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सवा सौ साल के युवा सुभाष !

डॉ० घनश्याम बादल

आम आदमी से सबसे पहले श्रद्धा पूर्वक ‘नेताजी’ का संबोधन पाने वाले सुभाषचंद्र बोस की आज 125 वीं जयंती है । भारत में आज भी नेताजी सुभाष को राजनीति में  महानायक माना जाता है ।  जय हिंद का नारा देने वाले और तुम मुझे खून दो मैं तुम्हें आजादी दूंगा जैसा उद्घोष लगाने वाले  सुभाष लोगों के दिलों में गहराईयों में बसे हैं  ।

अपने परिवार में ‘सुवास’ के नाम से पुकारे जाने वाले सुभाष तत्कालीन भारतीय राजनीति के क्रांतिकारी युवा चेहरा थे और कांग्रेस में रहते हुए भी तथा कांग्रेस छोड़ने के बाद भी देश में रहते हुए भी हो और देश छोड़ने के बाद भी उस समय के युवा उनके अनुगामी थे मगर आज का युवा इस बात से खफा है कि  जिसे इस देश की आजादी का सबसे ज्यादा श्रेय मिलना चाहिए था, जो देश का सच्चा रत्न था उसे ही भारत रत्न तक मिलने में दुनिया भर की बाधाएं खड़ी कर दी गई ।  एक बहुत लंबे कालखंड में सरकारी आयोजनों में वह  विस्मृत ही रहा । अब सरकार ने भले ही सुभाष को भुलाए रखा पर जन मानस ने न उसे बिसराया न भुलाया अपितु अपने दिलों में संजो कर रखा तो यह सुभाष नामक व्यक्ति के महानायक होने का अकाट्य प्रमाण है ।

कुछ तो ऐसा है सुभाष के व्यक्तित्व में कि वह भारतीय जनमानस के मन की उस तह में जा बसा कि वह वहां अपनी अमिट छाप के साथ आज भी मौजूद है । भले ही संशय है कि वह ज़िंदा है या नहीं । उसे ‘जिंदाबाद कह कर याद करें कि ‘ अमर रहे ’ कह कर । सुभाष चंद्र बोस उस शख्स का नाम है जो सचमुच ही ‘नेताजी’ यानि नेतृत्व करने वाले सम्मान का हकदार है । लंबे समय तक आजाद भारत में सुभाषचंद्र बोस सबसे ज्यादा उपेक्षा के शिकार हुए उनसे कहीं कम बलिदान करने वाले लोग अधिक सम्मान पाते रहे पर प्रछन्न कारणो से सरकारों ने उन्हे बहुत कम अहमियत दी पर,देश की धड़कनो में समाए सुभाष बोस को आम जन से श्रद्धा व सम्मान दोनो भरपूर मिले ।

सुभाष विलक्षण व्यक्तित्व के मालिक थे प्रतिभा उनमें कूट- कूट कर भरी थी । आई 0 सी0 एस0 परीक्षा पास  करने वाले वें पहले भारतीय थे पर गुलामी मंजूर नहीं थी सो नौकरी नही की । महज 18 वर्ष की आयु में संन्यास ले हिमालय पंहुच गए  , सच्चे गुरु की तलाश की पर संतुष्टि नहीं मिली तो लौट आए , फिर  नया लक्ष्य बनाया  भारत को आजाद कराना और तन मन धन से जुट गए न दिन देखा न रात , राजनीति में कूद गांधी जी के अनुयायी हो गए सुभाष चंद्र बोस को सबसे बड़ा  झटका भी उन्ही से मिला ।

