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सनातन धर्म की ओर आकर्षित हो रहा है विश्व

– प्रहलाद सबनानी

भारत में सनातन धर्म का गौरवशाली इतिहास विश्व में सबसे पुराना माना जाता है। कहते हैं कि लगभग 14,000 विक्रम सम्वत् पूर्व भगवान नील वराह ने अवतार लिया था। नील वराह काल के बाद आदि वराह काल और फिर श्वेत वराह काल हुए। इस काल में भगवान वराह ने धरती पर से जल को हटाया और उसे इंसानों के रहने लायक बनाया था। उसके बाद ब्रह्मा ने इंसानों की जाति का विस्तार किया और शिव ने सम्पूर्ण धरती पर धर्म और न्याय का राज्य क़ायम किया। सभ्यता की शुरुआत यहीं से मानी जाती है। सनातन धर्म की यह कहानी वराह कल्प से ही शुरू होती है। जबकि इससे पहले का इतिहास भी पुराणों में दर्ज है जिसे मुख्य 5 कल्पों के माध्यम से बताया गया है।

यदि भारत के इतने प्राचीन एवं महान सनातन धर्म के इतिहास पर नज़र डालें तो पता चलता है कि हिन्दू संस्कृति एवं सनातन वैदिक ज्ञान वैश्विक आधुनिक विज्ञान का आधार रहा है। इसे कई उदाहरणों के माध्यम से, हिन्दू मान्यताओं एवं धार्मिक ग्रंथों का हवाला देते हुए, समय समय पर सिद्ध किया जा चुका है। इस प्रकार के कुछ उदाहरण इस लेख में भी दिए जा रहे हैं। परंतु, हम लोग अपने ही सनातन धर्म की शिक्षाओं को भूल चुके हैं क्योंकि आधुनिक पश्चिमी समाज एवं उन्हीं के पीछे चलने वाले कुछ प्रचारकों ने सनातन धर्म की शिक्षाओं को पिछड़ा हुआ करार दे दिया था।

भारतीय “गणित विज्ञान” का इतिहास 400 ईसा पूर्व तक जाता है। प्राचीन हिंदू कृतियों में अंकों को दर्शाने के लिए शब्दों का इस्तेमाल किया जाता था। जैसे 2 को भुज कहा जाता था, क्योंकि मनुष्य की दो भुजाएं थीं, पर शब्दों से गणनाएं करना सम्भव नहीं था, अतः गणना की सरलता के लिए संस्कृत भाषा में अंकों को दर्शाने के लिए शब्दों के बजाए 9 चिन्हों से बदल दिया गया। आधुनिक काल की अंक प्रणाली इन्हीं 9 अंक चिन्हों पर आधारित है। विश्व में सभ्यता क्रांति के बाद व्यापार करने के लिए गणनाओं की आवश्यकता थी। इसलिए विश्व ऋणी है आर्यभट का जिन्होंने गणनाओं को सम्पूर्ण करने के लिए शून्य का आविष्कार किया। शून्य के बिना न तो कम्प्यूटर का आविष्कार सम्भव था और न ही आधुनिक काल का अंतरिक्ष विज्ञान। गणना करने की प्रणाली बिना शून्य के सम्भव नहीं थी और ये प्रणाली भारत से अरब व्यापारियों के जरिए पूरे विश्व में फैली।

“खगोल विज्ञान” के सम्बंध में प्राचीन भारतीयों का ज्ञान बहुत उन्नत था। 13वीं सदी का कोणार्क का सूर्य मंदिर इसका महत्वपूर्ण उदाहरण है। मंदिर हिन्दू देवता सूर्य को समर्पित है और सूर्य रथ के रूप में बनाया गया है। रथ के सात घोड़े सात दिनों और 12 पहिए साल के बारह महीनों को इंगित करते हैं। आधुनिक कैलेंडर इन्हीं सिद्धांतों पर आधारित है।

भारत में “धातु विज्ञान” का इतिहास 3000 साल पुराना है। इसका प्रमाण भारत का एक समुदाय “घडिया लोहार” है। ये समुदाय राजस्थान से लेकर मध्य प्रदेश और हिमालय की तलहटी में निवास करता है। इनके लोहे से औज़ारों के निर्माण करने की कला में प्राचीन काल से लेकर अब तक कोई ज़्यादा फर्क नहीं आया है। 10वीं सदी में जब यूरोपीयनों और अरबों के बीच युद्ध हो रहा था तब यूरोपवासियों ने अपनी हार का कारण अरब योद्धाओं की उन्नत तलवार को बताया था जिसके लिए इस्पात बनाने की तकनीक प्राचीन भारत की ही थी।

