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विश्व पटल पर बढ़ा भारत का कद

– सारांश कनौजिया

एक समय था जब भारत को दूसरे देशों के सामने हाथ फैलाना पड़ता था। भारत को अपनी आर्थिक स्थिति ठीक रखने के लिये सोना तक गिरवी रखना पड़ा था। यदि हमें सहायता लेनी होती थी, तो दूसरे देश की सभी मांगों को मानना पड़ता था। उदाहरण के तौर पर यदि हमें किसी उत्पाद का आयात करना पड़ता था, तो कई बार दूसरे देश हमें वो उत्पाद भी खरीदने के लिये मजबूर करते थे, जिसका हमारे देश में भी अधिक मात्रा में उत्पादन होता है। अब स्थितियां बदली हैं। हम अपनी शर्तों पर दूसरे देशों से बात करते हैं। बिना झुके अपनी बात मनवाते हैं।

इस बदले स्वरुप, भारत के इस गौरव का श्रेय किसको देना चाहिए? जब यह प्रश्न उठता है, तो ध्यान में आता है कि वर्तमान भारतीय नेतृत्व ने इसमें महत्वपूर्ण भूमिका निभायी है। इस बात को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। भारत के इंजीनियरों, वैज्ञानिकों व नर्सिंग स्टाफ सहित विभिन्न क्षेत्रों में कार्य करने वाले व्यक्तियों की भारी मांग विदेशों में है। इनमें से बहुत से लोग आज भी भारत में अपने जन्म स्थान से जुड़े रहना चाहते हैं। उनका यह जुड़ाव भी भारत को महान बनाने में सहायक होता है। भारत में रहने वाले भारतीयों की उपलब्धि भी हमारे देश को आदर्श स्थिति में लाने में सहायक सिद्ध होती है। इन बातों का भी अपना महत्व है।

कुछ लोगों का कहना है कि भारत की मजबूत स्थिति के लिये प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी नहीं बल्कि वर्तमान विश्व में बनी हुई परिस्थितियां जिम्मेदार हैं। वो लोग यह भूल जाते हैं कि किसी भी देश की मजबूत स्थिति वहां के मजबूत नेतृत्व के कारण ही संभव हो सकती है। उदाहरण के रुप में पाकिस्तान-बांग्लादेश विभाजन में हमारी सेना का अतुलनीय योगदान है। किंतु जब भी इस मुक्ति आंदोलन की चर्चा होगी, तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को भी याद किया जायेगा। यह जरुर कहा जायेगा कि इंदिरा की नेतृत्व क्षमता, उनकी कुशलता के कारण हमारी सेनाएं सफल रहीं। ठीक उसी तरह भारत को विश्व में अग्रणी स्थान दिलाने का श्रेय हमें वर्तमान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को भी देना होगा।

ऐसे में सवाल उठेगा कि नरेंद्र मोदी को इसका श्रेय क्यों दे? उनके कार्यकाल में भारत की स्थिति अच्छी कैसे हुई? यह प्रश्न भी कई लोग उठा सकते हैं। तो इसे कुछ उदाहरणों से समझना होगा। नरेंद्र मोदी जब प्रधानमंत्री बने, उस समय तक भारतीय प्रधानमंत्री को किसी विदेशी राष्ट्राध्यक्ष से मिलते समय वहां के नियमानुसार सम्मान करना आवश्यक होता था, जिस प्रकार नरेंद्र मोदी राष्ट्राध्यक्षों से मिलते हैं, वैसे कोई और प्रधानमंत्री अभी तक नहीं मिला। वो हाथ मिलाने के साथ ही गले मिलना भी जानते हैं। ट्रंप भी अपने अनुसार अमेरिका और दूसरे देशों को चलाना चाहते थे, लेकिन वो दूसरा चुनाव नहीं जीत सके। विश्व के कई राष्ट्राध्यक्ष उन्हें पसंद नहीं करते। इसके उलट अपने हिसाब से चलने वाले नरेंद्र मोदी भारत में दोबारा और मजबूत होकर आये। पाकिस्तान और चीन जैसे देश जो हमेशा से भारत के शत्रु बने हुए हैं, उनको छोड़कर अन्य सभी भारत का पूरा सहयोग और समर्थन करते हैं।

अब इस प्रश्न का उत्तर भी हमें खोजना चाहिए कि भारत ने पिछले 6 सालों में क्या पाया? तो इसका उत्तर देने के लिये हमें अमेरिका और रुस के संबंधों को भी समझना होगा। दोनों एक दूसरे के घोर विरोधी हैं। स्वतंत्रता के बाद भारत जब रुस के नजदीक जाने लगा, तो अमेरिका हमारा दुश्मन बन गया था। नरेंद्र मोदी के शासनकाल में अमेरिका भारत के और निकट आया। रुस के दूर जाने का खतरा बना हुआ था। इसके बाद भी मोदी ने रुस को साधा। उससे आधुनिक हथियार लिये। अमेरिका ने रुस से किसी भी प्रकार के व्यापार पर प्रतिबंध लगा रखा था, लेकिन भारत को इससे छूट मिली। जो बाइडेन के चुनाव जीतने के बाद कुछ विदेश मामलों के जानकारों का कहना था कि अमेरिका भारत से नाराज हो जायेगा। अभी तक बाइडेन ने जो संकेत दिये हैं, उसके अनुसार भारत अमेरिका का सदाबहार दोस्त बना रहेगा।

किसान आंदोलन से जुड़े नेताओं ने ब्रिटिश प्रधानमंत्री बोरिस जाॅनसन से भारतीय गणतंत्र दिवस पर न आने का अनुरोध किया था। जब कोरोना के कारण जाॅनसन ने भारतीय गणतंत्र दिवस पर न आने का निर्णय लिया, तो भारत के कुछ नेता इसे अपनी जीत के रुप में ले रहे थे, लेकिन उनका मंसूबा तब नाकाम हो गया, जब बोरिस जाॅनसन ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को जी7 बैठक के लिये आमंत्रित करने के साथ ही इस आयोजन से पहले भारत आने की इच्छा व्यक्त कर दी। यहां यह ध्यान रखने वाली बात है कि फिलहाल किसान आंदोलन समाप्त होने की संभावना नहीं है, इसलिये ब्रिटिश प्रधानमंत्री वास्तव में कोरोना के कारण ही गणतंत्र दिवस पर नहीं आ सके, यही वास्तविक सत्य है। जहां तक जी7 बैठक में भारत की भूमिका का प्रश्न है, तो नरेंद्र मोदी के आने के बाद जी7 बैठक में भारत को स्थायी सदस्य बनाने के प्रस्ताव पर भी कई बार विचार हो चुका है।

वैसे तो नरेंद्र मोदी के साशनकाल में कई ऐसे अवसर आये, जब दुनिया में भारत का डंका बजा, लेकिन मैंने सिर्फ दो ताजा मामले लिये हैं, क्योंकि कुछ लोगों का यह दावा है कि पहले सीएए प्रोटेस्ट और अब किसान आंदोलन से भारत की छवि खराब हुई है। किंतु वास्तविकता इससे कहीं अलग है। भारत के विपक्ष को छोड़कर अन्य सभी हमारे देश की महत्वपूर्ण भूमिका और नरेंद्र मोदी को स्वीकार कर चुके हैं। इसमें विदेशी राष्ट्राध्य भी शामिल हैं।

लेखक मातृभूमि समाचार के संपादक हैं.

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