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आज़ादी के शंखनाद से हुई गणेश चतुर्थी की शरुआत

– बाल मुकुन्द ओझा

देश के सर्वाधिक लोकप्रिय त्योहारों में गणेश चतुर्थी एक है। गणेश चतुर्थी इस बार 10 सितंबर को मनाई जाएगी। 1893 में महान स्वतंत्रता सेनानी लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक ने एक सार्वजनिक समारोह के रूप में महाराष्ट्र में गणेश चतुर्थी की शुरूआत की। उनका एकमात्र ध्येय स्वतंत्रता संग्राम के संदेश को फैलाना और देश में एकता, देशभक्ति की भावना और विश्वास को प्रदान करना था। गणेश चतुर्थी आस्था से तो जुड़ा पर्व है। स्वतंत्रता आंदोलन के इतिहास में भी इसकी खास अहमियत रही है।

करीब 100 वर्ष पहले लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक ने गणेशोत्सव की नींव रखी थी। इस त्योहार को मनाने के पीछे का उद्देशय अंग्रेजों के खिलाफ भारतीयों को एकजुट करना था। तिलक ने गणेश चतुर्थी को आज़ादी के आंदोलन का अचूक हथियार बनाया और इसमें उन्हें सफलता भी मिली। अंग्रेजों के खिलाफ देशवासियों को एक जूट करने के लिए उन्होंने धार्मिक आस्था का यह मार्ग चुना। तिलक के कारण इस त्योंहार को राष्ट्रीय स्तर पर पहचान मिली। गणेश चतुर्थी का यह पर्व स्वतंत्रता संग्राम की लड़ाई, छुआछूत दूर करने और देश तथा समाज को संगठित करने का जरिया बना और उसे एक आंदोलन का स्वरूप दिया गया। इस आंदोलन ने ब्रिटिश साम्राज्य की नींव हिलाने में महत्वपूर्ण योगदान दिया।

भगवान गणेश के जन्मोत्सव को गणेश चतुर्थी के रूप में जाना जाता है। हमारे देश में प्रत्येक घर में तब तक कोई शुभ काम पूरा नहीं माना जाता जब तक वहां भगवान गणेश की पूजा न हो। इसके पीछे मान्यता है कि किसी भी शुभ कार्य की शुरुआत इस दिन करने से फल अच्छा मिलता है। इस दिन गणेश जी की पूजा करने से घर में सुख, समृद्धि और संपन्नता आती है। कई लोग व्रत रखते हैं। व्रत रखने से भगवान गणेश खुश होते हैं और श्रद्धालूओं की मनोकामनाएं पूरी होती हैं। यह दिन भगवान गणेश की पूजा, आदर और सम्मान करने के लिए मनाया जाता है।

भारतीय जनजीवन में गणेशजी का अद्वितीय स्थान है। पंच देवताओं में वे अग्रगण्य हैं। प्रत्येक उत्सव, समारोह अथवा अनुष्ठान का आरंभ उन्हीं की पूजा-अर्चना से होता है। वे विद्या और बुद्धि के देवता हैं। इसके साथ ही वे विघ्न-विनाशक भी हैं। भगवान गणेश का अवतार ज्ञान, समृद्धि और सौभाग्य के रूप में हुआ है। इस कारण हमारे देश में किसी भी अच्छे काम की शुरूवात से पहले भगवान गणेश का आह्वान एक आम बात है। साथ ही इस त्योहार से हम अपने जीवन में शांति, समृद्धि और सद्भाव ला सकते है।

पंचदेवों में से एक भगवान गणेश सर्वदा ही अग्रपूजा के अधिकारी हैं और उनके पूजन से सभी प्रकार के कष्टों से मुक्ति मिलती है । श्रीगणेश के स्वतंत्र मंदिर कम ही जगहों पर देखने को मिलते हैं परंतु सभी मंदिरों, घरों, दुकानों आदि में भगवान गणेश विराजमान रहते हैं। इन जगहों पर भगवान गणेश की प्रतिमा, चित्रपट या अन्य कोई प्रतीक अवश्य रखा मिलेगा. लेकिन कई स्थानों पर भगवान गणेश की स्वतंत्र मंदिर भी स्थापित है और उसकी महता भी अधिक बतायी जाती है. भारत ही नहीं भारत के बाहर भी भगवान गणेश हैं।

पौराणिक मान्यताओं के मुताबिक एक बार मां पार्वती स्नान करने से पूर्व अपनी मैल से एक सुंदर बालक को उत्पन्न किया और उसका नाम गणेश रखा। फिर उसे अपना द्वारपाल बना कर दरवाजे पर पहरा देने का आदेश देकर स्नान करने चली गई। थोड़ी देर बाद भगवान शिव आए और द्वार के अन्दर प्रवेश करना चाहा तो गणेश ने उन्हें अन्दर जाने से रोक दिया। इसपर भगवान शिव क्रोधित हो गए और अपने त्रिशूल से गणेश के सिर को काट दिया और द्वार के अन्दर चले गए।

जब मां पार्वती ने पुत्र गणेश जी का कटा हुआ सिर देखा तो अत्यंत क्रोधित हो गई। तब ब्रह्मा, विष्णु सहित सभी देवताओं ने उनकी स्तुति कर उनको शांत किया और भोलेनाथ से बालक गणेश को जिंदा करने का अनुरोध किया। उनके अनुरोध को स्वीकारते हुए एक गज के कटे हुए मस्तक को श्री गणेश के धड़ से जोड़ कर उन्हें पुनर्जीवित कर दिया। पार्वती जी हर्षातिरेक हो कर पुत्र गणेश को हृदय से लगा लेती हैं तथा उन्हें सभी देवताओं में अग्रणी होने का आशीर्वाद देती हैं। ब्रह्मा विष्णु, महेश ने उस बालक को सर्वाध्यक्ष घोषित करके अग्रपूज्य होने का वरदान देते हैं।

लेखक राजस्थान के वरिष्ठ पत्रकार हैं.

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