नेहरु और गांधी जी जवाहरलाल को आगे बढ़ाने का प्रयास कर रहे थे, वहीं दूसरी ओर मोरारजी देसाई अपने दम पर बंबई राज्य में कांग्रेस मंत्रिमंडल में जगह बना चुके थे। उनके व्यक्तित्व के बारे में जानने के लिये एक और विशेष जानकारी होना आवश्यक है। मोरारजी देश के अभी तक एक मात्र ऐसे प्रधानमंत्री हैं, जिन्हें भारत रत्न और पाकिस्तान का सर्वोच्च सम्मान निशान-ए-पाकिस्तान दोनों से सम्मानित किया गया था। इसके बाद भी कांग्रेस ने मोरारजी को प्रधानमंत्री नहीं बनाया।

उनके साथ यह अन्याय जवाहरलाल नेहरु की मृत्यु के बाद भी चलता रहा। जवाहरलाल नेहरु की मृत्यु के बाद जब इंदिरा गांधी को प्रधानमंत्री बनाने की बात आयी तो मोरारजी देसाई ने फिर अपनी दावेदारी प्रस्तुत की। तब तक वंशवाद की जड़े कांग्रेस में गहरी हो चुकी थीं। इसलिये आतंरिक चुनाव में इंदिरा गांधी को प्रधानमंत्री बनाने का निर्णय लिया गया। 1967 में इंदिरा गांधी प्रधानमंत्री बनी और मोरारजी देसाई उप प्रधानमंत्री। यह मोरारजी का प्रभाव ही था कि इंदिरा गांधी जैसी नेता भी उन्हें पूरी तरह नजरअंदाज नहीं करना चाहती थीं। लेकिन जो व्यक्ति योग्यता में इंदिरा गांधी के पिता से अधिक प्रतिभाशाली था, वो उप प्रधानमंत्री पद से संतोष कैसे कर सकता था।

मोरारजी देसाई ने कांग्रेस में वंशवाद को प्रारंभ से ही चुनौती दी। मोतीलाल नेहरु के बाद जवाहर और उसके बाद इंदिरा। मोरारजी को यह मंजूर नहीं था। वो निरंतर इस वंशवादी परंपरा का विरोध करते रहे। यह अलग बात है कि जब 1977 में मोरारजी को प्रधानमंत्री बनने का अवसर मिला, तो मात्र दो वर्षों में ही उन्हें पद छोड़ना पड़ा और वंशवाद की उनकी लड़ाई रुक गयी। यद्यपि मोरारजी ने हार नहीं मानी और 1995 में अपनी मृत्यु तक संघर्ष करते रहे। यही कारण था कि कांग्रेस उनके पूरे जीवनकाल में स्वयं को वंशवाद से मुक्त दिखाने का प्रयास करने के लिये संघर्ष करती हुई दिखायी दी।

कांग्रेस आज भी वंशवाद की समस्या का सामना कर रही है। लेकिन आज अधिकांश कांग्रेसियों का मानना है कि बिना नेहरु-गांधी परिवार के कांग्रेस की कल्पना भी नहीं की जा सकती। एक बार फिर कांग्रेस और इस देश को मोरारजी देसाई जैसे नेता की जरुरत है, जो कांग्रेस के अंदर और फिर बाहर रह कर भी इस वंशवादी राजनीति को चुनौती दे सके।

लेखक मातृभूमि समाचार के संपादक हैं।

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