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‘आनंद’ का हो रहा लोप, आ रहा है ‘राक्षस’ संवत्सर

– डॉ घनश्याम बादल

चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से नए हिंदू  वर्ष का आरम्भ हो रहा है। इस बार नवसंवत्सर 2078, है जो 13 अप्रैल 2021 से शुरु होगा। ज्ञात हो कि हर संवत्सर वर्ष  का एक नाम भी  होता है संवत 2078 का नाम   ‘राक्षस’  होगा जबकि ‘आनंद’ संवत्सर का 2078 संवत्सर में लोप हो जाएगा। ब्रह्म पुराण के अनुसार  सृष्टि के रचयिता ब्रह्माजी ने इसी तिथि को सूर्योदय के समय सृष्टि बनाई थी।’ स्मृति कौस्तुभकार के मतानुसार चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को रेवती नक्षत्र के ‘निष्कुंभ योग’ में भगवान विष्णु ने मत्स्यावतार लिया था। वहीं भारत के प्रतापी महान सम्राट चंद्रगुप्त विक्रमादित्य के संवत्सर का भी यहीं से आरंभ माना जाता है। इस तरह से न केवल पौराणिक बल्कि ऐतिहासिक दृष्टि से भी इस तिथि का बहुत महत्व है।

नव संवत्सर के आरंभ के बारे में एक रोचक तथ्य यह भी है कि यह  नववर्ष मास के प्रथम दिवस यानि कृष्ण पक्ष की प्रतिपदा से नहीं बल्कि आधा चैत्र बीत जाने के बाद चैत्र की अमावस्या के दूसरे दिन यानि चैत्र शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से शुरु होता है। इस प्रकार चैत्र मास के प्रथम पूर्वाद्ध  होली की पड़वा से चैत्र की अमावस्या तक के 15 दिन तो गत वर्ष के अंतिम 15 दिन होते हैं और चैत्र मास का उत्तरार्द्ध यानि अमावस्या की प्रतिपदा से पूर्णिमा तक के 15 दिन नव संवत्सर  में आते हैं। आज से  चैत्रीय नवरात्र भी शुरू हो जाते है साथ ही  ब्रह्माजी की विशेष पूजा—आराधना का भी विशेष विधान है। आज के दिन नए वस्त्र धारण करने, घर को सजाने, नीम के कोमल पत्ते खाने, ब्राह्मणों को भोजन कराने और प्याउ की स्थापना करने की भी परंपरा  है।

वैसे नव संवत्सर ही भारत में मनाया जाने वाला एकमात्र नव वर्ष नहीं है बल्कि यहां पर एकाधिक नव वर्ष प्रचलन में रहे हैैं । भारत के अलग अलग हिस्सों में नव वर्ष अलग-अलग तिथियों को मनाए जाते हैं। प्रायः यें वर्ष मार्च और अप्रैल के महीनों में पड़ते हैं । भारत कैलैंडरों के मामले में बहुत समृद्ध है।  देश में विक्रम संवत, शक संवत, हिजरी संवत, फसली संवत, बांग्ला संवत, बौद्ध संवत, जैन संवत, खालसा संवत, तमिल संवत, मलयालम संवत, तेलुगु संवत आदि  साल प्रचलित हैं। इनमें देश में सर्वाधिक प्रचलित संवत विक्रम और शक संवत है।

पंजाब में नया साल बैशाखी नाम से १३ अप्रैल को मनाया जाता है तो सिख नानकशाही कैलंडर के अनुसार मार्च में मोहल्ला नया साल होता है। इसी तिथि के आसपास बंगाली तथा तमिल नव वर्ष भी आता है। तेलगु नया साल मार्च-अप्रैल के बीच आता है। आंध्रप्रदेश में इसे उगादी (युगाद) के रूप में मनाते हैं, यह चैत्र महीने का पहला दिन होता है। तमिल का  नया साल ‘विशु’ अप्रैल में, तमिलनाडु में पोंगल १४ जनवरी को नए साल के रूप में मनाया जाता है। कश्मीरी कैलेंडर वर्ष ‘‘नवरेह ’’ मार्च में होता है। महाराष्ट्र में गुड़ी पड़वा के रूप में मार्च-अप्रैल के महीने में मनाया जाता है, कन्नड नया वर्ष उगादी कर्नाटक के लोग चैत्र माह के पहले दिन को मनाते हैं, सिंधी उत्सव चेटी चंड, उगाड़ी और गुड़ी पड़वा एक ही दिन मनाया जाता है।

मदुरै में चित्रैय महीने में‘‘ चित्रैय तिरूविजा ’’नए साल के रूप में मनाया जाता है। मारवाड़ी नया साल दीपावली के दिन होता है। गुजराती नया साल दीपावली के दूसरे दिन होता है जो अक्टूबर या नवंबर में आती है। बंगाली नया साल ‘‘पोहेला बैसाखी  या  अप्रैल को आता है। पश्चिम बंगाल और बांग्लादेश में इसी दिन नया साल होता है। हिन्दुओं का नया साल चैत्र नव रात्रि के प्रथम दिन यानि गुडी पड़वा के दिन मनाया जाता है । मान्यता है कि नव संवत्सर प्रारंभ होने के दिन पवन परीक्षा से वर्ष के शुभशुभ फल का ज्ञान भी होता है। इसके लिए एक लंबे बांस (डण्डे) में नवीन वस्त्र से बनी लंबी पताका को किसी उंची वायु की रोक से रहित शिखर या वृक्ष की चोटी से बांधकर ध्वज का पूजन करना चाहिएइसके बाद ध्वज के उड़ने से दिशा का निश्चय करें कि वायु किस दिशा को जा रही है। वायु का फल इस प्रकार हैं…. पूर्व की ओर: धन, उन्नति ,अग्निकोण : धन नाश ,दक्षिण : पशुओं का नाश ,नैर्ऋत्य कोण : धान्य हानि, पश्चिम : मेघवृद्धि, वायव्य: स्थिरता, उत्तर : विपुल धान्य , ईशान : धन आगमन ।

खैर अब जमाना ज्योतिष के माध्यम से भविष्य जानने तक सीमित नहीं रह गया है भाग्य से पहले कर्म का स्थान होता जा रहा है तो ऐसे में भले ही आप परंपराओं एवं अपने मन की शांति के लिए कैसे भी टोटके करें या जमा है मगर यह न भूलें कि भाग्य का निर्धारण कर्म से ही होता है इसलिए नव संवत्सर जो राक्षस के नाम से आपके जीवन में आ रहा है और जिसके आते ही आनंद संवत्सर जा रहा है अपने कर्म से आप आनंद को रोकने एवं आने वाले राक्षस को काबू में करने के लिए अपना अच्छा स्वास्थ्य जरूर बनाकर रखें । कोई भी नववर्ष जीवन में हर्ष एवं उमंग का प्रतीक बनकर आता है इसलिए अपनी धार्मिक परंपराओं के साथ कुरीतियों से बचते हुए हर्ष एवं उमंग के साथ आनंद संवत्सरको विदा करें एवं नव संवत्सर राक्षस का स्वागत करें। अपने साथ-साथ अपने इष्ट मित्रों, पड़ोसियों, रिश्तेदारों एवं परिवार के सदस्यों के लिए मंगल कामना करना न भूलें क्योंकि कहा भी गया है कर भला तो हो भला साथ ही साथ अच्छी सोच से आसपास का  माहौल भी अच्छा होता है एवं परिणाम भी अच्छे ही रहते हैं।

लेखक वरिष्ठ साहित्यकार हैं.

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