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माघ मेले का समाजशास्त्र

– सारांश कनौजिया

हिन्दू धर्म में प्रत्येक मान्तया या प्रथा का कोई न कोई वैज्ञानिक या सामाजिक महत्व होता है। समय के साथ हम कई मान्यताओं के पीछे उसके वास्तविक उद्देश्य को भूल गए हैं। सिर्फ लोक कथाओं में उनके साथ जुड़ी बाते ही याद रह गयीं हैं। ग्लोबल वार्मिंग के कारण अब मौसम में कई बदलाव हुए हैं। ऋतुएं अपने नियमित समय पर नहीं आ रही हैं। किंतु पहले ऐसा नहीं था। वास्तव में माघ माह से मौसम में बदलाव शुरु हो जाता है। सर्दी में कमी आती है और हम गर्मी की ओर आगे बढ़ने लगते हैं। माघ माह में स्नान, दान और तप का विशेष महत्व होता है। माघ मेला इसकी शुरुआत होती है।

हिन्दू मान्यताओं के अनुसार कोई भी शुभ कार्य स्नान के बाद ही शुरु करना चाहिए। यह बात वैज्ञानिकों और स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने भी मानी है कि स्नान करने के बाद शरीर में नई ऊर्जा का संचार होता है। हमारी नदियां जैसे गंगा बहुत से गुणों को समेटे हुए है। यदि हम नदी में स्नान करते हैं, तो इससे कई शारीरिक समस्याएं भी दूर हो जाती हैं। लोगों के साथ आने, एक लक्ष्य के लिये जुटने से हमारा सामाजिक ताना-बाना मजबूत होता है। बाकी दो बातें हैं तप और दान, जिनकी शुरुआत भी माघ मेले से होती है, हमारे समाज में उनका भी बहुत महत्व है।

दान करने की प्रथा उन लोगों के लिये बहुत लाभदायक है, जिनको किसी प्रकार की कोई समस्या होती है। सामान्यतः माघ मेले में खाद्य पदार्थों को दान दिया जाता है। अब समय के साथ इनका स्वरुप बदला है, लेकिन खाद्य पदार्थों को दान देने से या लोगों को भोजन खिलाने से समाज में कोई भी भूखा न रहे, इसका संदेश जाता है। तप का एक स्वरुप मेडिटेशन है। आज के तनाव वाले समय में लोग लाखों रुपये खर्च कर मेडिटेशन करवाते हैं।

हम घर पर ही तप और दान कर सकते हैं, फिर माघ मेले की क्या आवश्यकता? यह प्रश्न हमारे मन में आ सकता है। इसके एक पहलु का उत्तर हम लेख में दे चुके हैं अर्थात नदियों में स्नान का महत्व। अब नदियां मैली हो गई हैं, लेकिन माघ मेले के लिये विशेष रुप से नदियों का जल साफ किया जाता है। इससे जहां नदी में स्नान का लाभ मनुष्यों को मिलता है, तो वहीं जलचर जीवों को भी नदियां साफ होने से एक नया जीवन मिलता है। हिन्दू धर्म की मान्यता के अनुसार प्रकृति में संतुलन के लिये सभी का अस्तित्व आवश्यक है।

तप के लिये आध्यात्मिक वातावरण आवश्यक है। कई बार इस वातावरण के लिये लोग मंदिरों के दर्शन करने जाते हैं। ऐसा ही वातावरण माघ मेले में बनता है। साधु-सन्यासियों के बड़ी संख्या में आने से हमें उनके दर्शन करने, उनके आध्यात्मिक ज्ञान से लाभ उठाने का अवसर प्राप्त होता है। इस वातावरण में प्रभु भक्ति करने का मन अपने आप ही होने लगता है। वैसे भी कहा गया है कि गुरु की सहायता से ही ईश्वर तक सरलता से पहुंचा जा सकता है। संतों की संगत भी अपना महत्व है। हिन्दू धर्म में 3 करोड़ देवी-देवता हैं। सभी को अपनी पूजा पद्धति चुनने की स्वतंत्रता है। किंतु दूसरे के अराध्य देवी-देवता का सम्मान करना भी अनिवार्य किया गया है। यही कारण है कि हमें माघ मेले के माध्यम से आध्यात्मिक विविधता में एकता के दर्शन हो सकते हैं। माघ मेले में विभिन्न देवी-देवताओं और पूजा पद्धति में आस्था रखने वाले लोगों से भेंट होती है और उनके बारे में जानने व समझने का अवसर मिलता है।

हमने जब भी एकजुट होकर कोई कार्य किया है। हमारे समाज को सफलता प्राप्त हुई है। अपनी मान्यताओं के साथ दूसरे के विचारों का सम्मान करते हुए किस प्रकार समाजहित का ध्यान रखते हुए आगे बढ़ा जा सकता है? यह बात माघ मेले से सिखी जा सकती है।

लेखक मातृभूमि समाचार के संपादक हैं।

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