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बहुत बड़ी चुनौती है, ‘कोरोना काल’ की छाया में कन्या पूजन

डॉ० घनश्याम बादल

एक बार फिर चैत्र नवरात्र पर कोरोना की महामारी की काली छाया है । लाइलाज बीमारी के संक्रमित होने का डर भी है और  देवी रूपा कन्याओं को जिमाना भी है। स्वयं को  तथा उनको संक्रमित करने के पाप से भी बचना है यानी एक तरह से बत्तीस दांतो के बीच में फंसी जीभ की तरह इस बार भी नवरात्र में अष्टमी एवं नवमी को कन्या पूजन करने की  विवशता है। पिछले वर्ष भी कमोबेश ऐसी स्थिति थी मगर तब भारत में संक्रमण की गति एवं दर विदेशों के मुकाबले बहुत कम थी पर इस बार परिस्थितियां विकट एवं विपरीत है भारत में कोरोना की दूसरी लहर ज्वार पर है डब्ल्यू टेशन का वायरस और भी घातक होकर चुनौती दे रहा है । एक तरफ अपनी परंपरा आस्था भक्ति श्रद्धा एवं संस्कृति का प्रश्न है तो दूसरी तरफ जीवन मरण का सवाल और अब जान है तो जहान है की बजाए दवाई भी और कडाई भी का दौर चल रहा है। ऐसे में कैसे मनाएं नवरात्र का कन्या पूजन ।

नवरात्रों का महापर्व समापन की ओर  है इन नवरात्रों में जहां एक और हम राम के जन्म को सेलिब्रेट करते हैं । वहीं मां दुर्गा के नव रूप का भी वंदन एवं पूजन करते हैं मान्यता यह रही है कि अष्टमी और नवमी के दिन कन्याओं को अपने घर बुलाकर जमाने से मन को शांति एवं पुण्य की प्राप्ति होती है और उसी क्रम में हिंदू धर्म के अनुगामी 9 दिन उपवास रखने के बाद कन्या पूजन करते हैं । कन्या पूजन की घड़ी आ चुकी है मगर हालात सामान्य नहीं हैं बल्कि कहा जाए इस बार कन्या पूजन एवं उन्हें भोजन कराने, दक्षिणा देने के लिए अपने घर बुलाने में संकट के दर्शन हो रहे हैं । धर्म ,पूजा व भक्ति आस्था के प्रश्न हैं और भक्त लोग इनके विरुद्ध किसी भी तर्क को मानने को तैयार नहीं होते क्योंकि आस्था तर्क में विश्वास ही नहीं करती लेकिन साथ ही साथ समय की नजाकत को न समझना भी एक प्रकार की मूर्खता ही कहलाती है।

पूजन अर्चन  या भूखे को भोजन कराना हिंदू धर्म में बहुत ही पुण्य प्रदान करने वाला माना जाता है और वर्ष में हिंदू लोग कई ऐसे अवसर निकाल ही लेते हैं जिसमें भी यह सब करते हैं और उससे आत्मिक शांति का अनुभव भी करते हैं लेकिन इस बार वातावरण में जिस प्रकार से कोरोना  जैसा दानवी वायरस फैला हुआ है उससे बचने के लिए आस्था के साथ साथ सजगता का भी ख्याल रखना होगा। नवरात्रों में हम विशेष रूप से मां के रूप में दुर्गा के नौ रूपों का वंदन करते हैं और आशा करते हैं कि मां हम पर अपनी करुणामई कृपा करेंगे और वह करती भी है कहा जाता है कि मां से बड़ा कृपालु दयावान और करुणामई तथा वात्सल्य से भरा हुआ कोई दूसरा हो ही नहीं सकता और मां कभी अपने बच्चों से नाराज नहीं हो सकती ।  अगर हो भी जाए तो वह किसी भी रुप में उनका अहित न स्वयं करती है और न ही किसी और को करने देती है । इसलिए इस बात से भक्त निश्चिंत रहें कि यदि किसी वजह से वें व्रत उपवास न कर पाए या कन्या जिमाने का कार्य न कर पाए तो मां नाराज हो जाएगी। निश्चित ही मां नाराज नहीं होंगी अपितु जब वह अपने बच्चों को कुछ सार्थक करते हुए देखेंगीं तो कहीं अधिक प्रसन्न होकर अधिक कृपा की वर्षा करेंगी ।

बेहतर हो कि इस बारबदली हुई विकट परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए हम नवरात्र समय काल देश और परिस्थिति के अनुसार थोड़ा हटकर मनाएं । यदि आपके स्वास्थ्य में जरा भी गड़बड़ दिखाई दे कमजोरी लगी खांसी नजला जुकाम हो अथवा आप शुगर यह हृदय के रोगी हो तो भूल कर भी उपवास न करें क्योंकि ऐसा करने से स्वास्थ्य संबंधी बड़ी कठिनाइयां सकते हैं और कोरोना के संक्रमण के चलते उचित समय पर उचित चिकित्सा  तथा अच्छे चिकित्सक का उपलब्ध होना भी बहुत मुश्किल होगा इसलिए यदि हठधर्मिता के चलते अंधविश्वास के चलते आप ऐसे उपवास कर भी लेंगे तो जहां एक और आप स्वयं के जीवन तथा अपने परिवार के भविष्य को दांव पर लगा देंगे वही इस प्रकार के हट धर्मी भक्तों के उपवास से मां भी प्रसन्न नहीं होने वाली है।