प्राचीन भारत का “चिकित्सा विज्ञान” बहुत उन्नत था। कुष्ठ रोग का पहिला उल्लेख भारतीय चिकित्सा ग्रंथ सुश्रुत संहिता 6वीं शताब्दी ईसा पूर्व में वर्णित है। हालांकि, द ऑक्सफोर्ड इलस्ट्रेटेड कम्पेनियन टू मेडिसिन में कहा गया है कि कुष्ठ रोग का उल्लेख, साथ ही इसका उपचार, अथर्व-वेद (1500-1200 ईसा पूर्व) में वर्णित किया गया था। जो सुश्रुत संहिता से भी पहिले लिखा गया था। सुश्रुत ने मोतियाबिंद के आपरेशन और प्लास्टिक सर्जरी की पद्धति को सदियों पहिले विकसित कर लिया था। रॉयल आस्ट्रेलिया कॉलेज आफ सर्जन्स में लगी सुश्रुत की प्रतिमा शल्य चिकित्सा में उनके योगदान का प्रमाण है।

हिन्दू मान्यता के अनुसार इस पृथ्वी का निर्माण ब्रह्मा ने किया है और ब्रह्मा के सोने और जागने के क्रम से इस पृथ्वी का निर्माण हुआ। ब्रह्मा के एक बार जागने से सोने तक के समय को कल्प कहा जाता है और इस कल्प का समय 432 करोड़ साल माना जाता है। आधुनिक भू-वैज्ञानियों के अनुसार इस पृथ्वी की आयु भी लगभग इतनी ही है। भारतीय वैदिक ऋचाओं में इन कल्पों की विस्तृत गणना की गई है।

गणित विज्ञान, खगोल विज्ञान, धातु विज्ञान, चिकित्सा विज्ञान एवं पृथ्वी के जीवन सम्बंधी उपरोक्त कुछ उदाहरण मात्र दिए गए हैं जिससे सिद्ध होता है कि सनातन वैदिक ज्ञान कितना विकसित था, जिसके मूल का उपयोग कर आज के आधुनिक विज्ञान के नाम पर पश्चिमी देशों द्वारा वैश्विक स्तर पर फैलाया गया है। दरअसल, सैकड़ों सालों के आक्रमणों और गुलामी ने हमें सिर्फ राजनीतिक रूप से गुलाम ही नहीं बनाया बल्कि मानसिक रूप से भी हम गुलामी की जंजीरों में जकड़े गए। अंग्रेजों के शासन ने हमें हमारी ही संस्कृति के प्रति हीन भावना से भर दिया। जबकि हमारे ही ज्ञान का प्रयोग कर वे संसार भर में विजयी होते रहे और नाम कमाते रहे। अब जरूरत है कि हम अपनी इस सांस्कृतिक धरोहर को जाने और इस पर गर्व करना भी सीखें।

जैसा कि ऊपर वर्णन किया गया है कि सनातन धर्म विश्व में सबसे पुराना धर्म माना जाता है। सनातन धर्म को मानने वाले लोग पूरे विश्व के लगभग सभी भागों में फैले हुए हैं। हाल ही के समय में विश्व की कई महान हस्तियों ने अपने मूल धर्म को छोड़कर या तो सनातन धर्म को अपना लिया है अथवा सनातन धर्म के प्रति अपनी आस्था प्रकट की है। इनमें मुख्य रूप से शामिल हैं फेसबुक के संस्थापक मार्क जुकरबर्ग, एप्पल के संस्थापक स्टीव जोब्स, हॉलीवुड फ़िल्म स्टार सिल्वेस्टर स्टलोन, रशेल ब्राण्ड, ह्यू जैकमेन, पोप स्टार मेडोना, मिली सायरस, हांगकांग के प्रसिद्ध कलाकार जैकी हंग, इंडोनेशिया की मुख्य न्यायाधीश इफा सुदेवी, जावा की राजकुमारी कंजेन रडेन महेंद्रानी, हॉलीवुड की जानीमानी एक्ट्रेस जूलिया राबर्ट्स तो एक फिल्म की शूटिंग के लिए भारत आईं थी। भारत में सनातन धर्म से इतना प्रभावित हुईं थीं कि बाद में उन्होंने सनातन धर्म को ही अपना लिया था। उक्त कुछ नाम केवल उदाहरण के तौर पर दिए गए हैं अन्यथा विश्व में सैकड़ों हस्तियों ने हाल ही में सनातन धर्म को अपना लिया है।

