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हिटलर में आ गई थी चीनी शासकों की आत्मा

– सारांश कनौजिया

इस समय चीन के शासक शी जिनपिंग हैं। मैं उन्हें राष्ट्रपति नहीं बल्कि शासक लिख रहा हूं क्योंकि उन्होंने चीन के संविधान में इस प्रकार के संशोधन किये हैं, जिसके बाद वो आजीवन चीनी राष्ट्रपति बने रहेंगे। यदि किसी भी देश में राष्ट्राध्यक्ष के पद के लिये चुनाव ही न हो, तो वहां लोकतंत्र के जीवित होने की संभावना नहीं रहती। वहां लोकतंत्र नहीं राजतंत्र है। जिन देशों में राजतंत्र है, वहां पर भी अच्छे शासक हो सकते हैं, जो जनता के हित में निर्णय लेते हों। किंतु यदि कोई राष्ट्राध्यक्ष लोकतंत्र को कुचलकर सत्ता पर काबिज रहता है, तो उसे हिटलर वाला राजतंत्र ही कहा जाता है।

वर्तमान समय में जब भी कोई तानाशाही वाला व्यवहार करता है या फिर दबाव बनाकर सिर्फ अपनी ही बात को मनवाना चाहता है, तो हम कहते हैं कि वो अपनी हिटलरगिरी चला रहा है। मतलब साफ है, अब हिटलर एक व्यक्ति नहीं विचार बन चुका है, जो दूसरों की भावनाओं को दबाकर आगे बढ़ना चाहता है। शी जिनपिंग चीन के अकेले राष्ट्राध्यक्ष नहीं है, जिनमें हिटलकर की आत्मा आ गयी लगती है। यदि चीनी इतिहास पर हम नजर डालेंगे, तो ऐसा लगेगा कि चीनी शासकों की आत्मा हिटलर में आ गयी थी।

चीन का इतिहास लगभग 4000 वर्ष पुराना माना जाता है। लगभग 220 ईसा पूर्व चीन ने छोटे-छोटे क्षेत्रों से एक विशाल देश का रुप लेना शुरु कर दिया। इससे पहले तक सत्ता हासिल करने के लिये यहां भयंकर मारकाट होती रही। हान राजवंश ने चीन में शांति स्थापित करने का प्रयास किया, लेकिन उनके पतन के साथ ही फिर हिंसा का दौर चला। 580 ईस्वी में सुई राजवंश ने चीन को एक रखने का प्रयास किया, लेकिन कुछ ही वर्षों में उसका भी पतन हो गया। इसी प्रकार संघर्षों से गुजरते हुए 1912 में चीन में गणतंत्र स्थापित हुआ।

चीन में 1954 में चेयरमैन के रुप में एक प्रकार से पहली छद्म लोकतांत्रिक नियुक्ति हुई। 1981 में राष्ट्रपति की नियुक्ति होना शुरू हुई। हम यहां नियुक्ति शब्द का प्रयोग इसलिये कर रहे हैं क्योंकि राष्ट्रपति कौन बनेगा, इसका निर्णय चीनी कम्युनिसट पार्टी करती है, न की चीन की जनता। हिटलर को तो फिर भी वहां की जनता के एक समूह का समर्थन हासिल था। लेकिन चीन में सिर्फ वही लोग स्वतंत्र या खुश हैं, जो चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के पदाधिकारी या उसके वफादार हैं। इसलिये मेरा मानना है कि हिटलर को तानाशाही का जो विचार आया होगा, उसकी प्रेरणा उसे चीन की व्यवस्था से मिली हो सकती है। चीन जब भी ताकतवर हुआ, उसने अपनी ताकत के बल पर आस-पास के क्षेत्रों पर राज करने का प्रयास किया। उसका यह व्यवहार चीन को संगठित करने के प्रयास के साथ ही पैदा हो गया था।

हिटलर का जन्म 1889 में हुआ था। जबकि चीन को एक करने के प्रयास के नाम पर वहां हिंसा का आरंभ ईसा पूर्व से ही हो चुका था। चीन के अधिकांश राजाओं का उद्देश्य सत्ता हासिल करना था, न की वहां की जनता को एक जनहितकारी शासन प्रदान करना। कम्युनिस्ट विचारधारा का जन्म तो इसी व्यवस्था के खिलाफ हुआ था, लेकिन जैसे ही उन्हें सत्ता मिली, उन्होंने भी वही किया, जो उससे पहले के शासक करते रहे थे। हिटलर ने एक वर्ग विशेष को अपनी नफरत का शिकार बनाया, तो वहीं वह दूसरे वर्ग के लिये एक आदर्श व्यक्ति भी था। संभवतः उसने जो हिंसा की, वह उसकी किसी नफरत का परिणाम थी। चीन में भी शासकों द्वारा बड़े स्तर पर हिंसा की गई, लोकतंत्र समर्थकों को टैंकरों के सामने खड़ा करके उड़ा दिया गया, लेकिन उसका उद्देश्य सिर्फ सत्ता की भूख था।

हिटलर और शी जिनपिंग व उनके पूर्ववर्ती शासक दोनों की ही हिंसा को मैं गलत मानता हूं। दोनों के उद्देश्य अलग-अलग हैं, लेकिन जिस प्रकार दोनों ने नरसंघार किये या फिर शी चिनपिंग नरसंघार कर रहे हैं, उसमें बहुत समानता है। जब कोरोना वायरस दुनिया के लिये नया था, तब उस समय कुछ रिपोर्ट में दावा किया गया कि शी चिनपिंग ने हजारों कोरोना पीड़ित लोगों को इकट्ठा एक स्थान पर जलवा दिया, जिसका कहीं कोई रिकार्ड नहीं है। ऐसा कोई क्रूर तानाशाह ही कर सकता है, लोकतांत्रिक तरीके से चुना गया राष्ट्राध्यक्ष नहीं। मैं अनुरोध करता हूं कि दुनिया को इस क्रूरता के विरुद्ध आवाज उठानी चाहिए। चीन में जब तक वास्तविक लोकतंत्र स्थापित नहीं हो जाता, तब तक उससे सभी प्रकार के संबंध समाप्त कर लेने चाहिए। अन्यथा न जाने भविष्य में और भी कितने हिटलर इस क्रूरता से प्रेरणा लेकर पैदा होते रहेंगे ।

लेखक मातृभूमि समाचार के संपादक हैं।

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