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अब वझे बना महाविकास अघाड़ी में कलह की वजह

– सारांश कनौजिया

भाजपा को महाराष्ट्र की सत्ता में आने से रोकने के लिये तीन अलग-अलग विचारधारा के दल एक साथ आये और उन्होंने महाविकास अघाडी के नाम से गठबंधन बनाकर प्रदेश की सत्ता हासिल की। मैं शिवसेना, राकांपा और कांग्रेस तीनों को अलग-अलग विचारधारा का मानता हूं क्योंकि राकांपा प्रमुख शरद पवार कांग्रेस से मतभेद के कारण ही अलग हुये थे और उन्होंने यह क्षेत्रीय दल बनाया था। शिवसेना की हिन्दुत्ववादी छवि कांग्रेस और राकांपा किसी से नहीं मिलती है। यही कारण है कि इन तीनों के बीच एकरुपता प्रारंभ से ही नहीं रही। अब मुम्बई पुलिस का एक अधिकारी सचिन बझे इनके बीच कलह की वजह बना हुआ है।

महाविकास अघाडी के तीनों दल सत्ता के लिये एक साथ तो आ गये, लेकिन तीनों को ही अपनी राजनीति की चिंता अधिक है। इसलिये महाराष्ट्र के बारे में विचार करने का किसी के पास समय नहीं है। कांग्रेस का ग्राफ जिस प्रकार से गिर रहा है, उससे कभी-कभी ऐसा लगता है कि वो राष्ट्रीय दल का दर्जा भी खो सकती है। महाविकास अघाडी बनने के बाद भी मंत्रियों के नाम तय होने में देरी कांग्रेस के इसी डर का परिणाम था। राकांपा महाराष्ट्र की क्षेत्रीय पार्टी है। इसलिये शरद पवार क्षेत्रीय राजनीति को ध्यान में रखते हुये कार्य कर रहे हैं। इसी कारण कई बार उनके विचार कांग्रेस से मेल नहीं खाते। शिवसेना ने भारत में राष्ट्रपति चुनाव के समय संघ प्रमुख डॉ. मोहन भागवत को राष्ट्रपति बनाने की मांग की थी। उस समय वो भाजपा के साथ थी। भाजपा से अलग होने पर उसके निशाने पर अब संघ भी रहता है। किंतु इस कारण कहीं उसकी हिन्दूवादी छवि खराब न हो जाये, उद्धव ठाकरे इसकी भी चिंता करते रहते हैं। उनकी यह बात कांग्रेस और राकांपा दोनों को पसंद नहीं आती है। इसलिये भी कई बार तकरार काफी हद तक बढ़ जाती है।

इन सबके बीच हमेशा आक्रामक रहकर कार्य करने वाली शिवसेना को रक्षात्मक होना पड़ रहा है। ऐसा ही एक मामला हाल ही में मुंबई में सामने आया। अंबानी के घर के बाहर जिलेटिन की छड़े मिलने के मामले की जांच हुई, तो पता चला कि गाड़ी किसी मनसुख नाम के व्यक्ति की है। बाद में इस व्यक्ति की लाश मिलती है। दोनों मामलों में संदेह के घेरे में महाराष्ट्र पुलिस का सब इंस्पेक्टर सचिन वझे आता है। वझे भले ही सब इंस्पेक्टर हो, लेकिन उसे मुंबई की क्राइम इंटेलिजेंस यूनिट का प्रमुख बनाया गया था। वह सीधे मुंबई पुलिस कमिश्नर को रिपोर्ट करता था। मुंबई के सभी प्रमुख मामले उसे ही हल करने के लिये दिये जाते थे। एक प्रकार से वो मुंबई पुलिस का अघोषित प्रमुख बना हुआ था।

तीन दलों की सरकार होने के नाते संभव था कि सचिन वझे को राजनीतिक संरक्षण मिला हो, इसीलिये एक मामूली सब इंस्पेक्टर की इतनी हैसियत हो गई। लेकिन जब वझे का इतिहास टटोला गया, तो उसके संबंध शिवसेना नेताओं से निकले। कई लग्जरी गाड़ियों का उपयोग वझे करता था, जिनके संबंध भी शिवसेना से मिले। वह एक समय शिवसेना का प्रवक्ता भी रह चुका था। शिवसेना में उसकी पकड़ का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि जब एनआईए ने सचिन वझे को गिरफ्तार किया, तो स्वयं शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे ने उसका बचाव किया था। मुख्यमंत्री रहते नेता ऐसा करने से सामान्यतः बचते हैं।

गठबंधन में कांग्रेस को अधिक महत्व नहीं दिया जाता है। इसके अलावा तीनों दलों में महाराष्ट्र के अंदर शरद पवार सबसे वरिष्ठ और अनुभवी नेता हैं। इसलिये कई बार तीनों को साथ लेकर चलाने की जिम्मेदारी उन्हें ही दे दी जाती है। इस बार भी ऐसा ही हुआ। वझे सीधे तत्कालीन मुंबई पुलिस कमिश्न परमबीर सिंह को रिपोर्ट करता था। इसलिये आरोप उन पर भी लगे कि सारे प्रकरण की जानकारी होने के बाद भी उन्होंने कुछ नहीं किया, इसमें उनकी भी मिलीभगत है। यद्यपि अभी तक इसके कोई सबूत नहीं मिले हैं, लेकिन फिर भी शरद पवार के बीच में पड़ने के बाद परमबीर सिंह को होमगार्ड विभाग का डीजी बना दिया गया। यह एक प्रकार से उनका डिमोशन है। क्योंकि मुंबई के पुलिस कमिश्नर को महाराष्ट्र के डीजीपी के बराबर का महत्व दिया जाता है। अभी उम्मीद है कि कुछ और पुलिस अधिकारियों को भी हटाया या ट्रांसफर किया जा सकता है।

जिन पुलिस अधिकारियों पर इस समय गाज गिर रही है, वो सभी शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे के करीबी हैं। सचिन वझे को उन्होंने सारे नियम कायदे तोड़कर कोरोना का हवाला देकर वापस लिया और एक महत्वपूर्ण जिम्मेदारी दी। इसी प्रकार परम जीत सिंह की नियुक्ति भले ही पिछली सरकार में हुई हो, लेकिन शिवसेना ने हर मामले में उनका बचाव किया है और उनकी निंदा को महाराष्ट्र की बदनामी से जोड़ा है। अब अनमने मन से ही सही लेकिन इन सभी की विदाई हो रही है। इससे शिवसेना को एक और डर सताने लगा है कि आगे भी अन्य मामलों में कहीं उसे हर बार कदम पीछे न हटाने पड़े। यदि ऐसा हुआ तो पार्टी अपनी पहचान आक्रामकता खो देगी। ऐसे में अगले विधानसभा चुनाव में एनसीपी प्रमुख शरद पवार का कद उद्धव ठाकरे से बढ़ जायेगा। कांग्रेस महाराष्ट्र में अपनी खोई जमीन तलाशने के लिये समय-समय पर मुखर होती है और फिर शांत होकर पवार के पावर के आगे उद्धव को घुटने टेकते हुये देखती है। क्योंकि उद्धव ठाकरे के कमजोर होने पर ही कांग्रेस का उदय संभव है। वझे मामले में भी कांग्रेस पवार के कंधे पर बंदूक रखकर ही निशाना लगा रही है।

लेखक मातृभूमि समाचार के संपादक हैं।

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