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राजस्थान में मंत्रिमंडल विस्तार पर मची रार

– रमेश सर्राफ धमोरा

राजस्थान की राजनीति में इन दिनों सत्तारूढ़ कांग्रेस में मंत्रीमंडल विस्तार को लेकर पार्टी के नेताओं में आपस मे ही रार मची हुयी है। गत वर्ष सचिन पायलट ने अपने समर्थक 19 कांग्रेसी विधायकों को लेकर मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के खिलाफ खुली बगावत कर दी थी। स्थिति यहां तक बिगड़ गई थी कि पायलट अपने समर्थक विधायकों को लेकर राजस्थान सीमा के बाहर हरियाणा में गुड़गांव के एक होटल में जाकर ठहरे थे। उसी दौरान कांग्रेस आलाकमान ने सचिन पायलट को उपमुख्यमंत्री व प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष पद से तथा उनके समर्थक रमेश मीणा व महाराजा विश्वेंद्र सिंह को कैबिनेट मंत्री पद से बर्खास्त कर दिया था। करीब एक महीने की उठापटक के बाद अंततः केंद्रीय आलाकमान के हस्तक्षेप करने से पायलट समर्थको को सत्ता व संगठन में पूरी भागीदारी देने के वायदे के साथ उस बगावत का पटाक्षेप करवाया गया था।

उस समय कांग्रेस की कार्यकारी अध्यक्ष सोनिया गांधी ने तीन बड़े केन्द्रीय नेताओं की एक कमेटी बनाई थी। जिसमें अहमद पटेल, कांग्रेस संगठन महासचिव केसी वेणुगोपाल व राजस्थान प्रभारी महासचिव अजय माकन को शामिल किया गया था। उक्त कमेटी को शीघ्र ही मुख्यमंत्री अशोक गहलोत व सचिन पायलट की बातें सुनकर उनका समाधान करवा कर दोनों पक्षों को संतुष्ट करना था। मगर कमेटी की आज तक एक भी बैठक नहीं हो पाई है। इसी दौरान वरिष्ठ नेता अहमद पटेल का निधन हो गया। उसके बाद कमेटी में बचे केसी वेणुगोपाल व अजय माकन ने कोई बैठक नहीं की और ना ही दोनों पक्षों की बातें सुनकर सोनिया गांधी को रिपोर्ट दी।

केंद्र द्वारा बनायी गयी सुलह कमेटी की अभी तक बैठक नहीं होने के कारण सचिन पायलट की बातों पर कोई कार्यवाही नहीं हो पायी है। इसी दौरान मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने अपने कुछ चहेते नेताओं व सेवानिवृत्त अधिकारियों को विभिन्न निगमों, बोर्डों व आयोगों में नियुक्त कर दिया हैं। इससे पायलट समर्थकों में और भी अधिक रोष व्याप्त हो रहा है। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता रहे जितिन प्रसाद के पार्टी छोड़कर भाजपा में जाने के बाद सचिन पायलट समर्थक विधायकों ने भी पायलट समर्थकों को मंत्री बनाने के लिए दबाव बनाना शुरू कर दिया है। विभिन्न अवसरों पर पायलट समर्थक मुखर होकर मुख्यमंत्री गहलोत के खिलाफ बोल रहे हैं। जितिन प्रसाद के जाने के बाद पायलट की नाराजगी को देखते हुए कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी ने सचिन पायलट को बात करने के लिए दिल्ली बुलाया है। हालांकि अभी सचिन पायलट की प्रियंका गांधी से बात नहीं हो पायी है। लेकिन पायलट समर्थकों को लगता है कि प्रियंका गांधी उनकी बातें सुनकर सही समाधान करवाएगी।

उधर मुख्यमंत्री अशोक गहलोत मौजूदा परिस्थितियों में किसी भी सूरत में मंत्रिमंडल का विस्तार व पुनर्गठन नहीं करना चाहते हैं। वह लगातार किसी न किसी बहाने मंत्रिमंडल के विस्तार को टालते जा रहे हैं। एक दिन पूर्व ही मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने चिकित्सकों के हवाले से बयान जारी किया है कि पोस्ट कोविड समस्याओं को देखते हुए वो आगामी दो माह तक किसी भी व्यक्ति से व्यक्तिगत मुलाकात नहीं करेंगे। वैसे भी गहलोत पिछले सवा साल में अपने आवास से बहुत कम बाहर निकले हैं। मुख्यमंत्री अपने आवास से ही लगातार वीडियो कांफ्रेंसिंग के माध्यम से मीटिंग ले रहे हैं। वर्चुअल माध्यम से ही लोगों से मिल रहे हैं व विभिन्न योजनाओं का लोकार्पण कर रहे हैं। दो माह पूर्व प्रदेश में संपन्न हुए तीन विधानसभा सीटों के उपचुनाव के दौरान जरूर मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने कुछ चुनावी मीटिंगो को संबोधित किया था। उसके अलावा अधिकांश समय अपने सरकारी आवास तक ही सिमटे हुए हैं। बहुत से विधायक व्यक्तिगत मिलकर बात करना चाहते हैं। मगर उनको समय नहीं मिल रहा है। इससे उनके मन में भी मुख्यमंत्री के प्रति नाराजगी के भाव पनप रहे हैं।