सुभाष चंद्र बोस की कुशाग्रता ने उन्हे गांधी का प्रिय बनाया । पर गांधी केवल अहिंसा से ही आजादी पाने के हामी थे वहीं सुभाष चंद्र बोस अंग्रेजो की नीति ‘बांटो व राज करो’ को समझ रहे थे अंग्रेज एक – एक करके भगत सिंह , बिस्मिल , सुखदेव , राजगुरु , चंद्रशेखर  आजाद अशफाक़उल्ला खान आदि सैंकड़ों आजादी केे दीवानों को खत्म कर चुके थे और गांधी एक कदम आगे व एक  कदम पीछे की नीति पर चल रहे थे , उन पर कांगेस में भी बस नेहरू का ही प्रभाव था ।

1939 में सुभाषचंद्र बोस की कांगेस अध्यक्ष पद पर हासिल की गई जीत को अपनी हार बताने की परिणिति उनके कांग्रेस छोड़ने के रूप में हुई । यहीं से दृढ़व्रती सुभाष चंद्र बोस व गांधी के रास्ते अलग हो गए और वें उस रास्ते पर बढ़ गए जिस पर चलकर आजादी या मौत में से किसी एक को चुनना था । सुभाष चंद्र बोस, द्वितीय विश्व युद्ध में आज के अंडमान को , ‘शहीद दीप’ के नाम से आजाद कराने में सफल हुए पर 1945 के अणु बम के प्रहार ने बोस का आज़ाद भारत का सपना तोड़ दिया । उसके बाद से वें कहां गए ? उनका क्या हुआ ? यह आज भी रहस्य बना हुआ है ।

सुभाष चंद्र बोस की मृत्यु के बारे में कई कयास हैं । इनमें सबसे ज़्यादा18 अगस्त1945 को ताईवान के ताइपेह में ताईहोकू हवाई अड्डे पर हुई विमान दुर्घटना में नेताजी की मृत्यु की थ्योरी शक के दायरे में है कहा जाता है कि वें टोकियो से उस विमान में सवार हुए थे जो लैंडिंग करते वक्त दुर्घटनाग्रस्त हो गया और नेताजी उस दुर्घटना में मारे गए । पर मुखर्जी आयोग को ताइवान के अधिकारियों ने बताया कि इस तरीख को ताइवान के इतिहास में किसी विमान दुर्घटना का उल्लेख ही नहीं है ।  मुखर्जी आयोग का तो कहना था कि उसकी जांच में जापान ने सहयोग नहीं किया जिसकी तरफ से सुभाष चंद्र बोस ने अपनी आजाद हिन्द फौज के साथ युद्ध में हिस्सा लिया था और जहां अंतिम बार उन्हे देखा गया था । मृत्यु की यह थ्योरी संदेह पैदा करती है ।

वहीं अमेरिकी खुफिया एजेंसी सी आई ए की रिपोर्ट 1946 में भी सुभाष चंद्र बोस के जिंदा होने व रूस में देखे जाने का उल्लेख करती है । एक तथ्य और भी इस रिपोर्ट के झुठलाता है नेताजी के निकट सहयोगी कैप्टन शाहनवाज व ढिल्लन का कहना था कि नेताजी उस विमान में सवार हुए नहीं थे । वहीं उसी विमान में सवार कैप्टन हबीबुर्रहमान जो जिंदा बच गए थे ने शपथ में बंधे होने के कारण कुछ भी कहने से मना कर दिया । एक अफवाह यह रही कि नेताजी को ब्रिटेन की सरकार ने युद्ध अपराधी घोषित किया था इसलिए वें स्वयं ही भूमिगत हो गए , और उनके सहयोगियों ने उनकी मौत की खबर फैलाई जिससे वें सुरक्षित रह सकें ।

खोसला आयोग समेत कोई भी आयोग नेताजी की मृत्यु के बारे में किसी भी निष्कर्ष पर नहीं पंहुच पाया । 1999 से 2005  तक सुभाष चंद्र बोस की मृत्यु पर जांच कर रही मुखर्जी कमेटी की रिपोर्ट में 1945 में नेताजी की मृत्यु को संदिग्ध  माना। था वहीं बहुत बाद तक भी उनके फैजाबाद में रह रहे गुमनामी बाबा के रूप  में जिंदा होने की बातें कही जाती रही जो1985 में दिवंगत हुए ।अब सच क्या है कोई कुछ नहीं कह सकता है ।

