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उग्रवाद से विकास की राह पर पहुंचा असम

– सारांश कनौजिया

आज का असम विकास की ओर बढ़ चला है। इस विधानसभा चुनाव में घुसपैठ की समस्या को छोड़ दे, तो अधिकांश मुद्दे विकास से जुड़े हुये ही हैं। जबकि 2014 से पहले का एक बड़ा कालखंड असम ने उग्रवाद का दंश झेलते हुये बिताया है। अपनी अलग पहचान की मांग करने वाले असम के लोगों के साथ 1985 में तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी की सरकार ने एक समझौता किया था। इसके बाद उम्मीद जगी थी कि असम में शांति स्थापित होगी और यह राज्य प्रगति की ओर बढ़ेगा। किंतु ऐसा हो न सका। अब वर्तमान नरेंद्र मोदी की सरकार ने असम सहित पूरे पूर्वोत्तर पर ध्यान देना शुरु किया है, इससे जहां एक ओर असम ने उग्रवाद की समस्या पर नियंत्रण प्राप्त कर लिया गया है, वहीं विकास कार्यों में सबकी सहभागिता सुनिश्चित की जा रही है।

1985 में जो समझौता हुआ था, उसके अनुसार असम की सांस्कृतिक, आर्थिक और राजनीतिक पहचान को बनाए रखने के लिये विशेष प्रावधान करने की बात कही गयी थी। बांग्लादेशी घुसपैठियों को भी बाहर करने की मांग इसी समझौते के आधार पर की जाती रही है। 2014 में जब नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा भारत की सत्ता में आई, तो उसने पूर्वोत्तर पर अधिक ध्यान देना शुरु किया। किसी भी प्रदेश में यदि समान दल की सरकार हो, तो काम करना और अधिक सुगम हो जाता है। यह दुर्भाग्य है, किंतु सत्य भी। असम ने भी ऐसा ही देखा। 2016 में जब असम की सत्ता भाजपा के हाथ में आई और सर्वानंद सोनोवाल मुख्यमंत्री बने, तो भाजपा की केंद्र व राज्य सरकार दोनों ने मिलकर उग्रवाद के कारणों को समाप्त करने का संयुक्त प्रयास प्रारंभ किया।

बोडो उग्रवादी जो असम के सीमवर्ती क्षेत्रों कोकराझार आदि में अधिक सक्रिय रहते थे, उनका आत्मसमर्पण करवाने का काम शुरु हुआ। सैकड़ों की संख्या में बड़े बोडो उग्रवादियों ने मुख्य धारा में आने का निर्णय लिया। सरकार ने उल्फा सहित विभिन्न उग्रवादी संगठनों से समझौते का प्रयास भी शुरु कर दिया। इसका भी लाभ मिला। 2016 तक जहां ये उग्रवादी संगठन अक्सर ही हमला करते थे। वहीं असम से अब ऐसी घटनाओं के समाचार आने बंद हो चुके हैं। यदि किसी कारण प्रदर्शन होता भी है, तो वह लोकतांत्रिक ढंग से किया जाता है। कुछ अपवाद हो सकते हैं, सभी जगह पर होते हैं।

ऐसा नहीं है कि असम में उग्रवाद पूरी तरह से समाप्त हो गया है। अभी भी बोडो उग्रवादियों को गिरफ्तार करने के समाचार कभी-कभी मिल जाते हैं। किंतु इस प्रकार की घटनाएं न के बराबर हो गयी हैं। इसके पीछे का कारण क्या है? केंद्रीय गृह मंत्री और भाजपा के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह के अनुसार अब उग्रवादी घटनाओं पर लगाम लगाने के लिये असम में कर्फ्यू नहीं लगाना पड़ता। जहां एक ओर कांग्रेस असम को अलग-अलग क्षेत्रों में बांटकर उनके बीच झगड़े कराना चाहती है, वहीं हमने हर क्षेत्र की आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुये योजनाएं शुरु की हैं।

असम को हर साल बाढ़ की समस्या का सामना करना पड़ता है। भाजपा अध्यक्ष जेपी नड्डा ने पार्टी का घोषणा पत्र जारी करते हुये इस बार बाढ़ की समस्या का समाधान करने का वादा किया है। इस घोषणा पत्र में 3000 रुपये प्रति माह की सहायता सहित विभिन्न अन्य वादे भी किये गाए हैं। सबसे महत्वपूर्ण है कि भाजपा ने निजी क्षेत्र में असमवासियों को 8 लाख रोजगार देने की बात कही है। इतने रोजगार तभी मिल सकते हैं, जब असम में व्यापारियों के लिये उपयुक्त वातावरण का निर्माण हो। अर्थात भाजपा को यह विश्वास है कि असम अब व्यापारियों के लिए पूरी तरह सुरक्षित हो चुका है।

किसी भी सरकार का आंकलन करना है, तो विपक्षी दावों और वादों की चर्चा करना आवश्यक हो जाता है। असम में कांग्रेस गठबंधन का प्रमुख वादा है कि वो प्रदेश में सीएए और एनआरसी कानून नहीं लागू होने देंगे। वो कहते तो हैं कि किसी भी असमवासी को राज्य से बाहर नहीं निकाला जाएगा। जबकि एनआरसी असम में बांग्लादेशी घुसपैठियों को बाहर निकालने के लिये लागू किया गया था। जो राजीव गांधी के समय हुये समझौते में एक प्रमुख मांग थी। यद्यपि असम में लागू एनआरसी में बहुत गड़बड़ियां थीं, इसीलिये कांग्रेस को तुष्टीकरण की राजनीति करने का मौका मिल गया और वो मुस्लिम वोटों को लुभाने के लिये एनआरसी असम में लागू नहीं करने की बात कह रही है। इन्हीं वोटों के लालच में कांग्रेस ने 1985 से 2016 तक कभी असम में एनआरसी लागू करने का प्रयास गंभीरतापूर्वक नहीं किया। भाजपा ने कहा है कि वो एनआरसी को सही करके फिर से तैयार करवायेगी और घुसपैठिये बाहर होंगे।

यह असम का दुर्भाग्य है कि कांग्रेस गठबंधन सत्ता के लोभ में घुसपैठियों को संरक्षण दे रहा है। सिर्फ इस मुद्दे को छोड़ दें, तो अन्य सभी वादे चाहें वो भाजपा गठबंधन की ओर से हों या कांग्रेस गठबंधन की ओर से विकास पर ही केंद्रित हैं। हमें उम्मीद है कि असम की जनता को जिसके विकास के वादों और दावों पर अधिक विश्वास होगा, सत्ता उसी को मिलेगी। घुसपैठियों को प्रलोभन देने का कोई लाभ किसी को नहीं होगा।

लेखक मातृभूमि समाचार के संपादक हैं।

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