चर्चा है कि यदि कोरोना के कारण लगे लाकडाउन को पूरी तरह हटा लिया जाता है तो प्रदेश के बाकी बचे बारह जिलों में भी पंचायती राज संस्थाओं के चुनाव की घोषणा की जा सकती है। जिस कारण आचार संहिता लगने से एक बार फिर मंत्रिमंडल का विस्तार टल सकता है। पिछले एक वर्ष से मंत्रिमंडल विस्तार टलने से गहलोत समर्थक उन विधायकों में भी नाराजगी व्याप्त हो रही है जिनको मंत्री बनने की पूरी आस है। जिन्होंने सचिन पायलट की बगावत के समय खुलकर गहलोत का साथ दिया था। बसपा से कांग्रेस में शामिल हुए सभी छह विधायक भी मुख्यमंत्री के टालू रवैये की वजह से असंतुष्ट नजर आ रहे हैं। बसपा से कांग्रेस में आए उदयपुरवाटी विधायक व पूर्व मंत्री राजेंद्र सिंह गुढ़ा ने तो खुलकर कह दिया है कि यदि सचिन पायलट की बगावत के समय हम बसपा से आए छः विधायक व दस निर्दलीय विधायक गहलोत सरकार का साथ नहीं देते तो सरकार कभी की गिर जाती और अगले महीने सरकार की गिरने की पहली बरसी मनाई जाती। हम लोगों ने मुख्यमंत्री का पूरी मजबूती के साथ साथ दिया है और आज भी हम लोग पूरी तरह मुख्यमंत्री गहलोत के साथ हैं। मगर सब्र की एक सीमा होती है। सरकार का आधा कार्यकाल बीत चुका है। मंत्रिमंडल में नौ पद खाली पड़ें है। समय बीत जाने के बाद मंत्री बनने का क्या मतलब रह जाता हैं।

इसी तरह बसपा के संदीप यादव, जोगेन्द्र सिंह अवाना सहित अन्य तीन विधायकों ने भी उनके कांग्रेस में शामिल होते वक्त किए गए वादे को शिघ्र पूरा करने की मांग की है। बसपा से आए विधायकों का कहना है कि राजस्थान में कांग्रेस के पास मात्र 99 विधायक थे। सरकार के पास बहुमत नहीं था। हम 6 विधायकों के शामिल होने से सरकार पूर्ण बहुमत में आ पाई थी। उस समय हमारे कुछ विधायकों को मंत्री व कुछ को विभिन्न बोर्ड, निगम का अघ्यक्ष बनाकर मंत्री स्तर का दर्जा देने की बात कही गई थी। जिसे आज तक पूरा नहीं किया गया है। पूर्व मंत्री भरतसिंह लगातार खान मंत्री प्रमोद जैन को भ्रष्टाचार के करण हटाने की मांग कर रहे हैं। केबीनेट मिटिंग में मुख्यमंत्री के सामने दो मंत्रियों शान्ति धारीवाल व गोविन्द सिंह डोटासरा की लड़ाई से पार्टी को शर्मसार होना पड़ा था। पायलट गुट के विधायक भी मुखरता के साथ गहलोत का विरोध कर रहे हैं। कांग्रेस के सबसे वरिष्ठ विधायक हेमाराम ने तो अपने क्षेत्र में विकास कार्य नहीं होने की बात पर विधानसभा अध्यक्ष को अपना त्यागपत्र भी भेज रखा है।

पायलट समर्थक पूर्व विधानसभा अध्यक्ष दीपेंद्र सिंह शेखावत, पूर्व मंत्री बृजेंद्र ओला, वेद प्रकाश सोलंकी, इंद्राज गुर्जर, हरीश मीणा सहित अन्य कई विधायक भी समय-समय पर सरकार पर निशाना साध रहें हैं। इनका आरोप है कि सचिन पायलट के साथ होने के कारण उनके क्षेत्र में विकास कार्य नहीं हो पा रहे हैं। पूर्व पुलिस महानिदेशक व वरिष्ठ विधायक हरीश मीणा ने हाल ही में कहा है कि हम पायलट समर्थक होने के साथ ही कांग्रेसी भी हैं। फिर हमारे क्षेत्र में विकास काम करवाने में भेदभाव क्यों बरता जा रहा है। यदि समय रहते कांग्रेस आलाकमान राजस्थान प्रकरण को नहीं सुलझा पाएगा तो आने वाला समय कांग्रेस के लिए चुनौतियों भरा हो सकता है। जिसका जिम्मेदार कांग्रेस आलाकमान ही होगा।

लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं.

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