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भारत पाकिस्तान से वार्ता करे, लेकिन गुलाम कश्मीर पर

– सारांश कनौजिया

पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान ने एक बार फिर कहा है कि वो भारत के साथ कश्मीर पर बात करना चाहते हैं। उनके शांति के प्रयास भारत की उदासीनता के कारण आगे नहीं बढ़ पा रहे हैं। मैं भी चाहता हूं कि भारत पाकिस्तान एक मेज पर कश्मीर की चर्चा के लिये बैठें, लेकिन विषय गुलाम कश्मीर होना चाहिए। पाकिस्तान के अनाधिकृत कब्जे के कारण विवादित क्षेत्र पीओके है, न की जम्मू-कश्मीर और लद्दाख। इसलिये बात भी उसी पर होनी चाहिए।

हम पीओके को विवादित क्यों कह रहे हैं, यह समझने के लिये 1947-48 की घटनाओं का स्मरण करना होगा। अंग्रेजों और गांधी जी के नेतृत्व में कांग्रेस ने जो हिस्सा जिन्ना को पाकिस्तान बनाने के लिये दिया था, उसमें जम्मू-कश्मीर नहीं था। पाकिस्तान की सीमा तो तय कर दी गयी थी, लेकिन भारत के और अधिक टुकड़े करने की मंशा से उसे अपनी सीमा तय करने के लिये तत्कालीन रियासतों के भरोसे छोड़ दिया गया था। ऐसी ही एक रियासत थी, जम्मू-कश्मीर। पं. जवाहरलाल नेहरु की विशेष रुचि के कारण इसका विलय समय पर भारत में नहीं हो सका। पाकिस्तान ने हमला कर दिया, तो सरदार पटेल ने सेना भेजकर पाकिस्तान का मुकाबला करना चाहा, लेकिन पं. नेहरु ने इसे अपनी शान के खिलाफ मानते हुये युद्ध विराम का निर्णय सुना दिया। संसद ने पाकिस्तान को दिये जाने वाले करोड़ों रुपये रोकना चाहा, तो गांधी जी के दबाव में ऐसा नहीं हो सका। इसके कारण उत्साहित पाकिस्तान के पास जम्मू-कश्मीर का एक बड़ा भाग चला गया।

पाकिस्तान का कहना है कि जम्मू-कश्मीर के मुस्लिम बाहुल्य राज्य होने के कारण इसका विलय उसके साथ होना चाहिए था। किंतु 14 अगस्त 1947 को जब पाकिस्तान स्वतंत्र हुआ, उस समय जिस प्रस्ताव पर हस्ताक्षर हुये थे, उसमें कहीं भी जम्मू-कश्मीर के पाकिस्तान में विलय का जिक्र नहीं था। यह निर्णय जम्मू-कश्मीर के राजा हरिसिंह पर छोड़ा गया था, जिन्होंने बाद में आरएसएस के द्वितीय सरसंघचालक गुरु जी के समझाने पर भारत के साथ विलय की स्वीकृति प्रदान की थी। ऐसे में जिस भूभाग पर अभी भारतीय संविधान लागू है, उसे बार-बार विवादित बताकर बात करने का प्रस्ताव देना इमरान खान की साजिश है। पाकिस्तान में विपक्ष मजबूत दिखायी दे रहा है। वहां की सेना इस विरोध को चाहकर भी कुचल नहीं पा रही है, क्योंकि ऐसा करने पर पाकिस्तान में फिर से सैन्य शासन जैसी स्थिति बन जायेगी, जो अभी पाकिस्तानी सेना नहीं चाहती है। इमरान खान इस कारण बहुत परेशान हैं। उन्हें समझ में नहीं आ रहा है कि वो करे तो क्या? यही कारण है कि अपनी जनता का ध्यान भटकाने के लिये पहले उन्होंने भारत के साथ युद्धविराम की घोषणा की और अब एक बार फिर जम्मू-कश्मीर पर बात करने का प्रस्ताव देकर शांतिदूत बनने का प्रयास कर रहे हैं। यदि भारत सरकार उनका प्रस्ताव मान लेती है, तो इसे वो अपनी सफलता बताकर घरेलू राजनीति में बढ़त हासिल कर सकते हैं।

भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने पहले कार्यकाल के शुरुआती दिनों में हर संभव प्रयास किया कि पाकिस्तान के साथ अच्छे संबंध बन जाये, लेकिन ऐसा हो न सका। यही कारण है कि उसके बाद से भारत सरकार ने पाकिस्तान को नजरअंदाज करना शुरु कर दिया। इमरान खान के लाख प्रयासों के बाद भी वो भारत को दोबारा बातचीत की मेच पर नहीं ला सके। इसके पीछे का कारण यह है कि जम्मू-कश्मीर व लद्दाख में जो भी समस्याएं हैं, उनके समाधान के लिये वर्तमान भारत सरकार पाकिस्तान को तीसरा पक्ष मानती है। घोषित नीति के अनुसार भारत ने कभी भी जम्मू-कश्मीर में किसी तीसरे पक्ष के हस्तक्षेप को स्वीकार नहीं किया है। यही कारण है कि पाकिस्तान से बात नहीं हो रही है।

इमरान खान ने बातचीत का प्रस्ताव एक बार फिर दिया है। मेरा भारत सरकार से अनुरोध है कि वो भी पाकिस्तानी प्रधानमंत्री को वार्ता का प्रस्ताव भेजें। इस प्रस्ताव में जिन बिंदुओं पर चर्चा हो सकती है, उसकी एक सूची भी साथ में संलग्न कर दें। इस सूची में पीओके, गिलगिट-बलूचिस्तान, पाकिस्तान द्वारा अपने कब्जे से चीन को दिये गये भारतीय भूभाग पर चर्चा करने के लिये कहा जाये। भारतीय गृह मंत्री अमित शाह नई दिल्ली में संसद के अंदर कह चुके हैं कि जब हम जम्मू-कश्मीर और लद्दाख की बात करते हैं, तो उसमें पाकिस्तान और चीन के कब्जे वाले हिस्से की बात भी होती है। अभी तक की सरकारों ने इस विषय को गंभीरता से पाकिस्तान और चीन के सामने नहीं रखा है। अब समय आ गया है कि पाकिस्तान के सामने इस बात को मजबूती से रखा जाये और उससे कब्जा खाली करने के लिये वार्ता हो। चीन से वर्तमान विवाद सुलझाने के बाद भी बात कर सकते हैं। अभी तो इमरान खान के बातचीत के प्रस्ताव का सकारात्मक उत्तर देना जरुरी है।

लेखक मातृभूमि समाचार के संपादक हैं।

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