उक्त वर्णित उदाहरण से स्पष्ट तौर पर अब यह कहा जा सकता है कि आज भारत और भारतीयता को प्राथमिकता मिल रही है। भारतीय पद्धति से की गई खोज या नवोन्मेष को या भारतीय पद्धतियों को पूरे विश्व में मान्यता मिलने लगी है। ऐसा लगता है कि पूरी दुनिया पर्यावरण का मित्र बनकर मनुष्य और सृष्टि का एक साथ विकास साधने वाले भारतीय विचार के मूल तत्वों की ओर लौट रही है। अब तो पूरी दुनिया ही एक तरह से भारत की ओर आशा भारी नजरों से देख रही है।

पश्चिमी देशों में दरअसल विकास के लिए औद्योगिकीकरण पर बल दिया गया था और कहा जाता रहा है कि किसी भी कीमत पर विकास चाहिए। पश्चिमी राष्ट्रों में ऐसी मान्यता है कि यदि औद्योगिकीकरण नहीं होगा तो विकास भी नहीं होगा। लेकिन किसी भी कीमत पर विकास की चाहत ने प्रकृति को पूरी तरह से खतरे में डाल दिया है। औद्योगिकीकरण का समर्थन करने वाली विचारधारा में प्रकृति का आदर करने की जगह उसकी उपेक्षा का भाव निहित है। पश्चिमी देशों ने औद्योगिक विकास के नाम पर पर्यावरण पर प्रभुत्व स्थापित करने की कोशिश की। जिसका नतीजा पर्यावरण में हुए भारी नुक़सान के रूप में देखने को मिला है।

पश्चिमी देशों की उक्त विचारधारा के विपरीत भारतीय विचार परंपरा में प्रकृति को भगवान का दर्जा दिया गया है। हम तो ‘क्षिति जल पावक गगन समीरा’ को मानने वाले लोग हैं। हमारी परंपरा में तो नदी, पर्वत और जल को पूजे जाने की परंपरा रही है। भारत में आज  भी परम्परा अनुसार किसी भी शुभ अवसर पर प्रकृति को भी याद किया जाता है। भारतीय ज्ञान परंपरा में जिन औषधियों की चर्चा मिलती है, आज वो अचानक बेहद महत्वपूर्ण हो गई हैं। आज पूरी दुनिया में भारतीय खान-पान की आदतों को लेकर विमर्श हो रहा है। भारत में तो हर मौसम के हिसाब से भोजन तय है। मौसम तो छोड़िए, सूर्यास्त और सूर्योदय के बाद या पहले क्या खाना और क्या नहीं खाना ये भी बताया गया है।

आज पश्चिमी जीवन शैली के भोजन या भोजन पद्धति से इम्यूनिटी बढ़ने की बात समझ में नहीं आ रही है। आज भारतीय पद्धति से भोजन यानि ताजा खाने की वकालत की जा रही है, फ्रिज में रखे तीन दिन पुराने खाने को हानिकारक बताया जा रहा है। कोरोना काल में पूरी दुनिया भारतीय योग विद्या को आशा भरी नजरों से देख रही है। आज जब कोरोना का कोई ज्ञात ट्रीटमेंट नहीं है तो ऐसे में श्वसन प्रणाली को ठीक रखने, जीवन शैली को संतुलित रखने की बात हो रही है। भारत में तो इन चीजों की एक सुदीर्घ परंपरा रही है।

जब कोई संस्कृति और विचारधारा इतनी समृद्धशाली, विवेकशील होगी, उन्नत होगी, क्रांतिकारी होगी तो फिर उस संस्कृति और विचारधारा की स्वत: उन्नति होगी, स्वत: ग्रहण करने की प्रेरणा होगी। आज हम यह निश्चित तौर पर कह सकते हैं कि इन्ही विशेषताओं को लेकर दुनिया भर में सनातन धर्म के प्रति जागरूकता बढ़ी हैं, सनातन धर्म की  विचारधारा को स्वीकार्य करने की क्रियाएं बढ़ी हैं। सनातन धर्म की विचारधारा को, आज जीवन की सुखमय प्रक्रिया को आगे बढ़ाने के लिए, एक प्रेरणा दृष्टि के तौर पर देखा जा रहा है और इसे विश्व में शांति और सदभावना स्थापित करने के लिए एक आवश्यक घटक माना जा रहा है। सनातन धर्म की यह निधि आगे भी बढ़ती ही जायेगी क्योंकि सनातन धर्म वैसे भी दुनिया की सबसे पुरानी जीवन शैली की शक्ति रहा है।

लेखक भारतीय स्टेट बैंक के सेवा निवृत उप-महाप्रबंधक हैं.

नोट : लेख में लेखक द्वारा व्यक्त विचारों से मातृभूमि समाचार का सहमत होना आवश्यक नहीं है।

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