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फिर लौटना तालिबान का !

डॉ घनश्याम बादल

अफगानिस्तान में आखिर वही हुआ जिसकी आशंका थी 20 साल तक सत्ता से बाहर रहने के बाद तालिबानी अफगानिस्तान में काबिज होने मेंकामयाब हो गए हैं । उन्होंने अफगानिस्तान में कट्टर इस्लामिक शासन स्थापित करने का जो संकल्प ले रखा था उसके चलते हुए लगभग 70000 कट्टरतावादी लड़ाके उसने समय के साथ न केवल इकट्ठे किए थे बल्कि उन्हें अत्याधुनिक हथियारों से लैस करने के साथ-साथ युद्ध से संबंधित रणनीतिक कौशल से भी पारंगत कर दिया था । दरअसल तालिबान इस्लाम के कट्टरपंथी वर्ग का वह चेहरा है जो धर्म को आदमी के लिए नहीं बल्कि आदमी को धर्म के लिए मानता है यानी उसके लिए मजहब अधिक महत्वपूर्ण है बजाए आदमी के ।

तालिबान जब 1996 से 2002 तक अफगानिस्तान में सत्ता पर काबिज रहे तब भी उन्होंने वहां पर शरीयत को ही अपने शासन का आधार बनाया था पुरुष लंबी दाढ़ी रखने के लिए बाध्य थे तो महिलाएं अपना सारा शरीर ढक कर रखने के लिए ।  महिलाओं के लिए शिक्षा के दरवाजे यहां तक की मदरसे भी बंद हो गए थे एक तरीके से वेंघरों में नजरबंद होकर रह गई थी ।  उनसे शिक्षा एवं सामाजिक कार्यों में सहभागिता का अधिकार छीन लिया गया था और जो महिला उन शरीयत कानूनों का उल्लंघन करने की जरूरत करती थी उसे सरेआम कोडों से पीटा जाता था । पुरुषों के लिए बीलंबी दाढ़ी रखना तब अनिवार्य हो गया था। फांसी, हाथ पैर काट देनी जैसे बर्बर तरीके वहां अमल में लाए गए थे उस कालखंड में । यदि कोई तालिबान के बनाए कायदों के खिलाफ जाता था तो उसे सरेआम पत्थरों से मारकर खत्म कर दिया जाता था।  लोगों में दहशत पैदा करने के लिए सड़कों पर सरेआम लोगों को फांसी पर लटकाया गया था उस कालखंड में।

एक वह दौर भी था जब अमेरिका द्वारा तालिबान को न केवल नैतिक समर्थन दिया गया हथियार एवं प्रशिक्षण जैसी सुविधाएं भी उपलब्ध कराई गई जिससे तालिबान खत्म होने से बचे रहे। फिर मुल्ला उमर के रूप में उन्हें एक ऐसा नेता मिल गया जिसने स्थानीय दहशतगर्दी को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर खड़े होने का हौसला दिया पेशावर के आसपास उसने मदरसों के माध्यम से मुस्लिम बच्चों के ब्रेनवाश करने का पूरा प्रबंध किया और इन तालिबों को दहशतगर्द तालिबान बनाने में उसका सहयोग पाकिस्तान के साथ साथ ईरान और जैसे देशों ने भी किया ।  उस समय तालिबान का मतलब था मदरसों में तालीम पाकर इस्लाम और शरियत के कानूनों पर चलने वाले खुदा के बंदे तैयार करना मगर मुल्ला उमर और उसके दूसरे साथियों  के मन में तो कुछ और ही था तब इनका संपर्क ओसामा बिन लादेन से हुआ और यह कट्टरपंथी लोग खतरनाक से खतरनाक होते चले गए ।

आज के परिदृश्य को देखें तो तालिबान की कितनी दहशत आम अफगानिस्तानी लोगों के मन में है इसका नजारा तालिबान द्वारा काबुल पर कब्जा कर लेने के बाद काबुल के हवाई अड्डे पर बदहवासी में किसी भी तरह से देश छोड़कर भागने को तत्पर लोगों का हुजूम खुद बताता दिखा जब एक अमेरिकन विमान वापस जा रहा था तो कुछ लोग उसके पंखों एवं पहियों तक पर लटक गई भय इस कदर हावी था कि वें यह भी नहीं सोच पाए कि विमान के हवा में उड़ने के बाद वह किस तरह विमान से लटके रह सकेंगे और परिणाम स्वरूप लोगों के गिर कर मरने का वीडियो वायरल हुआ ।

पिछले पांच वर्ष से तालिबान जिस तरह ताकत जुटा रहे थे एवं सरकार को टक्कर दे रहे थे उससे अमेरिका जैसा देश भी घबरा गया जब जो बाड़ेन अमेरिका के उप राष्ट्रपति थे तब भी उन्होंने तत्कालीन राष्ट्रपति बराक ओबामा को परामर्श दिया था कि अफगानिस्तान से फौजें वापस बुलाई जाएं लेकिन ओबामा ने उनकी बात नहीं मान कर अफ़ग़ानिस्तान अभियान जारी रखा था मगर जब बाडेन राष्ट्रपति बने तब उन्होंने अपने उस विचार को लागू कर दिया । उनका आकलन था कि अफगानिस्तान में अमेरिकी फौजों पर जिस तरह पैसा बहाया जा रहा है उसका रिटर्न अमेरिका को नहीं मिल रहा है उनसे वहां पर उसके 2300 सैनिक मारे जा चुके थे और लगभग 6100 लाख डॉलर की बड़ी राशि वहां अमेरिका खर्च कर चुका था यानी इस बार अमेरिका ने केवल और केवल आर्थिक हानि लाभ की दृष्टि से सोचा और अफगानी लोगों को उनके भाग्य पर छोड़कर अमेरिका वहां से भाग निकला ।

