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हरियाली तीज : गीतों और साजन का श्रावणी उत्सव

– डॉ घनश्याम बादल

भीषण गरमी के बाद अगर बारिश की रिमझिम  फुहारें न आएं  तो शक होने लगबता है कि सावन आया भी कि नहीं ।  और इस बार तो सावन का आगाज ही अगस्त में हुआ सो उसके लिए चाहत और भी बढ़ गई । खैर , सावन और हरियाली तीज अगस्त में आए या जुलाई में गौरियों के मेहंदी रचे हाथ और साजन के इंतजार की तपिश में तन मन बेसब्री से राह देखते हैं साजन और सावन दोनों की  ।

हरियाली का पर्व :

जब प्रकृति चारों तरफ हरियाली की चादर बिछा देती है तो वर्षा ऋतु में प्रकृति की इस छटा को देखकर मन पुलकित होकर नाच उठता है। जगह-जगह झूले पड़ते हैं। सजी धजी कामासक्त स्त्रियों के समूह गीत गा-गाकर झूला झूलते हैं। उत्तर भारत में हर वर्ष श्रावण मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया को श्रावणी तीज का उत्सव मनाते हैं । सुहागिन स्त्रियों के साथ ही कुंवारी कन्याओं का अच्छा पति मिलने की कामना वाला यही पर्व हरियाली तीज के नाम से भी जाना जाता है।

मिथक ,कहानी :

मिथक व पूराण कहते हैं कि श्रावण शुक्ल तृतीया (तीज) के दिन भगवती पार्वती सौ वर्षों की तपस्या साधना के बाद भगवान शिव से मिली थीं। माँ पार्वती का इस दिन पूजन – आह्वान विवाहित स्त्री -पुरुष के जीवन में हर्ष प्रदान करता है। ऐसे ही हमारे साथ भी हो इसलिए समस्त उत्तर भारत में तीज पर्व बड़े उत्साह और धूमधाम से मनाया जाता है।

हरियाली ीज :

ग्रीष्म ऋतु के समाप्त होने पर काले – कजरारे मेघों को आकाश में घुमड़ता देखकर पावस के प्रारम्भ में पपीहे की पुकार और वर्षा की फुहार से मन आनन्दित हो उठता है। ऐसे में भारतीय लोक जीवन कजली या हरियाली तीज का पर्वोत्सव मनाता है। आसमान में घुमड़ती काली घटाओं के कारण ही इस त्यौहार या पर्व को ‘‘कजली’’ या ‘‘कज्जली तीज’’ तथा पूरी प्रकृति में हरियाली के कारण ‘‘तीज’’ के नाम से जाना जाता है। लोकगायन की एक प्रसिद्ध शैली भी इसी नाम से प्रसिद्ध हो गई है, जिसे ‘‘कजली’’ कहते हैं।

मेहंदी , मांडने  गीत और झूले:

स्त्रियाँ अपने हाथों में भिन्न-भिन्न प्रकार की मेहंदी रचाती हैं। मेहंदी रचे हाथों से जब वह झूले की रस्सी पकड़ कर झूला झूलती हैं तो ऐसा लगता हैं मानो सुहागिन आकाश को छूने चली हैं। इस दिन सुहागिन स्त्रियाँ सुहागी पकड़कर सास के पांव छूकर उन्हें देती हैं। यदि सास न हो तो स्वयं से बड़ों को अर्थात जेठानी या किसी वृद्धा को देती हैं। इस दिन कहीं-कहीं स्त्रियाँ पैरों में आलता भी लगाती हैं जो सुहाग का चिह्न माना जाता है।

ससुराल का सिंधारा:

यदि शादी के बाद का पहला सावन है तो नवविवाहिता लड़कियों को ससुराल से पीहर बुला लिया जाता है। नवविवाहिता की ससुराल से इस त्योहार पर सिंधारा या सिंजारा भेजा जाता है। हरियाली तीज से एक दिन पहले सिंजारा मनाया जाता है। इस दिन नवविवाहिता लड़की की ससुराल से वस्त्र, आभूषण, श्रृंगार का सामान, मेहंदी और मिठाई भेजी जाती है। उत्तरप्रदेष व राजस्थान तथा हरियाणा में  मिठाई के रूप  में घेवर और रिष्ते के रूप में देवर भेजे जाने का विशेष रिवाज है ।

मेलों ठेलों का उत्सव:

हरियाली तीज के दिन अनेक स्थानों पर मेले लगते हैं और माता पार्वती की सवारी बड़े धूमधाम से निकाली जाती है। वास्तव में देखा जाए तो हरियाली तीज कोई धार्मिक त्योहार नहीं वरन महिलाओं के लिए एकत्र होने का एक उत्सव है। नवविवाहित लड़कियों के लिए विवाह के पश्चात पड़ने वाले पहले सावन के त्योहार का विशेष महत्व होता है। एक तरह से इस मौके को वें अपने ससुराल के अनुभवों को बांटने में इस्तेमाल करती हैं ।तीज भारत के अनेक भागों में मनाई जाती है, परन्तु राजस्थान में राजधानी जयपुर, यू पी में बुन्देलखंड के जालौन, झाँसी,, महोबा, ओरछा आदि क्षेत्रों में इसे हरियाली तीज के नाम से व्रतोत्सव के रूप में मनाते हैं। पूर्वी उत्तर प्रदेश में बनारस, मिर्जापुर, देवलि, गोरखपुर, जौनपुर, सुलतानपुर आदि जिलों में इसे कजली तीज के रूप में मनाने की परम्परा है।तो पश्चिमी उत्तरप्रदेश में मेरठ व सहारनपुर मंडलों में तथा उत्तराखंड के हरिद्वार जिले में इसकी धूम देखते ही बनती है आज भी ।

