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स्वामी विवेकानंद के शब्दों में हिन्दुत्व

– सारांश कनौजिया

हिन्दुत्व क्या है? एक पूजा पद्धति या एक संस्कृति या एक सभ्यता या फिर जीवन जीने की पद्धति? जितने लोग, उतनी परिभाषाएं। इसलिए हिन्दुत्व की क्या सही परिभाषा है, उसका निर्णय करने के लिये पहले हिन्दुत्व को समझना होगा। यदि इसके लिये स्वामी विवेकानंद हिन्दुत्व के बारे में क्या सोचते थे, यह पता हो, तो समस्या का समाधान मिल सकता है।

स्वामी विवेकानंद ने अमेरिका में दिये गए अपने भाषण में कहा था कि मैं यहां आपका धर्म परिवर्तन करने नहीं आया हूं। बल्कि आप जिस मान्यता को मानते हैं, उसे और बेहतर करने आया हूं। हम मानते हैं कि ईश्वर के कई रुप हो सकते हैं। उसे कई नामों से जाना और पहचाना जा सकता है। यह सभी जानते हैं कि स्वामी विवेकानंद हिन्दू आध्यात्मिक गुरु थे। इसलिये यह भी स्पष्ट है कि वो जिस विचार की बात कर रहे थे, वही वास्तविक हिन्दुत्व है। अर्थात हिन्दू कभी धर्मांतरण में विश्वास नहीं रखता। हम सबकी मान्यताओं का सम्मान करते हैं। यही कारण है कि हमारे यहां ईश्वर को एक और उस तक पहुंचने के अनेक रास्ते बताये गए हैं।

इससे एक बात स्पष्ट है कि विवेकानंद के अनुसार हिन्दुत्व कोई पूजा पद्धति नहीं है। अलग-अलग प्रकार से पूजा करने वाले, अलग-अलग भगवानों को मानने वाले सभी हिन्दू हो सकते हैं। उन्होंने शिकागो में जो भाषण दिया था, उसकी शुरुआत भाईयों और बहनों से की थी, जबकि शायद उस समय वहां एक भी हिन्दू नहीं था। यदि रहा भी होगा, तो उनकी संख्या न के बराबर होगी। अधिकांश अमेरिकी ईसाई ही वहां आए थे। हम अपने परिवार के लोगों के साथ इस प्रकार का संबोधन करते हैं। इसका तात्पर्य यह है कि हिन्दुत्व पूरी पृथ्वी को एक परिवार मानता है। वसुधैव कुटुम्बकम जिसे हम अपनी संस्कृति और सभ्यता का मंत्र मानते हैं, वास्तव में वह हिन्दुत्व का एक सिद्धांत है।

स्वामी विवेकानंद के द्वारा रामकृष्ण मठ की स्थापना की गई। इस मिशन का उद्देश्य क्या है? यह समझ में आ गया, तो हिन्दुत्व को समझना भी सरल हो जाएगा। रामकृष्ण मिशन या मठ के आचार्य हिन्दुत्व को एक जीवन दर्शन के रुप में लेते हैं और इसी रुप में इसका प्रचार करते हैं। कुछ लोगों ने स्वामी विवेकानंद को हिन्दुत्वों की सनातन परंपरा का विरोध करने वाला सिद्ध करने का प्रयास किया। किंतु स्वामी विवेकानंद के ही एक और वक्तव्य से यह सिद्ध हो जाएगा कि वो हिन्दुत्व और हिन्दुओं के बारे में क्या सोचते थे? उन्होंने एक कार्यक्रम में कहा था कि एक हिन्दू का धर्मांतरण सिर्फ हमारी एक संख्या कम नहीं करता, बल्कि हमारे लिये एक दुश्मन पैदा करता है। मतलब साफ है, वो उन लोगों के घोर विरोधी थे, जो हिन्दू मान्याताओं का विरोध करते हैं, जो हिन्दुत्व को गलत सिद्ध कर, अपने सम्प्रदाय को ही सर्वोच्च बताने का प्रयास करते हैं।

उनके विचारों को यदि मैं अपने शब्दों में परिभाषित करने का प्रयास करुं, तो शायद हिन्दुत्व सबको साथ लेकर चलने का एक प्रयास है, जहां कोई बड़ा या छोटा नहीं होता। हिन्दुत्व धर्म है और धर्म कर्म होता है, अच्छे कर्म। इसे हम एक आदर्श जीवनपद्धति कह सकते हैं।

लेखक मातृभूमि समाचार के संपादक हैं.

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