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गणेश शंकर विद्यार्थी की साम्प्रदायिक माॅब लिंचिंग में हुई थी हत्या

– सारांश कनौजिया

आज हम गणेश शंकर विद्यार्थी की पुण्यतिथि मना रहे हैं। हम सभी उन्हें एक महान पत्रकार और स्वतंत्रता संग्राम सेनानी के रुप में जानते हैं। क्रांतिकारी विचारों से ओत-प्रोत होने के कारण उनकी संघर्ष गाथा, विशेष रुप से उनकी हत्या की चर्चा बहुत कम होती है। मैं अपने पिछले लेखों में बता चुका हूं कि भारत का पहला दंगा मोपला, केरल में 1921 में हुआ था। इस दंगे में 2000 हिन्दुओं की हत्या कर दी गयी और 20 हजार से अधिक हिन्दू बेघर हो गये। हिन्दू महिलाओं के साथ बलात्कार भी सैकड़ों की संख्या में हुए। इसके बाद से देश के विभिन्न हिस्सों में एक ओर महात्मा गांधी की स्वीकार्यता बढ़ रही थी, वहीं दूसरी ओर हिन्दुओं को दंगों में मारने, लूटने व हिन्दू महिलाओं के साथ बलात्कार की घटनाएं भी बढ़ रही थीं। इन दंगों में सामान्यतः कोई व्यक्ति विशेष लक्ष्य नहीं होता था, किंतु गणेश शंकर विद्यार्थी को लक्ष्य बनाकर एक संप्रदाय विशेष के लोगों की भीड़ ने मार डाला। उनकी हत्या कर दी। यही कारण है कि मैं गणेश शंकर विद्यार्थी की हत्या को साम्प्रदायिक माॅब लिंचिंग कह रहा हूं। अंग्रेजों का भारत में शासन स्थापित होने के बाद मेरी अभी तक की जानकारी के अनुसार यह पहली बड़ी माॅब लिंचिंग की घटना थी।

गणेश शंकर विद्यार्थी का जन्म इलाहबाद (प्रयागराज) में हुआ था। 1908 में वो कानपुर आ गये और इसी शहर को उन्होंने अपनी कर्मभूमी बना लिया। भारत के सर्वांगीण विकास के लिये अंग्रेजों का भारत को छोड़कर जाना आवश्यक है। यह विचार विद्यार्थी जी के मन में प्रयागराज से ही था, जो कांग्रेस की स्थापना के उद्देश्य से बिल्कुल उलट था। कांग्रेस अंग्रेजी शासन को स्वीकार करते हुये भारतीयों को और अधिक अधिकार देने की वकालत करती थी। इसी कारण गणेश जी की निकटता क्रांतिकारी विचारों का समर्थन करने वाले लोगों से अधिक हुई। यही विचार बाद में उनकी हत्या का कारण भी बना। गणेश शंकर विद्यार्थी ने 1913 में कानपुर से अपना साप्ताहिक समाचार पत्र प्रताप निकाला। वो लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक को अपना राजनीतिक गुरु मानते थे। इस कारण उनकी निकटता कांग्रेस से भी रही। वे एक प्रकार से कांग्रेस के गरम दल के सदस्य थे। यह गुट कांग्रेस में रहते हुये क्रांतिकारी विचारों को भी समान रुप से महत्व देता था।

1920 में गणेश शंकर विद्यार्थी ने अपने समाचार पत्र प्रताप को दैनिक कर दिया। आर्थिक सहायता न के बराबर मिलने के बाद भी उनका यह निर्णय साहसिक था। लेकिन इसी बीच 1920 में ही बाल गंगाधर तिलक का देहांत हो गया और कांग्रेस पूरी तरह से महात्मा गांधी के हाथ में जाने लगी। तिलक के प्रति सम्मान के कारण जहां एक ओर विद्यार्थी जी कांग्रेस के आंदोलनों में सक्रिय रहते थे, वहीं विचारों से वे क्रांतिकारियों के निकट लगते थे। इसी कारण कांग्रेस से उन्हें प्रताप के संचालन में कोई विशेष सहयोग नहीं मिला। 1921 में मोपला, केरल से शुरु हुई साम्प्रदायिक दंगों की आग कानपुर तक पहुंच गयी। 25 मार्च 1931 में मुस्लिमों की एक भीड़ ने गणेश शंकर विद्यार्थी को शहीद कर दिया।

आखिर इन दंगों की शुरुआत 1921 से ही क्यों हुई? दरअसल 1920 में मोहम्मद अली जिन्ना कांग्रेस से अलग हुये और मुस्लिम लीग के अध्यक्ष बने। गांधी जी हमेशा हिन्दू-मुस्लिम विवाद होने पर हिन्दुओं को ही समझाते थे और शांति बनाये रखने के लिये कहते, लेकिन जिन्ना इतने से संतुष्ट नहीं हुए। उन्हें मुस्लिमों के लिये और अधिक अधिकार व बिना रोक-टोक इस्लामिक नियमों के अनुसार काम करने की स्वतंत्रता चाहिए थी। डॉ. हेडगेवार सहित कांग्रेस के कई नेता जिन्ना की इन बातों से सहमत नहीं थे। यही कारण है कि उन्होंने 1920 में ही मुस्लिमों के लिये अलग राष्ट्र की मांग के लिये वातावरण बनाना शुरु कर दिया। इसी विचारधारा के कारण 1921 में केरल के अंदर दंगे हुए, बाद में ये दंगे कानपुर तक पहुंचे और अंततः 1947 में भारत-पाकिस्तान विभाजन हुआ। गांधी जी अंत तक जिन्ना को साथ जोड़े रखने का प्रयास करते रहे, लेकिन इसका लाभ नहीं हुआ।

गणेश शंकर विद्यार्थी की शहादत मुस्लिमों की उन्मादी भीड़ ने की थी। इस दंगे या कहें कि साम्प्रदायिक माॅब लिंचिंग की निंदा करने की जगह गांधी जी ने विद्यार्थी की शहादत पर कहा था कि यह बलिदान में बहा खून दो समुदायों के बीच दरार को जोड़ने वाली सीमेंट की तरह काम करेगा। यह शहादत पत्थर में भरे गए जहर को धोएगी। आश्चर्य है कि हिंसा का सदैव विरोध करने वाले गांधी जी इस्लाम के कट्टर अनुयायियों के विरुद्ध एक शब्द तक नहीं बोल सके। बल्कि इस हत्या को दो सम्प्रदायों के बीच नफरत को समाप्त करने के लिये जरुरी बता डाला।

लेखक मातृभूमि समाचार के संपादक हैं।

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