नेताजी की मृत्यु के बारे में बहुत उलझाव हैं । नेताजी के भतीजे व उनके भाई षरत्चंद्र के बेटे अभियनाथ बसु के अनुसार नेताजी लम्बे समय तक रूस में साइबेरिया में जेल में बंदी रहे और बाद में स्टालिन के आदेष पर उन्हे कत्ल कर दिया गया । पर प्रष्न उठता है कि यदि वें जिंदा थे तो भारत क्यों नहीं लौटे व उन्हे वापस लाने का प्रयास क्यों नहीं किया गया ? उनके कांग्रेस , गांधी तथा नेहरु से खराब सम्बंध एक और संदेह का बीज जन मानस में बोते रहे हैं । कुछ लोगों ने तो नेहरु व गांधी तक पर उंगली उठाने में गुरेज नहीं किया । कहा गया कि नेहरु डरते थे कि यदि सुभाष चंद्र बोस भारत लौटे तो जनता उन्हे ही देश का सर्वोच्च पद  देने को सड़को पर उतर सकती है सो उन्हाने उन्हे ढूंढने , वापस लाने में रुचि नहीं ली ।

पर , एक बात तो है कि यदि सुभाष चंद्र बोस जिंदा लौटते तो देश की राजनीति एक नई करवट लेती तब शायद हम एक ‘सोफ्ट टारगेट’ न होते हमें ‘बनाना स्टेट’ जैसे ताने न झेलने पड़ते । तब भारत पाक का विभाजन भी संभवतः न हो पाता यदि होता भी तो आसपास के छोटे मुल्क तक हमें धमकियां देने की जुर्रत करने से पहले दस बार सोचते क्योंकि नेताजी की सोच ससम्मान जीने की सोच थी। सुभाष चंद्र बोस अंग्रेजी सरकारों से लड़ते रहे उनमें ‘सत्तालोभ’ नहीं था वें आज के ‘पिलपिले लोकतंत्र’ के भी हामी नहीं थे। वें हर हाल में देश को मज़बूत बनाते चाहते इसके लिए चाहे उन्हे कुछ भी करना पड़ता । मानना यह भी ळे कि सुभाष चंद्र बोस को सत्ता मिलती तो हम कम्युनिस्ट होते रुस की तरह का शासन होता यहां । अब, यें सब तो अब अनुमान मात्र हैं हम तो उनके मरने – जीने तक की खैर ख़बर न ले पाए ।

हां नेताजी के आदर्शों को ताक पर रख देने वाले आज के नेता मौका मिलते ही उनका उपयोग सत्ता पाने के लिए करने से गुरेज नहीं करते और पिछले कुछ दिनों से इसी बहाने से ही सही नेता जी को महत्व मिला है इस बार उनकी 125 वीं जयंती को केंद्र सरकार ने पराक्रम वर्ष के रूप में मनाने का निर्णय लिया है भले ही इसके पीछे बंगाल एवं दूसरे राज्यों के विधानसभा चुनाव देखे जा रहे हैं मगर यह सच है कि गैर कांग्रेसी सरकारों में भी इसी सरकार ने नेताजी को समुचित सम्मान प्रदान किया है । अगर नेताजी आज जिंदा होते तो 125 में वर्ष में चल रहे होते मन उन्हें अमर मानता है उस सैनिक वर्दी वाले, गोल चश्मा धारी, ओजस्वी व्यक्तित्व के स्वामी अजानुबाहु महानायक को उनकी 125 वी जयंती पर पूरे देश का सम्मान पूर्वक श्रद्धा नमन ।

लेखक हिंदी के वरिष्ठ साहित्यकार हैं ।

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