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सीबीआई करेगी दिल्ली सरकार के बस घोटाले के आरोप की जांच

नई दिल्ली (मा.स.स.). केंद्र सरकार और दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल के बीच एक बार फिर तकरार बढ़ सकती है। गृह मंत्रालय ने दिल्ली सरकार द्वारा खरीदी गई 1,000 बसों की खरीदारी की जांच कराने का आदेश दिया है। गृह मंत्रालय ने एक हजार लो-फ्लोर बसों की खरीदारी की CBI से जांच कराने का आदेश दिया है। 1,000 बसों की खरीद और रखरखाव को लेकर दिल्ली ट्रांसपोर्ट कॉरपोरेशन के साथ हुई इस डील की जांच अब केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो से कराई जाएगी और इस मामले को लेकर सियासत भी गरमा सकती है। इससे पहले दिल्ली के लेफ्टिनेंट गवर्नर अनिल बैजल ने एक कमेटी बनाई थी और इस कमेटी ने अपनी जांच में इस डील में कई गड़बड़ियां पाई थीं। जिसके बाद लेफ्टिनेंट गवर्नर ने यह रिपोर्ट गृह मंत्रालय को दी थी। 21 जुलाई को इस डील से जुड़ी फाइल लेफ्टिनेंट गवर्नर ने गृह मंत्रालय को दी थी।

गृह मंत्रालय के एडिशनल सचिव (केंद्र शासित प्रदेश) गोविंद मोहन ने सीबीआई जांच की जानकारी दिल्ली के मुख्य सचिव विजय देव को 16 अगस्त को दी थी। एडिशनल सचिव गोविंद मोहन ने दिल्ली के मुख्य सचिव को लिखा है कि ‘मैं यह खत दिल्ली सरकार द्वारा खरीदी गई 1000 लो-फ्लोर बसों की खरीदारी के संबंध में लिख रहा हूं। केंद्र शासित प्रदेश दिल्ली के लेफ्टिनेंट गवर्नर द्वारा बनाई गई तीन सदस्यों की कमेटी ने अपनी रिपोर्ट सौंपी है। गृह मंत्रालय ने इस रिपोर्ट की समीक्षा की थी और सक्षम प्राधिकारों द्वारा स्वीकृति देने के बाद यह तय किया गया है कि इस मामले की जांच केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो से कराई जाए।’ इससे पहले, बीजेपी विधायक विजेंद्र गुप्ता के आरोपों पर परिवहन विभाग ने बसों की खरीद पर अस्थायी रोक लगा दी थी। गुप्ता ने एलजी से इस मामले में जांच की मांग की थी। परिवहन मंत्री अशोक गहलोत ने बसों की खरीद पर विपक्षी विधायक की तरफ से उंगली उठाए जाने पर कहा था कि जब तक मामले की ठीक से जांच नहीं हो जाती है, तब तक बसें नहीं खरीदी जाएंगी।

दिल्ली सरकार ने कुछ महीने पहले ही एक हजार लो-फ्लोर बसों की खरीद का ऑर्डर जारी किया था। इस पर विजेंद्र गुप्ता ने एलजी से शिकायत कर दी थी कि मेंटनेंस का ठेका भी बस सप्लाई करने वाली कंपनी को ही दे दिया गया है जो गलत है। भाजपा ने आरोप लगया था कि बसों की कीमत से ज्यादा खर्च इनके तीन साल के रखरखाव पर किया जाएगा। जबकि, खरीद की शर्तों के मुताबिक तीन साल तक इन बसों के रखरखाव की जिम्मेदारी आपूर्तिकर्ता कंपनियों की ही होनी चाहिए।

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