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कोरोना नियंत्रण के लिये सरकार को लॉकडाउन के लिये मजबूर मत करो

– सारांश कनौजिया

भारत में कोरोना के कारण लॉकडाउन की जो श्रृंखला शुरु हुई थी। उसे एक वर्ष हो चुका है। एक बार फिर स्थितियां पिछले वर्ष की तरह ही बनती चली जा रही हैं। लॉकडाउन के कारण वर्ष 2020 सभी के लिये परेशानी भरा रहा। अब एक बार फिर से कोई भी लॉकडाउन नहीं चाहता, सरकार भी नहीं। लेकिन शायद हम आम लोग इसके लिये सरकारों को मजबूर कर रहे हैं। इस स्थिति को सिर्फ हम सभी ही सुधार सकते हैं। यदि नहीं सुधरे तो कोरोना की स्थिति को सुधारने के लिये अंतिम विकल्प लॉकडाउन का प्रयोग करना ही पड़ेगा। इसलिये मेरा अनुरोध सभी से है कि सरकार को लाॅकडाउन लगाने के लिए विवश न करें।

पिछले साल जब कोरोना महामारी का खतरा बढ़ रहा था, तो हमारे गांव इससे अछूते थे। इसका एक कारण गांव के लोगों का शारीरिक श्रम हो सकता है, किंतु इसके दूसरे पहलू को भी नजरअंदाज नहीं कर सकते हैं। जो लोग गांव में शहरों से वापस आये, उन्हें गांव की सीमा पर ही रोक दिया गया। उनके लिये वहीं खाने-पीने की सभी सुविधाएं उपलब्ध करा दी गयीं, जब इन लोगों ने अपना एकांतवास पूरा कर लिया और वे पूरी तरह से स्वस्थ रहे, तो ही उन्हें गांव के अंदर प्रवेश दिया गया। यह व्यवस्था गांव वालों ने स्वप्रेरणा से की थी। अब शहर हो या गांव सभी स्थानों पर लापरवाही है। लोग बिना रोक-टोक गांव से शहर और शहर से गांव जा रहे हैं। न मास्क है, न सैनेटाइजर और न ही उचित दूरी का कोई ध्यान। जिन शहरों में कोरोना के बढ़ते मामलों के कारण नियमों को कड़ा कर दिया गया है, वहां लोग पुलिस वालों या मार्शलों से लड़ाई कर रहे हैं। नियमों को बिना आधार का बता रहे हैं।

ऐसा अनुमान था कि कोरोना वैक्सीन लगना शुरु होने के बाद स्थिति तेजी से सुधरेगी। ऐसा होता हुआ लग भी रहा था, लेकिन फिर हालात बिगड़ने लगे। इसके लिये भी हम और आप ही जिम्मेदार हैं। कोरोना वैक्सीनेशन पहले स्वास्थ्यकर्मियों, फिर फ्रंटलाइन में कार्य करने वाले लोगों को लगनी थी। इसके बाद अब बुजुर्गों व गंभीर रुप से बीमार 45 वर्ष से अधिक आयु के लोगों को भी कोरोना वैक्सीन लगनी शुरु हो चुकी है। कुल 30 करोड़ लोगों का वैक्सीनेशन होना था। किंतु कई स्थानों पर लोगों के न पहुंचने के कारण भारत में लगभग 10 लाख वैक्सीन की डोज बर्बाद हो चुकी है। कुछ लोगों की मांग है कि वैक्सीनेशन सभी के लिये बिना किसी बंधन शुरु कर देना चाहिए। अभी 4.12 करोड़ लोगों को वैक्सीन लग सकी है। इसका सीधा अर्थ है कि लोग पर्याप्त संख्या में नहीं आ रहे। यदि सबके लिये वैक्सीनेशन शुरु कर दिया जायेगा, तो अव्यवस्था फैलने का डर बना रहेगा। सरकार को जनसंख्या के अनुसार वैक्सीनेशन की व्यवस्था करनी होगी। यदि लोग अपेक्षित संख्या में नहीं पहुंचे, तो इस कार्यक्रम में लगे लोगों का समय और पैसा व्यर्थ जायेगा। इसके अतिरिक्त हो सकता है कि खराब होने वाली वैक्सीन डोजों की संख्या भी तेजी से बढ़े। इसके लिये भी बहुत हद तक हम सभी ही जिम्मेदार होंगे।

हम अपनी जिम्मेदारी ठीक से नहीं निभा रहे हैं, इसलिये कोरोना बढ़ रहा है। पहले एक्टिव केसों के मामले में हम विश्व के सबसे अधिक प्रभावित 10 देशों की सूची से बाहर निकल चुके थे। किंतु अब इस लापरवाही के कारण हम 8वें नंबर पर हैं। 7वें नंबर पर पोलैंड है, जो आंकडों के अनुसार हमसे थोड़ा ही आगे है। कुल कोरोना संक्रमण के मामले में हम इस समय तीसरे स्थान पर हैं। ब्राजील में भारत से कुछ ही अधिक कुल कोरोना संक्रमित हैं। कोरोना के कारण कुल मरने वालों की संख्या के अनुसार भारत चौथे नंबर पर है। मैक्सिको हमसे आगे है और अंतर भी अधिक है। इस कारण फिलहाल यहां हमारी स्थिति और खराब होने की संभावना कम है।

ऐसा क्यों हो रहा है, जब हम इस पर विचार करते हैं, तो ध्यान में आता है कि जिसे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी कोरोना की दूसरी लहर कह रहे हैं, उसके लिये भी वही प्रदेश जिम्मेदार हैं, जो पहली लहर के लिये थे। कुछ नए प्रदेश भी जुड़े हैं। भारत के अंदर इस समय कुल एक्टिव केस 3.42 लाख हैं, इनमें अकेले महाराष्ट्र में 2.15 लाख कोरोना संक्रमित उपचार करा रहे हैं। पिछली बार की तरह ही इस बार भी केरल और कर्नाटक पहले पांच कोरोना संक्रमित प्रदेशों में बने हुये हैं। अन्य दो प्रदेश पंजाब और छत्तीसगढ़ हैं। तमिलनाडु और मध्य प्रदेश में भी कोरोना संक्रमण तेजी से बढ़ रहा है। केरल और तमिलनाडु में विधानसभा चुनाव होने हैं। इसलिये यहां के लोगों को अधिक ध्यान देने की जरुरत है। केरल भारत का दूसरा सबसे अधिक कोरोना के एक्टिव केस वाला प्रदेश है। सबसे अधिक पढ़े-लिखे लोगों में भी केरल आगे है। इसलिये यह कहना गलत होगा कि लोग जानकारी के आभाव में ऐसा कर रहे हैं। यही सबसे बड़े दुख का विषय भी है कि लोग जानबूझकर लॉकडाउन जैसी स्थिति की ओर बढ़ रहे हैं।

लॉकडाउन लगे ऐसी स्थिति के निर्माण में हमने कोई कोर-कसर नहीं छोड़ रखी है, लेकिन लॉकडाउन लगने का विरोध भी हम कर रहे हैं। कई लोग कहते हुए मिल जायेंगे कि यदि लॉकडाउन लगा तो हम मर जाएंगे। कोरोना से बचा जा सकता है कि लेकिन लॉकडाउन लगने पर आत्महत्या करने के अलावा और कोई विकल्प नहीं होगा। या तो हमें अपनी आदतों को सुधारना होगा, नहीं तो लॉकडाउन में ही जीना या मरना होगा। यह बात कुछ लोगों को खराब लग सकती है, लेकिन वास्तविकता यही है।

लेखक मातृभूमि समाचार के संपादक हैं।

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