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संकटकाल में सीबीएसई की परीक्षाओं पर समय रहते सही निर्णय

– सारांश कनौजिया

मोदी सरकार ने सीबीएसई की बोर्ड परीक्षाओं पर समय रहते सही निर्णय लिया है। केंद्रीय शिक्षा मंत्री डॉ. रमेश पोखरियाल निशंक ने जो जानकारी दी, उसके अनुसार 10वीं की परीक्षाएं निरस्तर हो गयी हैं, वहीं 12वीं की परीक्षाओं को 15 जून तक के लिये स्थगित कर दिया गया है। क्योंकि केंद्र सरकार 1 जून को सीबीएसई की 12वीं की परीक्षा पर निर्णय के लिए बैठक करेगी और इन परीक्षार्थियों की तैयारी के लिए कम से कम 15 दिन का समय दिया जायेगा। यदि भारत सरकार 1 जून को परीक्षा कराने का निर्णय लेती है, तो भी परीक्षाओं की तिथि 15 जून के बाद की ही होगी।

कुछ विपक्षी दलों के नेताओं ने इस निर्णय पर प्रश्नचिन्ह लगाते हुए 12वीं की परीक्षाओं को भी निरस्त करने की मांग की है। मेरा मानना है कि यह निर्णय अंतिम और कोई भी विकल्प न होने पर ही लिया जाना चाहिए। इसलिए मुझे वर्तमान निर्णय ठीक लगता है और मेरा विचार है कि जिन प्रदेशों ने अपने यहां बोर्ड परीक्षाएं स्थगित या निरस्त नहीं किया है, उन्हें भी इसी प्रकार का निर्णय लेना चाहिए। 10 वीं व 12वीं उत्तीर्ण विद्यार्थियों के लिए आयोजित होने वाली सभी परीक्षाओं को भी अगस्त तक के लिए स्थगित कर देना चाहिए।

कल हुई घोषणा के अनुसार सीबीएसई की 10वीं की परीक्षाओं में आंतरिक मूल्यांकन के आधार पर परिणाम घोषित किया जायेगा। यदि कोई विद्यार्थी इस मूल्यांकन से संतुष्ट नहीं है, तो वह लिखित परीक्षा दे सकता है। अभी इस लिखित परीक्षा के लिये तिथियों की घोषणा नहीं की गई है, पर मुझे लगता है कि जब कभी भी 12वीं की परीक्षा आयोजित हो, 10वीं के इच्छुक विद्यार्थियों की परीक्षा भी करवा लेनी चाहिए। इससे 10वीं के सभी विद्यार्थियों को एक साथ 11वीं में प्रवेश मिलना सरल रहेगा। अगला सत्र 1 अगस्त से पूर्व शुरु नहीं किया जाना चाहिए। इससे लिखित परीक्षा देने वाले विद्यार्थियों के भी परिणाम घोषित कर उन्हें भी 11वीं में प्रवेश प्रतिस्पर्धा में शामिल किया जा सकेगा।

जहां तक 12वीं कक्षा की परीक्षाओं का प्रश्न है, तो प्रियंका गांधी, मनीष सिसोदिया सहित कई विपक्षी नेताओं का कहना है कि इन्हें भी निरस्त किया जाना चाहिए। लेकिन मेरा मानना है कि व्यवहारिक रुप से यह सही नहीं होगा। 12वीं की परीक्षा परिणामों के आधार पर विश्वविद्यालयों में प्रवेश मिलता है। तकनीकि पाठ्यक्रमों में प्रवेश के लिये भी 12वीं के अंक महत्वपूर्ण होते हैं। कई प्रतियोगी परीक्षाओं में भी 12वीं के अंक का महत्व अधिक होता है। कुल मिलाकर यह कहा जा सकता है कि 12वीं की अंकतालिका का हमारे भविष्य निर्धारण में महत्वपूर्ण स्थान होता है। यदि बिना लिखित परीक्षा के उत्तीर्ण कर दिया गया, तो भविष्य में जब कभी भी नौकरी या किसी अच्छे शैक्षणिक संस्थान में प्रवेश की बात आयेगी, तो संभव है कि इन विद्यार्थियों को बेहतर अवसर न मिले।

कुछ लोगों का तर्क है कि ऑनलाइन परीक्षाएं करवाकर 12वीं के परिणाम घोषित किये जा सकते हैं। कोरोना काल में पिछले 1 वर्ष से ऑनलाइन पढ़ाई चल रही है। इसमें कई विद्यार्थियों को अच्छा इंटरनेट न होने या फिर अत्याधुनिक मोबाइल अथवा लैपटाप न होने के कारण दिक्कत हो रही है। ऑनलाइन परीक्षा के समय भी इस प्रकार की दिक्कत होगी। उस समय 1-1 मिनट बहुत महत्वपूर्ण होता है। ऐसे में ऑनलाइन परीक्षा अधिक व्यवहारिक नहीं होगी। इसके अतिरिक्त ऑनलाइन परीक्षा में यदि दीर्घ उत्तरीय प्रश्न पूछे जाते हैं, तो बच्चे किस प्रकार उनके उत्तर दे पायेंगे, उसके लिये क्या व्यवस्था होगी? बहुत सी समस्याएं हैं।

फिर भी मेरा मानना है कि यदि जून में भी 12वीं की लिखित परीक्षाएं संभव नहीं होती, तो ऑनलाइन परीक्षाओं के विकल्प पर विचार किया जा सकता है। जिन विद्यार्थियों के लिये ऑनलाइन परीक्षाएं दे पाना संभव नहीं हो पाता। उन्हें दुबारा लिखित परीक्षाओं का विकल्प देना होगा। क्योंकि अति लघु उत्तरीय या बहुविकल्पीय उत्तर वाले प्रश्न ऑनलाइन परीक्षा के लिये अधिक उपयुक्त होते हैं, किंतु लघु और दीर्घ उत्तरीय प्रश्नों के लिये लिखित परीक्षा ही सर्वोत्तम है। जो व्यक्ति अपने भविष्य का निर्धारण करने जा रहा है, उसे सर्वोत्तम प्रक्रिया से ही गुजरना उपयुक्त होता है।

मैं दूसरे विकल्प के रुप में भी 12वीं की परीक्षाओं को निरस्त करने का समर्थक नहीं हूँ। इसका कारण समझने के लिये हमें उदाहरण स्वरुप दिल्ली के विश्वविद्यालयों की प्रवेश प्रक्रिया को समझना होगा। यहां 1 नंबर अधिक या कम होना भी आपके प्रवेश मिलने की संभावना का निर्धारण कर देता है। ऐसे में यदि 12वीं की परीक्षाएं निरस्त कर आंतरिक मूल्यांकन के आधार पर सभी को उत्तीर्ण किया गया, तो हो सकता है कि अधिक प्रतिभावान और कम प्रतिभावान दोनों के अंक समान हों और अधिक योग्य विद्यार्थी को अच्छे शैक्षणिक संस्थान में प्रवेश न मिल पाए। यही समस्या भविष्य में नौकरी के समय भी सामने आ सकती है।

यदि कोई विकल्प नहीं रहता है और वर्तमान कोरोना की स्थिति या फिर से भी हालात और खराब हो जाते हैं, फिर तो जान बचाने के लिये 12वीं की परीक्षाओं को भी निरस्त करना ही होगा। किंतु इस पर अभी से राजनीति करना देश के भविष्य बच्चों को धोखा देना होगा, उन्हें भ्रमित करना होगा। हम सभी को ऐसा होने से रोकना चाहिए।

लेखक मातृभूमि समाचार के संपादक हैं।

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