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बनें सच्चे ‘पृथ्वी – पुत्र’, ताकि बची रहे धरती

– डॉ० घनश्याम बादल

आज पृथ्वी दिवस है । वही पृथ्वी जिसके बारे में कृतज्ञता प्रकट करते हुए हम प्राय कहते हैंमाता पृथ्वी पुत्रोंSहम् पृथ्व्या:’ अर्थात पृथ्वी माता है और मैं पृथ्वी का पुत्र हूं और वास्तव में मानव के लिए यह पूर्णतया सत्य भी है ।  मानव ही क्यों हर चराचर, पशु – पक्षी, कीट – पतंग सब का जन्म पृथ्वी की कोख से ही तो हुआ है । अभी तक ब्रह्मांड में केवल पृथ्वी ही ऐसा ग्रह पता चला है जिस पर जीवन है ।आज भी मानव अनेकानेक तरीकों से ब्रह्मांड के अन्य ग्रहों पर जीवन के लक्षण खोजता फिर रहा है लेकिन कहीं पर भी उसे अभी तक जीवन के लक्षण नजर नहीं आए हैं।  ऐसे में यदि कहा जाए कि पृथ्वी ही पूरे ब्रह्मांड में एकमात्र जीवन का आधार है तो अतिशयोक्ति न होगी ।

1970 से 22 अप्रैल को प्रतिवर्ष पूरा विश्व पृथ्वी दिवस मना रहा है । संयुक्त राष्ट्र संघ के मानकों के अनुसार आज के दिन पृथ्वी पर मंडराते खतरों के प्रति मानव को सावधान करने के लिए ही पृथ्वी दिवस या पृथ्वी बचाओ दिवस मनाने का निर्णय हुआ और तब से अब तक दुनियाभर के देश पृथ्वी दिवस मना रहे हैं। यदि पृथ्वी की उत्पत्ति के बारे में बात की जाए तो पुरातत्व विद्वानों के अनुसार पृथ्वी का जन्म लगभग 4.6 बिलियन वर्ष पूर्व हो गया था । कहा जाता है कि पृथ्वी की आयु ब्रह्मांड की आयु की एक तिहाई है अर्थात इस दृष्टिकोण से ब्रह्मांड का जन्म लगभग 13.2  बिलियन वर्ष पूर्व हुआ होगा । ब्रह्मांड असंख्य आकाशगंगाओं एवं हमारे जैसे करोड़ों सौर मंडलों से भरा पड़ा है तब कल्पना की जा सकती है कि पृथ्वी जैसे कितने ही ग्रह ब्रह्मांड में तैर रहे होंगे।  एक बार फिर से, यें सारे ग्रह, उपग्रह, नक्षत्र  व तारे जीवन से रहित हैं अर्थात मृत हैं । अकेली पृथ्वी ही हरे भरे जीवन से संपृक्त कही जा सकती है ।

अब यह जानना भी रोचक होगा कि इतने विशालकाय ब्रह्मांड में पृथ्वी का जन्म कैसे हुआ होगा । यदि पृथ्वी की उत्पत्ति के इतिहास पर नजर डालें तो अलग-अलग चश्मे से देखने पर यह अलग अलग दिखाई देता है । पृथ्वी की उत्पत्ति से संबंधित अनेक सिद्धांत बताए जाते हैं जिनमें से सबसे महत्वपूर्ण सिद्धांत ‘बिग – बैंग’ या महाविस्फोट थ्योरी के अनुसार ब्रह्मांड कभी एक आग का जलता हुआ गोला था उसमें अनंत ऊर्जा भरी हुई थी और इस ऊर्जा की वजह से ही इसमें एक महाविस्फोट हुआ और इस महाविस्फोट से ही पृथ्वी का अन्य ग्रहों एवं नक्षत्रों के साथ जन्म हुआ जो ब्रह्मांड में तैरते – तैरते घर्षण के चलते हुए गोलाकार हो गया।

जबकि दूसरी थ्योरी के अनुसार जिस महापिंड में विस्फोट हुआ वह गोल नहीं अपितु सिगार की आकृति का था ।  इस थ्योरी के समर्थक प्रमाण के रूप में यह बताते हैं कि यदि सारे ग्रहों को एक खास क्रम में रखा जाए तो उससे एक  सिगारर की आकृति बनती है । अब थ्योरी कोई सी भी सच्ची हो पर आज का सत्य यह है कि  समय के साथ इस का तापमान घटता गया एवं इसमें कुछ इस प्रकार के सूक्ष्म जीवों का निर्माण हो गया जो एक कोशिकीय थे जिन्हें नंगी आंखों से देखा जाना संभव नहीं था लेकिन समय के साथ यह कोशिकाएं आपस में जुड़ती गई तथा समय-समय पर इनमें बार-बार विघटन होता गया और अरबों खरबों वर्षों तक चली इस प्रक्रिया के चलते हुए सबसे पहले पृथ्वी पर जल का निर्माण हुआ । जल से थल और थल पर शैवाल काई के रूप में हरे प्राणी आए और इन से ही समय के साथ पहले जलचर, फिर उभयचर एवं फिर थलचरों का जन्म हुआ । पृथ्वी पर जीवन की कहानी भी बहुत ही रोचक है ।

