शुक्रवार , सितम्बर 24 2021 | 02:57:31 PM
Breaking News
Home / राष्ट्रीय / कब मनेगा राष्ट्रभाषा हिन्दी का अमृत महोत्सव ?

कब मनेगा राष्ट्रभाषा हिन्दी का अमृत महोत्सव ?

– डॉ. घनश्याम बादल

देश एक और हिंदी दिवस मना रहा है । कहने को  भारत हिंदी भाषी ही है पर, कड़वी सच्चाई यही है कि हिंदी आज भी संवैधानिक रूप से हमारी राष्ट्रभाषा नहीं है। भारत में भाषाओं का वैविध्य देखने में आता है । देश में एक दो  नहीं कई भाषाएं एवं लिपियां हैं और विविधता के बीच राजनीति इतनी कि हिंदी को  स्वीकार करने के लिए देश का सारा भूभाग तैयार नहीं है । अब इसे राजनीति का असर कहें या कुछ और पर कुल मिलाकर असलियत यह है कि इस विवाद के चलते हुए आज तक इस देश को अपनी कोई राष्ट्रभाषा नहीं मिल पाई है।‌‌

नहीं मिला हिंदी को अमृत:

हर वर्ष सितंबर के महीने में कभी हिंदी सप्ताह तो कभी हिंदी पखवाड़े मनाए जा रहे हैं और कामना की जा रही है कि हिंदी भारतवर्ष की राष्ट्रभाषा बन जाए मगर आजादी के 75 में वर्ष में प्रवेश करने के बाद भी हिंदी का अमृत महोत्सव देवनागरी लिपि एवं हिंदी के लिए तो मनता दिखाई नहीं दे रहा है । कितनी विचित्र बात है की आज तक भारत अपनी एक राष्ट्रभाषा नहीं चुन पाया है। ऐसी हास्यास्पद स्थिति दुनिया के किसी भी देश की शायद ही हो । छोटे-छोटे से देश भी अपनी राष्ट्रभाषा के साथ गर्व से उस में कार्य करके प्रगति कर  रहे हैं पर हम अपनी ही भाषा हिंदी को उसके हिस्से का अमृत नहीं दिला पाए।

कहां गया वह संकल्प ?

आंकड़ों की दृष्टि से देखें तो देश में 129 भाषाएं  संविधान की आठवीं सूची में दर्ज हैं, आजादी के ठीक बाद से ही यह निर्णय लिया गया था कि हिंदी देश की राष्ट्रभाषा होगी और आजादी के 15 वर्षों के भीतर ही धीरे-धीरे अंग्रेजी को हटाकर देवनागरी लिपि कि हिंदी को राष्ट्रभाषा के स्थान पर स्थापित किया जाएगा मगर यह संकल्प आज आजादी के 75 वर्ष के आने तक भी पूर्ण नहीं हो पाया है और न ही निकट भविष्य में भी हिंदी के राष्ट्रभाषा बनाने का सपना पूरा होता दिखाई नहीं  दे रहा है।

क्या हमारी अपनी एक राष्ट्रभाषा नहीं होनी चाहिए ? और हिंदी के अतिरिक्त क्या कोई दूसरी भाषा भारत राष्ट्र में राष्ट्रभाषा का स्थान ले सकती है ? बहुत स्वाभाविक उत्तर है नहीं । मगर हिंदी को राष्ट्रभाषा का दर्जा देने की बात जब भी उठी तब ही देश के एक विशेष हिस्से से उसके विरोध के स्वर मुखरित होते चले गए और क्षुद्र स्वार्थों वाली क्षेत्रीय राजनीति हिंदी का राष्ट्रभाषा होने का हक बड़ी चतुराई से लील गई । उसी का परिणाम सामने है । देशभर में सबसे अधिक बोली पढ़ी व लिखे जाने वाली हिंदी भाषा जिसे दुनिया भर में भर मैंडरिन के बाद दूसरा स्थान प्राप्त है अपने ही देश में राष्ट्रभाषा होने के अधिकार सुख से वंचित है।

कोई राष्ट्रभाषा ही नहीं :

विश्व के हर बड़े मंच पर आज भारत की आवाज़ की महत्ता बढ़ी है मगर हम खुद भी नहीं जानते कि हमारी आवाज़ क्या है ? ऐसा इसलिए कहा जा रहा है क्योंकि आवाज़ के लिये अपनी एक भाषा का होना बेहद ज़रुरी है और आज़ादी के 74 साल पूरे होने के बाद भी हमारी अधिकारिक रूप से कोई राष्ट्र-भाषा न  होना हमारी कमजोरी हेै ।

संसद की कार्यवाही के लिए हमने अनेक भाषाएं चुनी हैं , संविधान की 26 वीं अनुसूची में कई क्षेत्रीय भाषाएं दर्ज हैं पर आज भी दासता की प्रतीक अंग्रेजी ही हमारी अधिकृत भाषा बनकर सामने आई है। भले ही उत्तर भारत के निवासी भावनात्मक रूप से देवनागिरी हिन्दी को राष्ट्रभाषा का दर्जा देते हैं पर संविधान उसे ऐसा कोई दर्जा नहीं देता हैऔर वह भी दूसरी क्षेत्रीय भाषाओं की तरह ही एक भाषा मात्र है जिसे राज्य व केन्द्र सरकारें अपने काम काज में लाएं या न लाएं उनकी मर्जी पर है ।

 राजनैतिक विरोध की मार  :