सजना है सजना के लिए:

तीज पूर्ण रूप से स्त्रियों का उत्सव है। स्त्रियाँ आकर्षक परिधानों से सुसज्जित हो भगवती पार्वती की उपासना करती हैं। राजस्थान में जिन कन्याओं की सगाई हो गई होती है, उन्हें अपने भविष्य के सास ससुर से एक दिन पहले ही भेंट मिलती है।इस भेंट को स्थानीय भाषा में ‘‘शिंझार’’(श्रृंगार) कहते हैं। शिंझार में अनेक वस्तुएँ होती हैं। जैसे – मेंहदी, लाख की चूड़ियाँ, लहरिया नामक विशेष वेश-भूषा जिसे बाँधकर रंगा जाता है तथा ‘‘घेवर’’ विशेष रूप से खाते हैं । इस अवसर पर नवयुवतियाँ हाथों में मेंहदी रचाती हैं। तीज के गीत हाथों में मेंहदी लगाते हुए गाये जाते हैं। समूचा वातावरण श्रृंगार से अभिभूत हो उठता है। इस त्यौहार की सबसे बड़ी विशेषता है, महिलाओं का हाथों पर विभिन्न प्रकार से बेलबूटे बनाकर मेंहदी रचाना। पैरों में आलता लगाना, महिलाओं के सुहाग की निशानी है। राजस्थान में हाथों व पाँवों में भी विवाहिताएँ मेंहदी रचाती हैं। जिसे ‘‘मेंहदी – माँडना’’ कहते हैं। इस दिन राजस्थानी बालाएँ दूर देश गए अपने पति के तीज पर आने की कामना करती हैं। जो कि उनके लोकगीतों में भी मुखरित होता है। तीज पर तीन बातें त्यागने का विधान है -पति से छल- कपट , परनिन्दा , झूठ एवं बुरा बर्ताव।

उत्सव गीतों , झूलों का:

तीज को झूला उत्सव भी कहा जाता है। न सिर्फ गाँवों में बल्कि शहरों में भी झूले डालने की तैयारियाँ सावन लगते ही शुरू हो जाती हैं। शहरों में तो तीज को लेकर अनेक स्थानों पर तरह-तरह के आयोजन और समारोह भी होते हैं जहाँ महिलाओं के लिए मेहँदी, चूड़ियाँ, साज-श्रृंगार के सामान और झूला झूलने की खास व्यवस्था रहती है। तीज के दिन का विशेष कार्य होता है, खुले स्थान पर बड़े- बड़े वृक्षों की शाखाओं पर झूला बाँधना। झूला स्त्रियों के लिए बहुत ही मनभावन अनुभव है। मल्हार गाते हुए मेंहदी रचे हुए हाथों से रस्सी पकड़े झूलना एक अनूठा अनुभव ही तो है। सावन में तीज पर झूले न लगें, तो सावन क्या ?  एक समय था जब नव विवाहिताएं खुले स्थानों पर बागों में पेड़ों की डाल पर झूला डालकर झूलती थीं और समूह में नाचते हुए एक-दूसरे को झुलाती थीं । महिलाएं हरियाली तीज के लोकगीत ‘इंद्र राजा झुक आए बाग में जी….’, ‘अरी बहना सातों सहेली मिल संग झूलें चलके झूलें .’,  ‘अरी बीबी मन में तो भरियों उमंग..’, ‘झूले पर चलके झूलन की, सखी आया रे सावन का महीना..’  कच्चे नीम की निंबोली… सावण जल्दी आइयो रे…  और ‘‘ आमण जामण के दो पेड़ , सामण जल्दी आइयो रै ’’ उत्तरप्रदेश व हरियाणा के ये लोकगीत तीज के मौके पर आज भी शहर और गाँवों गुम से गए हैं।

चढ़ता आधुनिक रंग:

कभी लोक गीतों से सराबोर रहने वाले त्योहार हरियाली तीज की मूल चमक अब फीकी पड़ती जा रही है। भागदौड़ की जिंदगी में महिलाओं ने इसके रंग-रूप को बदल दिया है। अब तीज का त्योहार खुले बागों में पेड़ों की डालों पर झूले डालकर नहीं बल्कि क्लब और बैंक्वेट हॉलों में डीजे की धुन पर आधुनिक गानों के साथ मनाया जा रहा है। इन कार्यक्रमों में अब ढोलक की थाप और लोकगीतों की गूंज भी नहीं सुनाई देती है।महिलाओं के परम्परागत त्योहार तीज पर भी अब पश्चिमी संस्कृति हावी हो रही है। महिलाओं और युवतियों की नई पीढ़ी अपने मूल्यों और संस्कारों को नए रूप में ढाल रही हैं। हरियाली तीज पर शादी के बाद नवविवाहिता को अपने सिंधारे आने का इंतजार रहता था। इस सिंधारे में श्रृंगार के सामान के साथ झूला, घेवर, सिवाएं, साड़ी, चूड़ियां व अन्य सामान होता था। नवविवाहिताएं इस सिंधारे को पाकर बहुत खुश होती थीं। अब नकदी धन देने के रूप में भी यह सिंधारा आ जाता है ‌। इतना ही नहीं महिलाएं अब नए अंदाज में क्लब, बैंक्वेट हॉल मॉल, सोसाइटी आदि में तीज को रस्म अदायगी के रूप में मनाती हैं। मेहंदी के साथ ही सजधज कर पूरा काम उनका बाजार में होता है। डीजे पर बजते आधुनिक गीत संगीत के फिल्मी गानों पर ये महिलाएं नाच-गाकर इस लोक गीत से भरपूर त्योहार को मनाती हैं।

लेखक वरिष्ठ साहित्यकार हैं.

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