अब विज्ञान अपनी जगह एवं गल्प तथा मिथक अपनी जगह । सबकी अपनी-अपनी थ्योरी है । हिंदू मिथकों एवं पुराणों के अनुसार पृथ्वी से संबंधित अनेक धार्मिक एवं पौराणिक कथाएं सुनने – पढ़ने को मिलती हैं । कूर्म पुराण के अनुसार पृथ्वी एक महाकाय कछुए की पीठ पर टिकी है जबकि शैव मत के अनुयायियों का मानना है कि पृथ्वी शिवजी के वाहन नंदी बैल के सिंगो पर टिकी हुई है वहीं विष्णु पुराण का एक दृष्टांत कहता है कि पृथ्वी शेषनाग के फण पर स्थिर है ।  कमोबेश ऐसी ही मिथकीय कहानियां इस्लाम एवं ईसाई धर्मों के साथ अन्य धर्मों में भी हैं ,जबकि खगोल विज्ञान का मानना है कि पृथ्वी सौरमंडल में ‘स्पेस’ यानी शून्य में तैरता हुआ एक गोला है जो सूर्य के चारों ओर निरंतर परिक्रमा कर रहा है तथा यह अपने अक्ष पर साढ़े 23 डिग्री अक्षांश उत्तर की ओर झुका हुआ है और सूर्य की परिक्रमा करने के साथ-साथ पश्चिम से पूरब की ओर अपने अक्ष पर लगातार घूमता रहता है जिसकी वजह से दिन एवं रात बनते हैं।

एक बार फिर आते हैं कि आखिर पृथ्वी दिवस मनाने की जरूरत ही क्यों पड़ी और इसके पीछे की वास्तविकता यह है कि पृथ्वी पर लगातार अंदर एवं बाहर से अनेक खतरे मंडरा रहे हैं ।  इन खतरों की सबसे बड़ी वजह स्वयं को पृथ्वी का पुत्र बताने वाला मानव ही है ।  उसकी गतिविधियां एवं उसके कार्य कलाप लगातार इतने आत्म केंद्रित होते गए कि उसने अपने चारों और के वातावरण, पर्यावरण, वायुमंडल और यहां तक कि अपनी मां पृथ्वी तक के बारे में सोचने की जहमत नहीं उठाई ।

भौतिक प्रगति की अंधी दौड़ में मानव ने लगातार पृथ्वी के स्वास्थ्य के विरुद्ध असंख्य कृत्य किए हैं । मानव के इन कृत्यों की वजह से पहले से ही अंदर से आग का गोला बनकर दहकती हुई पृथ्वी के ऊपर बाहर से भी आग बरसने लगी ।  यह आग कभी प्रदूषण तो कभी ग्लोबल वार्मिंग या ग्रीन हाउस इफेक्ट अथवा गैसों के एक अदृश्य जाल के रूप में लगातार बढ़ती ही जा रही है जिसके चलते हुए पृथ्वी के ऊपर का तापमान भी लगातार बढ़ रहा है जिसके चलते न केवल ग्लेशियरों के पिघलने का खतरा पैदा हो गया है अपितु ओजोन मंडल में भी सुराख हो गया है जिससे जहरीली गैस एवं विकिरण पृथ्वी तक पहुंच रहा है और इससे पृथ्वी पर रहने वाले जीव जंतुओं के साथ-साथ मानव जीवन पर भी खतरा मंडराता साफ साफ दिख रहा है ‌।

यदि पृथ्वी पर मंडराते खतरों की बात करें तो उस पर प्राकृतिक खतरे तो बहुत कम हैं लेकिन मानव द्वारा पैदा किए गए खतरे असंख्य हैं  जिनमें मुख्य रूप से असंतुलित रूप से बढ़ता हुआ औद्योगिकरण है जिसके फलस्वरूप प्रदूषण लगातार बढ़ रहा है । वन्यजीवों एवं मानव के बीच बढ़ता असंतुलन, लगातार घटते वन एवं पशु तथा पक्षी, जगह जगह पर नए शहरों के रूप में उगते हुए बहुमंजिली कंक्रीट के जंगल यानी बहुमंजिला इमारतें भी एक बड़ा ख़तरा है ।  पृथ्वी पर बिछती हुई सीमेंट एवं डामर की परतें, बढ़ता हुआ सड़कों का जाल, अनियंत्रित खदान एवं नदियों का जगह – जगह पर रोके जाना, बड़े-बड़े बांधों का निर्माण, वन्यजीवों का अपने उपयोग की वस्तुएं पाने के लिए वध करना व इसके साथ साथ समुद्रों में प्रतिदिन फेंके जाने वाला हजारों- हजारों टन कभी भी समाप्त नहीं होने वाला नॉन बायोडिग्रेडेबल कूड़ा – कर्कट, फैक्ट्रियों से निकलते हुए रसायनिक अपशिष्ट आदि भी इसके खतरनाक कारण बन कर उभरे हैं।

अब मानव यह तो चाहता है कि पृथ्वी हरी – भरी रहे, उस पर जीवन महकता रहे लेकिन जिस गति के साथ वृक्षों का कटान हो रहा है उससे उसकी नीयत पर शक लाजमी है एवं यह भी तय है कि इसका परिणाम बहुत ही भयंकर होने वाला है ।  यदि सचमुच पृथ्वी का ‘बुखार’ कम करना है यानि उसके तापमान को घटाना है तो फिर उस पर वृक्ष लगाने होंगे, पर्यावरण को संतुलित करना होगा, जहरीली गैसों को पृथ्वी तक पहुंचने से रोकने के प्रभावकारी उपाय करने होंगे एवं भावनात्मक तथा तार्किक तरीके से पृथ्वी को मां का दर्जा देते हुए उसकी मूल भावना का सम्मान करना होगा उसकी रक्षा करनी होगी ।

लेखक वरिष्ठ साहित्यकार हैं.

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