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बदला नहीं, बदले पर उतारू तालिबान !

डॉ घनश्याम बादल

तालिबान के सत्ता में काबिज होते ही अफगानिस्तान अब इस्लामिक स्टेट ऑफ अमीरात हो गया है। साफ सी बात है तालिबान ने वहां जो  कट्टर इस्लामिक शासन स्थापित करने का जो सपना देखाथा उसे अब उन्होंने धरातल पर उतारना शुरू कर दिया है। दुनिया भर का समर्थन हासिल करने के लिए तालिबान कुछ भी कहें मगर यें कट्टरपंथी लोग इस्लाम का वह चेहरा है जो धर्म को आदमी के लिए नहीं बल्कि आदमी को धर्म के लिए मानता है यानी उनके लिए मजहब अधिक महत्वपूर्ण है बजाए आदमी के ।

याद कीजिए तालिबान जब 1996 से 2002 तक अफगानिस्तान में सत्ता पर काबिज रहे तब भी उन्होंने वहां पर शरीयत को ही अपने शासन का आधार बनाया था । पुरुष लंबी दाढ़ी रखने के लिए बाध्य थे तो महिलाएं अपना सारा शरीर ढक कर रखने के लिए ।  महिलाओं के लिए शिक्षा के दरवाजे व दफ्तर बंद हो गए थे  । उनसे सार्वजनिक जीवन में सहभागिता का हर  अधिकार छीन लिया गया था और जो महिला उन शरीयत कानूनों का उल्लंघन करने की जरूरत करती थी उसे सरेआम कोडों से पीटा जाता था ।

पुरुषों को दंडित करने के लिए फांसी देना, पत्थरों से मारकर मौत की नींद सुलाना, हाथ पैर काट देने जैसे बर्बर तरीके वहां अमल में लाए गए थे । लोगों में दहशत पैदा करने के लिए उस कालखंड में तालिबान ने क्रूरता की सारी सीमाएं पार कर दी थी। आज भले ही प्रेस कॉन्फ्रेंस में तालिबानी प्रवक्ता किसी से भी दुश्मनी न रखने और आम माफी की बात कर रहे हो लेकिन अफगानिस्तान के आवाम से जो सूचनाएं मिल रही हैं वे तालिबान के खौफनाक चेहरे पर ही मोहर लगा रही हैं ।

अमेरिका आज तालिबान का विरोध कर रहा है उस से संयम बरतने की अपील कर रहा है मगर एक वह दौर भी था जब अमेरिका द्वारा तालिबान को न केवल नैतिक समर्थन दिया गया अपितु हथियार एवं प्रशिक्षण जैसी सुविधाएं भी उपलब्ध कराई गई थी। रूसी सेनाओं को टक्कर देने के लिए अमेरिका ने इन तालिबान रूपी भस्मासुरों को तब हर तरह से पाला पोसा था । आज वही भस्मासुर अमेरिका पर भारी पड़े हैं और अफगानी अवाम के लिए मौत का पैगाम लेकर आए हैं।

आज के परिदृश्य को देखें तो तालिबान की कितनी दहशत आम अफगानिस्तानी लोगों के मन में है इसका नजारा तालिबान द्वारा काबुल पर कब्जा कर लेने के बाद काबुल के हवाई अड्डे पर बदहवासी में किसी भी तरह से देश छोड़कर भागने को तत्पर लोगों का हुजूम खुद बता रहा था जब एक अमेरिकन विमान के पंखों एवं पहियों तक पर लटक गए।  भय इस कदर हावी था कि वें यह भी नहीं सोच पाए कि विमान के हवा में उड़ने के बाद वह किस तरह विमान से लटके रह सकेंगे और परिणाम स्वरूप लोगों के गिर कर मरने का वीडियो वायरल हुआ । एक बार फिर से लोगों पर गोलियां बरसाने महिलाओं को कोड़ों से पीटने और बच्चों की हत्या करने की समाचार अफगानिस्तान से मिल रहे हैं तो इस बात की ताकीद होती है की तालिबान बदले नहीं है बल्कि बदला लेने पर उतारू है।

जब जो बाइड़ेन अमेरिका के उप राष्ट्रपति थे तब भी उन्होंने तत्कालीन राष्ट्रपति बराक ओबामा को परामर्श दिया था कि अफगानिस्तान से फौजें वापस बुलाई जाएं लेकिन ओबामा ने उनकी बात नहीं मानी मगर राष्ट्रपति बनते ही उन्होंने अपने उस विचार को लागू कर दिया । उनका आकलन था कि अफगानिस्तान में अमेरिकी फौजों पर जिस तरह पैसा बहाया जा रहा है उसका रिटर्न अमेरिका को नहीं मिल रहा है । अमेरिका ने केवल और केवल आर्थिक हानि लाभ की दृष्टि से सोचा और अफगानी लोगों को उनके भाग्य पर छोड़कर अमेरिका वहां से निकल लिया । बेशक, यह दुनिया की सबसे ताकतवर देश अमेरिका की हार है । पर, दुनिया माने तो माने, इससे अमेरिका की नीति पर  ज्यादा फर्क पड़ने वाला नहीं है ।

