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चीन देगा तालिबान की सरकार को मान्यता

बीजिंग (मा.स.स.). अफगानिस्तान में तालिबान की बढ़ती हूकुमत से चीन में काफी खुशी देखी जा रही है। इस खूंखार आतंकी समूह के कंधे पर बंदूक रख चीन अपने हितों को साधने की कोशिश में जुटा है। कुछ दिन पहले ही चीन ने तालिबान के कुछ प्रमुख राजनीतिक नेताओं को शांति वार्ता की आड़ में पेइचिंग आमंत्रित किया था। इस दौरान चीन ने तालिबान के साथ एक डील भी की। जिसमें तालिबान शिनजियांग प्रांत में इस्लामिक आतंकी संगठनों को सहयोग बंद करेगा, बदले में चीन अफगानिस्तान में इस आतंकी संगठन को मान्यता दे सकता है।

चीन का प्रचार तंत्र इन दिनों तेजी से अफगानिस्तान में संभावित परिदृश्य को स्वीकार करने के लिए माहौल बना रहा है। चीन में सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म वीवो और वीचैट पर सरकारी अधिकारी तेजी से लोगों को यह बता रहे हैं कि वर्तमान हालात को देखते हुए हमें अफगानिस्तान में तालिबान के कट्टर इस्लामिक आंदोलन को एक वैध शासन के रूप में मान्यता देनी पड़ सकती है। चीन की विदेश नीति की सोच से परिचित एक प्रभावशाली सोशल मीडिया कमेंटेटर ने गुरुवार को लिखा कि तालिबान आतंकी अगर वे पूरे देश को नियंत्रित नहीं कर सकते हैं, तब भी वे एक महत्वपूर्ण ताकत होंगे। शुक्रवार को चीन की सरकारी मीडिया ग्लोबल टाइम्स ने अफगानिस्तान के विपक्षी दल के एक नेता का इंटरव्यू प्रकाशित किया था। जिसमें कहा गया था कि खतरे में पड़ी अफगान सरकार में तालिबान को शामिल करना चाहिए।

अफगानिस्तान से अमेरिकी सैनिकों की वापसी के बाद से तालिबान की बढ़ती हिंसा को लेकर चीन की नीति अजीब बताई जा रही है। कुछ दिनों पहले तक चीन अपने पश्चिमी प्रांत शिनजियांग में इस्लामिक आतंकवाद के लिए तालिबान को दोषी ठहराता था। चीन लंबे समय से यह भी कहता आया है कि तालिबान-नियंत्रित क्षेत्र का इस्तेमाल शिनजियांग के अलगाववादी ताकतों को शरण देने के लिए किया जाता है। इसके बावजूद तालिबान की सरकार को मान्यता देने और उसे आमंत्रित कर बातचीत करने की कोशिश समझ से परे है। इस बीच चीन ने शिनजियांग की सुरक्षा को कड़ा कर दिया है। अफगानिस्तान से लगने वाली सीमा पर सुरक्षा को बढ़ाने के लिए अधिक संख्या में सैनिकों की तैनाती की गई है। संयुक्त राष्ट्र के विशेषज्ञों और अधिकार समूहों का अनुमान है कि कम से कम दस लाख उइगुर मुस्लिम इस समय चीन के डिटेंशन कैंप में कैद हैं। इस्लामिक आतंकवाद और अलगाववाद पर काबू करने के लिए बनाए गए इन कैंप को चीन व्यवसायिक प्रशिक्षण शिविर का नाम देता है।

तालिबान जब 1996 से 2001 के बीच अफगानिस्तान में सत्ता में था, तब चीन ने उससे सारे राजयनिक संबंध तोड़ लिए थे। 1993 में अफगानिस्तान में शुरू हुए गृहयुद्ध के बाद ही चीन ने अपने दूतावास को बंद कर सभी राजनयिकों को वापस बुला लिया था। इसके बावजूद चीन तालिबान की मदद से अपने यहां के अलगाववादियों को काबू करना चाहता है। शंघाई के फुडन यूनिवर्सिटी के दक्षिण एशिया विशेषज्ञ लिन मिनवांग ने कहा कि हम व्यावहारिक हैं। आप अपने देश पर कैसे शासन करना चाहते हैं, यह काफी हद तक आपका अपना व्यवसाय है, बस इसे चीन को प्रभावित न करने दें। जब चीन जैसी बड़ी एशियाई ताकत तालिबान से इतनी खुलकर मुलाकात करके दिखाती है कि वह तालिबान की राजनीतिक वैधता को पहचानती है, तो यह तालिबान को एक बड़ी कूटनीतिक जीत दिला रहा है।

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