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हिन्दू विरोधी डीएमके भी चली हिंदुत्व की राह पर

– सारांश कनौजिया

कौन सच्चा हिन्दू है। यह बताने का प्रयास कांग्रेस 2014 के बाद से लगातार करती रही है। पश्चिम बंगाल के चुनाव में टीएमसी प्रमुख ममता बनर्जी का चुनावी चंडी पाठ भी इसी तरह का प्रयास है। इन सबके बीच ऐसा लगता है कि डीएमके जिसे हिन्दी और हिन्दुत्व की बात करने से भी दिक्कत होती थी, अब वह भी स्वयं को सच्चा हिन्दू हितैषी बताने का प्रयास करना शुरु कर चुकी है। जबकि उसका इतिहास खुलेआम हिन्दुओं के विरोध का रहा है।

इस बात को और समझने के लिये डीएमके की स्थापना और उसके उद्देश्यों को समझना होगा। स्वतंत्रता के पूर्व अंग्रेजों ने हिन्दू समाज को बांटने के लिये आर्य-द्रविड़ सिद्धांत दिया। उन्होंने बताया कि आर्य बाहर से आये थे और उन्होंने भारत के मूल निवासी द्रविड़ों पर अत्याचार कर कब्जा कर लिया। आर्यों ने भारत में आकर हिन्दू संस्कृति की स्थापना की और द्रविड़ों की परंपराओं का दमन। उस समय अहिंसा के पुजारी के रुप में विख्यात महात्मा गांधी ने खुलकर कभी इस सिद्धांत के विरोध में कोई आंदोलन नहीं चलाया। इसके उलट महात्मा गांधी बार-बार यह ध्यान दिलाने का प्रयास करते थे कि हिन्दुओं ने दलितों पर बहुत अत्याचार किये, उनके साथ न्याय नहीं किया। इस कारण 1947 से पहले ही हिन्दू परंपराओं के प्रति घृणा का भाव कुछ लोगों के मन में उत्पन्न होने लगा था। इसी भावना ने 1949 में द्रविड़ मुन्नेत्र कड़गम (डीएमके) पार्टी की नींव रखी।

डीएमके के संस्थापक पेरियार थे। इरोड वेंकट नायकर रामासामी जो पेरियार (सम्मानित व्यक्ति) के नाम से विख्यात हुये, उन्होंने द्रविड़ों के हितों की रक्षा के लिये डीएमके का गठन किया। उनके नाम में रामा जरुर था, लेकिन वो राम को नहीं मानते थे। इन्होंने पहले जस्टिस पार्टी के प्रमुख की जिम्मेदारी भी संभाली थी, जिसका उद्देश्य हिन्दुओं का विरोध था। बाद में कुछ मतभेदों के कारण अलग डीएमके बना ली। कुछ लोगों का मानना है कि जस्टिस पार्टी को ही डीएमके नाम दे दिया गया। पेरियार के हिन्दू विरोध के कारण स्वयं उनके पिता ने ही उन्हें सबके सामने पीटा था, लेकिन इससे उनका विचार नहीं बदला, बल्कि हिन्दू विरोध और प्रखर हो गया। वे जस्टिस पार्टी में जाने से पहले कुछ समय तक कांग्रेस में भी रहे। उन्होंने कांग्रेस में दलितों को आरक्षण के लिये प्रस्ताव रखा। जिसे गांधी जी सहित किसी का समर्थन नहीं मिला। इससे नाराज होकर पेरियार ने कांग्रेस छोड़कर अलग राह पकड़ ली।

पेरियार स्वयं को नास्तिक मानते थे। यही कारण है कि उनकी पार्टी के लोगों की मंदिरों में कभी आस्था नहीं रही। ऐसी डीएमके यदि मंदिर के पक्ष में कोई बात कहे या फिर उसके नेता मंदिर जाते हुये देखे जायें, तो आश्चर्य होना स्वभाविक है। तमिलनाडु में विधानसभा चुनाव हैं। भाजपा इस बार गठबंधन बनाकर मैदान में है। पार्टी के नेता हमेशा लो तरह यहाँ भी मंदिरों को अधिक महत्व दे रहे हैं। अधिकांश भाजपा नेता मंदिरों में पूजन करके ही अपने कार्य प्रारंभ करते हैं। इसका असर डीएमके पर भी देखने को मिल रहा है।

पेरियार की डीएमके अब स्टालिन के हाथ में है। एम के स्टालिन का नाम सोवियत संघ की कम्यूनिस्ट पार्टी के महासचिव रहे स्टालिन के नाम पर रखा गया था, जो एक इसाई थे। इसके बाद भी इस बार डीएमके ने जो घोषणा पत्र जारी किया है, उसमें हिन्दू मंदिरों की ताीर्थ यात्रा पर जाने वाले 1 लाख लोगों को 25,000 रुपये तक की आर्थिक सहायता देने का वादा किया गया है। इसके अतिरिक्त यदि डीएमके तमिलनाडु की सत्ता में आयी, तो वो मंदिरों के रखरखाव पर 1000 करोड़़ रुपये खर्च करेगी। डीएमके के कुछ नेता मंदिरों के दर्शन करते हुये भी देखे गये। मंदिरों के प्रति डीएमके की इतनी श्रद्धा, उसकी स्थापना से लेकर आजतक शायद ही कभी देखी गयी होगी।

द्रविड़ आंदोलनों के नाम पर हिन्दुत्व का विरोध तमिलनाडु के लिये नया नहीं है। यही कारण है कि यहां हिन्दी भाषा का भी विरोध होता रहा है। डीएमके ने भले ही चुनाव जीतने के लिये हिन्दू मंदिरों व हिन्दुओं के लिये घोषणा की है, लेकिन अब उन्हें भी समझ में आ गया है कि यदि सत्ता चाहिए, तो हिन्दू हित की बात करनी ही पड़ेगी। इसका एक अर्थ यह भी है कि तमिलनाडु की जनता का मानस अब बदला है। पेरियार का नास्तिक तमिलनाडु अब हिन्दुत्व में आस्था रखने वाला प्रदेश बनने जा रहा है या फिर संभवतः बहुत हद तक बन चुका है। यह क्रम इसी प्रकार चलते रहना चाहिए।

लेखक मातृभूमि समाचार के संपादक हैं।

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