बाहर की तो छोड़िए भारत के ही कुछ राज्यों में हिन्दी का विरोध जमकर हो रहा है स्थानीयता व क्षेत्रीय हितों की हिमायत का बहाना बनाकर वहां हिन्दी का विरोध जारी है । ऐसे कई राज्य हैं जहां का सारा सरकारी काम या तो अंग्रेजी में होता है या वहां की किसी स्थानीय भाषा में । तमिलनाड़ु, आंध्र, तेलंगाना, केरल, कर्नाटक, असम, मिजोरम, त्रिपुरा, मणिपुर, गोवा, महराष्ट्र आदि में हिन्दी के विरोध का सहारा लेकर सता हासिल करना एक ऐसा राजनैतिक खेल बन गया है जो खत्म होता नहीं दिख रहा है ।

स्तरहीन अनुवाद :

केन्द्र सरकार राज्यों की स्वायत्तता की बात कह कर इसमें हस्तक्षेप न करने की नीति का पालन करती है तो इससे दूसरे कुछ राज्यों की महत्वाकांक्षाएं भी बढ़ रही हैं जैसे पंजाब भी अब चाहता है कि उसे गुरमुखी में ही काम करना चाहिए , हिमाचल में भी डोगरी के प्रति जूनून बढ़ रहा है और हिन्दी प्रधान माने जाने वाले उत्तरप्रदेश , मध्यप्रदेश , हरियाणा व राजस्थान में भी सरकारी कामों में अधिकतर पहले अंग्रेजी का प्रयोग होता है फिर उसका उल्टा – सीधा,  अटपटा  व बेहद क्लिष्ट अनुवाद देवनागरी में किया जाता है और कई बार तो यह अनुवाद इतना स्तरहीन होता है कि हास्य का पात्र बन जाता है । अब ऐसी स्थिति में हिन्दी का उन्नयन  हो भी तो कैसे ?

हिंदी बेजोड़  भाषा …..

हिन्दी का प्रयोग न करने या न कर पाने के पीछे कई बार बहुत ही थोथा तर्क दिया जाता है कि हिन्दी में कारगर शब्दावली ही नहीं है । किसी हद तक यह बात एकदम गलत भी नहीं है पर यह कहना कि हिन्दी एक कमजोर या अक्षम भाषा है हज़म नहीं होता । दुनिया भर के विद्वान मान चुके हैं कि हिन्दी जैसी समर्थ भाषाएं बहुत ही कम हैं और जहां तक उसके वैज्ञाानिक व व्याकरणीय होने का प्रश्न है तो उसमें तो वह बेजोड़  भाषा के रूप  में उभरी है । कम से कम अंग्रेजी से तो इस संदर्भ में वह बहुत आगे है जिसका न कोई सटीक ध्वनि विज्ञान है न ही उच्चारण का वैज्ञानिक सर्वमान्य मानक ।

क्षेत्रीयतावाद की राजनीति :

अब चलते-चलते एक नज़र इस पर भी कि आखिर हिन्दी ताकतवर व समृद्व होकर भी क्यों कमजोर पड़ रही है ? तो उसके पीछे जहां क्षेत्रीयतावाद की राजनीति व हिन्दी भाषी लोगों द्वारा अहिन्दी भाषी क्षेत्रों के लोगों के रोजगार छीन लेने का छद्म भय खड़ा करना व क्षेत्रीय पहचान खोने का भय दिखाना है तो हिन्दी के अंदर की राजनीति भी इसके लिए कम जिम्मेदार नहीं है ।

अहम हावी :

हिन्दी के विद्वानों ने जितना जोर अपना वर्चस्व बढा़ने में लगाया है अगर उसका शतांश भी हिन्दी के संवर्द्धन व विकास में लगाते, उसकी शब्दावली व शब्दकोष को बढ़ाते, उसे सार्थक, सरल,सहज व ऐसे उपयोगी शब्द दे पाते जो बोलने में आसान व प्रचलन में आने लायक होते, उसे क्लिष्टता के प्रेत से मुक्ति दिलाने का ईमानदार प्रयास करते, खेमेबाजी से बच, अपने और सहयाोगी बोलियों, भाषाओं के विद्वानों के साथ मिलकर काम करते तो हिन्दी आज सिरमौर भाषा होती ।

लेखक वरिष्ठ स्तंभकार हैं.

नोट : लेख में लेखक द्वारा व्यक्त विचारों से मातृभूमि समाचार का सहमत होना आवश्यक नहीं है।

मित्रों,
मातृभूमि समाचार का उद्देश्य मीडिया जगत का ऐसा उपकरण बनाना है, जिसके माध्यम से हम व्यवसायिक मीडिया जगत और पत्रकारिता के सिद्धांतों में समन्वय स्थापित कर सकें। इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए हमें आपका सहयोग चाहिए है। कृपया इस हेतु हमें दान देकर सहयोग प्रदान करने की कृपा करें। हमें दान करने के लिए निम्न लिंक पर क्लिक करें -- Click Here


* 1 माह के लिए Rs 1000.00 / 1 वर्ष के लिए Rs 10,000.00

Contact us

Check Also

भारत सरकार के दबाव में ब्रिटेन ने कोविशील्ड वैक्सीन को दी मान्यता, लेकिन अभी दिक्कत बाकी

नई दिल्ली (मा.स.स.). भारत की ओर से बनाया दबाव काम कर गया है। ब्रिटेन ने …

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *