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यदि जल संरक्षण पर नहीं दिया ध्यान तो तीसरा विश्व युद्ध जल के लिए होगा

– सारांश कनौजिया

आज विश्व जल संरक्षण दिवस है। जल ही जीवन है। विश्व के एक बड़े भाग पर सिर्फ जल है। इसके बाद भी यह जल रुपी जीवन आज खतरे में है। इसी कारण हमें जल संरक्षण दिवस मनाना पड़ रहा है। भारत रत्न पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने तो यहां तक कहा था ‘ध्यान रहे कि आग पानी में भी लगती है और कोई आश्चर्य नहीं की अगला विश्व युद्ध पानी के मसले पर हो।’ दुनिया ने जब विश्व युद्ध देखे थे, तब सभी के पास इतने खतरनाक हथियार नहीं थे। आज समुद्र से लेकर अंतरिक्ष तक हथियार दुश्मन को तबाह करने के लिये तैयार हैं। एक बड़ी संख्या शुद्ध पेयजल के आभाव में मर जायेगी और करोड़ो लोग युद्ध के कारण काल के गाल में समा जायेंगे। ऐसा सिर्फ जल संरक्षण न हो पाने के कारण हो सकता है।

ऐसा क्यों है कि हम जल संरक्षण के उपायों से पहले युद्ध से बचाव के तरीकों पर बात कर रहे हैं। वास्तव में पृथ्वी पर उपलब्ध जल का अधिकांश भाग पीने योग्य नहीं है। इस कारण करोड़ों लोगों को शुद्ध पेयजल नहीं मिल पाता है। एक रिपोर्ट के अनुसार पूरे विश्व में लगभग 1.4 अरब लोगों को शुद्ध पेयजल नहीं मिल पा रहा है। भारत में ऐसे लोगों की संख्या लगभग 16 करोड़ है। वर्तमान भारत सरकार ने हर घर नल से पानी पहुंचाने का लक्ष्य रखा है। किंतु यह पानी आयेगा कहां से, इसके लिये अभी बहुत मेहनत करने की आवश्यकता है। दूसरे अर्थों में जल संरक्षण करने की जरुरत है।

उदाहरण के रुप में मैं अपने गृह नगर कानपुर की बात ले लेता हूं। यहां की आबादी लगभग 45.81 लाख है। गंगा नदी के किनारे बसे होने का जिले को लाभ मिलता है, लेकिन पिछले कुछ सालों में स्थिति तेजी से बदली है। शहरी क्षेत्र में पानी निकालने के लिये मशीनों के प्राइवेट प्रयोग को प्रतिबंधित कर दिया गया है। इसके लिये अब अनुमति लेनी होती है। प्रशासन द्वारा गंगा नदी का पानी शोधित करके घरों तक पहुंचाया जाता है, लेकिन हर साल गर्मी में पानी की दिक्कत हो जाती है। दिल्ली व मुंबई जैसे महानगरों में कई जगह पर पानी भरने के लिये लोगों को एक-दूसरे से झगड़ते हुये देखा जा सकता है। अर्थात एक बाद स्पष्ट है कि पीने योग्य पानी की किल्लत है और इसी कारण हमें आज जल संरक्षण दिवस मनाना पड़ रहा है। क्योंकि यदि हमारे पास पर्याप्त मात्रा में जल संरक्षित होता, यो उपरोक्त समस्याओं का हमें सामना नहीं करना पड़ता।

आज इस प्रकार के भयवाह हालात क्यों हैं? इसका क्या समाधान हो सकता है, इस पर विचार करने की आवश्यकता है। सबसे पहले इस पर चर्चा करते हैं कि समस्या क्या है? प्रदूषण हर क्षेत्र में है। जीवनदायनी जल आज हमारा स्वास्थ्य खराब कर रहा है क्योंकि वो स्वयं प्रदूषित हो चुका है और इसका कारण हम मानव है। हमारे कारण जलीय जीवों का जीवन भी खतरे में पड़ चुका है। यह प्रदूषण पिछले 20 वर्षों में अधिक तेजी से बढ़ा है। इस कारण जलीय जीवों की कई प्रजातियां विलुप्त हो गईं। इनमें मछलियों और कछुओं की प्रजातियां प्रमुख हैं। इन जलीय जीवों में से कुछ बिगरिड, लेपिओ, मिस्ट्स, मौना मझली, बेरिलियस बोला, तूर आदि हैं। कई ऐसी प्रजातियां हैं जिनका नाम मात्र का प्रतिनिधित्व बचा है। इन जलीय जीवों को अपना भोजन बनाने वाले पक्षी भी बीमार होकर मर रहे हैं। यही हालात मानव के भी हैं। अशुद्ध पानी पीने से हम रोगी बन रहे हैं। जो जल जीवन देता है, वही हमारी जिंदगी ले रहा है। यदि हम साफ़ जल संरक्षित कर लेते हैं, तो यह मानव के साथ ही जीवों के लिए भी लाभदायक होगा। इससे विश्व का कल्याण होगा।

जब जल प्रदूषण की बात होती है, तो इसके लिये उद्योगों को प्रमुख रूप से  जिम्मेदार बताया जाता है। बहुत हद तक यह ठीक भी है, लेकिन सिर्फ उद्योग ही इसके लिये जिम्मेदार नहीं हैं। हम-आप जैसे साधारण लोग भी जिम्मेदार हैं। जो गंदगी हमारे द्वारा नदियों व समुद्र आदि में फेंकी जाती है, वह कचरा जल को प्रदूषित करके वापस हमारे घरों में ही आता है। पुराने समय में हिन्दू मान्यताओं के अनुसार सिर्फ वही वस्तुएं जल को समर्पित की जाती थीं, जो जल में घुलकर समाप्त हो सकें, लेकिन आज ऐसा नहीं है। इसके कारण जहां एक ओर जल प्रदूषित हो रहा है, वहीं दूसरी ओर नदियों व समुद्र की गहराईयों में कचरा जम जाने के कारण समस्या हो रही है। नदियों के तल में गहराई कम होने के कारण उनका जल फैलाव में अधिक स्थान ले रहा है। बारिश में कम गहरी होने के कारण जल नदियों में संचित नहीं हो पाता है। इसके कारण बारिश के मौसम में बाढ़ का खतरा बढ़ जाता है, तो गर्मियों में नदियां सूखने लगती हैं। नदियों की दिशाएं बदल रही हैं। यदि समुद्र की बात करें, तो प्रत्येक वर्ष समुद्री जल स्तर भी बढ़ रहा है। कई निचले इलाकों के डूबने का खतरा भी मंडराने लगा है। यद्यपि कुछ पर्यावरणविद् इसे ग्लेशियर पिघलने का परिणाम बताते हैं। सिर्फ जल संरक्षण से कुछ नहीं होगा, हमें शुद्ध जल संरक्षण के बारे में सोचना होगा।

इसका समाधान क्या हो सकता है? तो सबसे पहले नदियों में बिना शोधन के उद्योगों का प्रदूषित जल न जाए। हम नदियों में जो कुछ भी विसर्जित करते हैं, वह घुलनशील है अथवा नहीं इसकी हमें चिंता करनी होगी। यद्यपि कई स्थानों पर अब नदियों में विसर्जन को प्रतिबंधित कर दिया गया है। फिर भी इसके लिये स्वप्रेरणा अधिक आवश्यक है। नदियों में नालों के माध्यम से प्रदूषित जल जाता है, इसे भी बिना शोधन के नदियों तक पहुंचने से रोकना होगा। हम पर्यटन के उद्देश्य से नदियों और समुद्र के किनारे जाते हैं। वहां कोई भी जल को प्रदूषित करने वाली वस्तु न छोड़ें, इसका भी हमें ध्यान रखना होगा। नदियों व समुद्रों को साफ रखना होगा, जिससे इनकी गहराई बनी रहे और ये अधिक जल संरक्षित कर सकें। यह जल बाढ़ या सुनामी में बाहर की ओर न चला जाए।

जल संरक्षण के लिये कुछ नियम बड़े घरों हेतु बनाये गए हैं। जिससे भूगर्भ में जल संरक्षण किया जा सके। इसके लिये व्यक्तिगत प्रयास भी करने होंगे। क्योंकि सरकार के लिये हर घर में यह जाकर देख पाना संभव नहीं है कि हम जल संरक्षण के नियमों का पालन कर रहे हैं या नहीं। सरकारी भूभागों पर हर बड़े कार्यालय में जल संरक्षण के लिये क्या प्रयास किया गया, इसे ध्यान में रखना आवश्यक है। जो मध्यम व बड़े उद्योग सरकार से सहायता प्राप्त करते हैं, उन्होंने जल संरक्षण के लिये क्या कार्य किया, यह उन्हें अपनी सीएसआर रिपोर्ट में बताना अनिवार्य किया जाना चाहिए। सरकारी भूभाग पर तालाबों के निर्माण की बात तो कही और सुनी जाती है, लेकिन धरातल पर से तालाब गायब होते चले जा रहे हैं। इस स्थिति में सुधार लाना होगा। वनों से जल संरक्षण में सहायता मिलती थी। आज वन क्षेत्र के नाम पर जो धोखा दिया जा रहा है, उसे बंद करना होगा। जल संरक्षण के लिये जल प्रदूषण को दूर किया जाना भी एक भाग है। इसलिये दोनों पर संयुक्त रुप से विचार किया जाना चाहिए। यदि हमने दूषित जल का संचयन कर भी लिया तो यह किस काम का। इसलिए हमें प्रदूषण रहित जल का संरक्षण करना है। जरा विचार करें कि यदि इस समय विश्व की एक चैथाई आबादी के पास जल संरक्षण के आभाव में शुद्ध पेयजल नहीं है, तो आज से 50 या 100 वर्ष बाद क्या होगा? यदि आज जल के लिये विश्व युद्ध नहीं भी हुआ, तो निश्चित है कि अगली आने वाली पीढ़ी अवश्य ही शुद्ध जल के लिये युद्ध करेगी।

लेखक मातृभूमि समाचार के संपादक हैं।

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