वैसे भी अमेरिका का यही इतिहास रहा है कि वह लोकतंत्र बचाने व मानव अधिकारों की रक्षा के नाम पर हस्तक्षेप करता है सेनाएं भेजता है अपनी दादागिरी स्थापित करता है और जैसे ही उसके हित सधते हैं या उसे घाटा होता दिखाई देता है वह वहां की जनता को उसकी तकदीर के भरोसे छोड़ कर अपने दडबे में घुस जाता है । उसने वियतनाम इराक और दूसरे देशों में भी ऐसा ही किया था और अब अफगानिस्तान के आवाम को भी तालिबान के हाथों मरने के लिए छोड़कर अमेरिका अपने फौजियों को बचाने के लिए प्रयत्नरत है।

जो बाइडेन चाहे कुछ भी तर्क दें लेकिन असलियत यह है कि जैसे-जैसे अफगानिस्तान में तालिबान का वर्चस्व बढ़ता गया वहां अमेरिकी सैनिक दल का मनोबल गिरता गया यदि इसे दूसरे नजरिए से भी देखें तो अमेरिका ने स्थानीय अफगान सैनिकों को पिछले करीब 20 वर्षों से प्रशिक्षण दिया है लेकिन जब उस प्रशिक्षण को यथार्थ के धरातल पर उतारने की बारी आई तो अफगानिस्तान के सैनिकों ने सामना करने की बजाए गुप्त स्थानों पर भाग का छुपने में ही भलाई समझी । इसका मतलब अमेरिकन प्रशिक्षण अफगानिस्तान में किसी काम का नहीं रहा।

खैर अब वास्तविकता यही है कि अफगानिस्तान में तालिबान का पूरी तरह कब्जा हो गया है अब वहां का शासन वही चलाएंगे, अपने तरीके से चलाएंगे और वहां के नागरिकों के सामने उनकी बात मानने के अलावा कोई चारा नहीं है । अफगानिस्तान में अशरफ गनी की सरकार के पतन के लिए वहां की परिस्थितियां कम एवं नेता एवं अधिकारी कहीं अधिक जिम्मेदार है। वहां तालिबानी खतरे के बावजूद पक्ष विपक्ष के नेता आपस में लड़ते रहे, भ्रष्टाचार वहां पर इस कदर हावी हो था गया कि आम आदमी को सरकार से कोई आशा नहीं रही थी।

पूरी दुनिया मेंआशंकाएं जताई जा रही हैं कि अब वहां तालिबान का अत्याचार शुरू हो जाएगा महिलाओं की हालत बद से बदतर होती जाएगी और शरीयत के नाम पर लोगों को मारा पीटा और जलील किया जाएगा ।  अब तालिबान क्या करेंगे यह तो आने वाला समय ही बताएगा । हां, इस बार तालिबान ने सत्ता ग्रहण करने के दो दिन बाद ही जिस तरीके से प्रेस कॉन्फ्रेंस में बताया कि वे अफगानिस्तान में महिलाओं को अधिकार देंगे वहां शांति स्थापित की जाएगी विकास के कार्यों में रुकावट नहीं डाली जाएगी तथा अफगानिस्तान इस जमीन का प्रयोग दूसरे देशों के खिलाफ आतंकवादी योजना बनाने एवं घटनाओं को अंजाम देने के लिए नहीं करने दिया जाएगा उससे एक राहत सी मिलती दिखाई दीं थी धीरे-धीरे तालिबान की असलियत और उसका खौफनाक चेहरा सामने आने लगा  है , वैसे भी दुनिया  जानती है कि तालिबान के डीएनए में उदारता नाम की चीज नहीं है इसलिए उन पर यकीन करना मुश्किल लग रहा है ।

जहां तक भारत का प्रश्न है उसके प्रति तालिबान के पूर्व रवैए को देखते हुए वह न तटस्थ रह सकता है और न ही खुलकर विरोध कर सकता है । तटस्थ रहने का मतलब है तालिबान को अपनी मनमानी करने देना, और विरोध करने का मतलब है उस उसे भारत के खिलाफ चीन और पाकिस्तान जैसे देशों के साथ मिलकर दहशतगर्दी फैलाने का न्योता देना । सही मायनों में यह भारतीय कूटनीति की अग्निपरीक्षा की घड़ी है । उसे सधे हुए अंदाज में एक और जहां अपने लोगों और देश की हिफाजत पर ध्यान देना है वहीं मजबूती के साथ दुनिया को यह संदेश भी देना है कि तालिबान कितने भी ताकतवर क्यों न हों लेकिन दहशतगर्दी को भारत का समर्थन न पहले था और ने आगे होगा।

लेखक वरिष्ठ स्तंभकार हैं

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