अब नवरात्र उपवास के पश्चात सबसे महत्वपूर्ण समझे जाने वाले कन्या पूजन पर आते हैं हमारा चिकित्सा विज्ञान पूरे प्रयासों के बावजूद भी कोरोना का कोई उपचार अभी तक प्रमाणिक रूप से नहीं ढूंढ पाया है बस वह केवल इतना बता पाया है कि यह संक्रमण बहुत खतरनाक होता है तथा एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति को स्पर्श करने पर दूसरे को संक्रमित कर देता है इतना ही नहीं कोरोनावायरस विभिन्न स्तरों पर 24 घंटे से लेकर 9- 10 दिन तक सक्रिय रह सकता है । खासतौर पर धातु यानी मेटल की सतह पर तो इसका जीवन सबसे अधिक लंबा होता है ज्ञानी अगर ऐसी सत्य है किसी संक्रमित व्यक्ति के द्वारा स्पर्श कर ली जाए तो उस पर यह वायरस लंबे समय तक जीवित रहता है अब प्रश्न उठता है की इस प्रकार की परिस्थितियों में अधिक से अधिक 10 वर्ष तक की कन्याओं को जिमाने के लिए अपने घर बुलाना क्या सीधे-सीधे कोरोना वायरस को आमंत्रण देना नहीं होगा ? इसलिए बेहतर होगा कि कोरोना को अपने घर आने से रोकें । इस वर्ष ना सही जब अगले नवरात्रों में वातावरण शुद्ध होगा तब आप भले ही दुगनी संख्या में कन्या जिमा लें

इससे भी बढ़कर कन्या जिमाने के पीछे का सबसे बड़ा भाग होता है बालिकाओं को सम्मान देना मगर यदि आप इस विकट परिस्थिति में कन्याओं को अपने घर बुला रहे हैं तो क्या आप उनका जीवन ही खतरे में नहीं डाल रहे हैं ? एक घर से दूसरे घर जाते हुए यह कन्याएं निश्चित रूप से ही कोरो ना संक्रमण के दायरे में होंगी क्योंकि वें छोटी बच्चियां है इसलिए एक दूसरे को स्पर्श भी करेंगी ही । इतना ही नहीं आप जब उन्हें दक्षिणा में रुपए पैसे देंगे उपहार में दूसरी वस्तुएं देंगे तो उनसे भी इन बच्चियों के संक्रमित होने का खतरा बना रहेगा। अब सोचिए जो कार्य आप कन्याओं के सम्मान के लिए कर रहे हैं यदि उस कार्य से उनकी जान ही खतरे में पड़ जाए तो क्या आप पुण्य के भागी बन पाएंगे इसलिए इस बार दूसरे घरों से बुलाकर कन्याओं को भोजन कराने के विचार को तो त्याग ही दीजिए । हां, आपका मन बिल्कुल ही नहीं मान रहा है तो आपके अपने परिवार में जो छोटी बच्चियां हैं आप उन्हें भोजन करा सकते हैं उपहार भी दे सकते हैं पर उसमें भी सोशल डिस्टेंसिंग का ध्यान रखें एवं उन्हें दिए जाने वाले उपहारों को अच्छी तरह से सैनिटाइज करके ही दें ‌।

कहते हैं कि अधिकतर धार्मिक अनुष्ठान सांकेतिक एवं प्रतीकात्मक होते हैं।  हम ईश्वर को नहीं देखते लेकिन मन में उनकी प्रतिमा को बिठा कर उनका पूजन कर लेते हैं । यदि ऐसा भी नहीं कर पाते हैं तो भगवान का काल्पनिक चित्र बनाकर उसको ही भोग लगा देते हैं , ऐसा करना धर्म सम्मत माना गया है।  तो इस बार धर्म की इसी सम्मति को आप कन्या पूजन पर भी लागू कर लीजिए । यदि घर में कन्या के उपलब्ध न हों तो उनके फोटो या चित्र ले लें , वह भी उपलब्ध न हो तो किसी भी वेबसाइट से कन्याओं के चित्र डाउनलोड कर सकते हैं और अपने मन की शांति के लिए आप उनके चित्रों का वंदन- पूजन भी कर सकते हैं और उन्हें भूख भी लगा सकते हैं ऐसा करके आप नन्ही नन्ही कन्याओं को संक्रमण से बचाकर कहीं ज्यादा पुण्य के भागी बनेंगे ।

लेखक वरिष्ठ साहित्यकार हैं.

नोट : लेख में लेखक द्वारा व्यक्त विचारों से मातृभूमि समाचार का सहमत होना आवश्यक नहीं है।

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