यदि दुनिया इसे अमेरिका की हार मानती है तो माने, अमेरिका पर  ज्यादा फर्क पड़ने वाला नहीं है । वैसे अमेरिका का इसी तरह का इतिहास रहा है कई देशों में उसने सैन्य हस्तक्षेप किया और वहां से उसे हटना पड़ा वियतनाम इसका ज्वलंत उदाहरण रहा है जहां अमेरिका की फौजें करीब 20 साल रही और आखिरकार वहां से खाली हाथ वापस लौटी। अपने अत्याधुनिक हथियारों के बल पर भले ही अमेरिकी सैनिक भारी पड़ते हैं लेकिन मनोबल के मामले में वें हमेशा कच्चे लड़ाके ही साबित हुए हैं । जो बाडेन चाहे कुछ भी तर्क दें लेकिन असलियत यह है कि जैसे-जैसे अफगानिस्तान में तालिबान का वर्चस्व बढ़ता गया वहां अमेरिकी सैनिक दल का मनोबल गिरता गया यदि इसे दूसरे नजरिए से भी देखें तो अमेरिका ने स्थानीय अफगान सैनिकों को पिछले करीब 20 वर्षों से प्रशिक्षण दिया है लेकिन जब उस प्रशिक्षण को यथार्थ के धरातल पर उतारने की बारी आई तो अफगानिस्तान के सैनिकों ने सामना करने की बजाए गुप्त स्थानों पर भाग का छुपने में ही भलाई समझी । इसका मतलब अमेरिकन प्रशिक्षण अफगानिस्तान में किसी काम का नहीं रहा।

खैर अब वास्तविकता यही है कि अफगानिस्तान में तालिबान का पूरी तरह कब्जा हो गया है अब वहां का शासन वही चलाएंगे, अपने तरीके से चलाएंगे और वहां के नागरिकों के सामने उनकी बात मानने के अलावा कोई चारा नहीं है । मगर यहां प्रश्न उठता है कि आखिर तालिबान लौटे कैसे ? ऐसा क्या हुआ कि उनका विरोध ढंग से न सरकार कर पाई आम आदमी ने उनकी खिलाफत में आवाज़ उठाई । असलियत यह है कि अफगानिस्तान में अमेरिका द्वारा राष्ट्रपति बनाए गए अशरफ गनी के लोग आकंठ भ्रष्टाचार में डूबे थे पता तो यहां तक चल रहा है कि 300000 की संख्या वाली अफगानी सेना में करीबन 20% व घोस्ट सैनिक थे यानी ऐसे सैनिक जो केवल कागजों में थे यथार्थ में उनका अस्तित्व ही नहीं था ।

अब जो सैनिक थे भी उनको भी ढंग से प्रशिक्षित नहीं किया गया था ।  युद्ध में अपनाई जाने वाली रणनीति  फेल हो गई, खुद वहां के पक्ष विपक्ष के नेता आपस में लड़ते रहे, भ्रष्टाचार वहां पर इस कदर हावी हो गया कि आम आदमी को सरकार से कोई आशा नहीं रही इसलिए जब तालिबान चढ़कर आए आम आदमी ने उनका कहीं विरोध नहीं किया । मगर तालिबान का भय इस कदर हावी है कि बड़ी संख्या में लोग अफगानिस्तान छोड़कर कहीं भी शरण लेने के लिए अफरा तफरी में भाग रहे हैं यानी कह सकते हैं इस बार तालिबान का 1996 जैसास्वागत नहीं हुआ है।

पूरी दुनिया मेंआशंकाएं जताई जा रही है कि अब वहां तालिबान का अत्याचार शुरू हो जाएगा महिलाओं की हालत बद से बदतर होती जाएगी और शरीयत के नाम पर लोगों को मारा पीटा और जलील किया जाएगा ।  अब तालिबान क्या करेंगे यह तो आने वाला समय ही बताएगा । हां, इस बार तालिबान ने सत्ता ग्रहण करने के दो दिन बाद ही जिस तरीके से प्रेस कॉन्फ्रेंस में बताया कि वे अफगानिस्तान में महिलाओं को अधिकार देंगे वहां शांति स्थापित की जाएगी विकास के कार्यों में रुकावट नहीं डाली जाएगी तथा अफगानिस्तान इस जमीन का प्रयोग दूसरे देशों के खिलाफ आतंकवादी योजना बनाने एवं घटनाओं को अंजाम देने के लिए नहीं करने दिया जाएगा उससे एक राहत सी मिलती दिखती है , मगर दुनिया यह भी जानती है कि तालिबान के डीएनए में उदारता नाम की चीज नहीं है इसलिए अभी उन पर यकीन करना मुश्किल लग रहा है ।

अंतर्राष्ट्रीय राजनीतिक दृष्टि से भारत को अफगानिस्तान की घटनाओं पर नजदीकी नजर रखनी होगी यदि हम तालिबान का समर्थन नहीं कर रहे हैं तो इसका भी ख्याल रखना होगा कि हम अनावश्यक रूप से विरोध न करें क्योंकि ऐसा करने पर पाकिस्तानी उकसावे पर वह भी कश्मीर या इधर-उधर ज्यादा सक्रियता दिखा सकते हैं और बिना बात की आफत को न्योता देना कोई समझदारी की बात नहीं है। बेशक अपनी तैयारी हमें हर तरह से पूरी रखनी होगी कहीं से भी हम कमजोर पड़े तो अफगानिस्तान का सत्ता परिवर्तन हमारे लिए बड़ा सिरदर्द भी बन सकता है।

लेखक वरिष्ठ स्तंभकार हैं.

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